पर्यावरण से संबंधित विषय पढ़ाने वाले तथा वन्यजीव संरक्षण के मानवीय आयामों का अध्ययन करने वाले व्यक्ति के लिए पारिस्थितिक अपराधबोध (ईकोलॉजिकल गिल्ट) के साथ जीना प्रतिदिन की सच्चाई है। किसी जीवन-शैली और उसके पर्यावरणीय प्रभाव का लगातार आकलन करना लगभग अनिवार्य हो गया है।
साथ ही जैसे-जैसे जीवन भौतिक रूप से अधिक सुविधाजनक होता जाता है, यह अपराधबोध उतना ही तीखा महसूस होने लगता है। मैं लगभग रोज ही सोचती हूं कि प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल करूं या नहीं या फिर छोटी दूरी के लिए कार का प्रयोग करना चाहिए या नहीं।
कैंपस में साइकिल चलाना क्षणिक राहत देता है, लेकिन वह भी सतही समाधान लगता है। हरे-भरे, कम यातायात वाले कैंपस में साइकिल चलाना अपने आप में एक विशेषाधिकार है।
भारत में जीवन-शैली के विकल्पों पर पुनर्विचार करने की क्षमता ही एक विलासिता है। ऐसे में उन लोगों का क्या जिनके पास कोई विकल्प नहीं है और जो उस जलवायु परिवर्तन का दंश झेलने के लिए मजबूर हैं जो पहले से ही उनके स्वास्थ्य, आजीविका और कई बार उनके जीवन को भी क्षीण कर रहा है।
यह जानना कि मानव और गैर-मानव दोनों ही जलवायु व्यवधानों से कैसे जूझ रहे हैं, चिंता को और गहरा कर देता है। ज्ञान यहां सुकून नहीं देता, बल्कि बेचैनी को बढ़ाता है।
जलवायु की चरम स्थितियां सभी को प्रभावित करती हैं, लेकिन समान रूप से नहीं। कुछ लोग दूसरों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावित होते हैं। हाल ही में मेरे एक छात्र ने ईंट-भट्ठों में काम करने वाले मजदूरों का साक्षात्कार लिया, जो खुले आसमान के नीचे घंटों मेहनत करते हैं।
उस दौरान एक मजदूर ने सवाल किया, “आखिर गर्मी कब नहीं रही? जो ईंट-भट्ठों में काम करता है, वही समझ सकता है कि यह दर्द कैसा होता है।” शिक्षित और विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों में ईको एंजायटी पर खुलकर चर्चा होती है जो अपने आप में एक तरह का विशेषाधिकार ही है।
कड़वा सच यह है कि जलवायु परिवर्तन के प्रति शारीरिक रूप से सबसे संवेदनशील समुदाय अक्सर वही होते हैं जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे हैं। कई आदिवासी समुदायों के लिए यह असुरक्षा बांधों, खदानों, बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं और यहां तक कि “हरित ऊर्जा” परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण से और बढ़ जाती है। “हमारे बच्चे कहां जाएंगे?”
यह सवाल मैंने इन समुदायों में कई बार सुना है, जहां भविष्य की पीढ़ियों को लेकर लगातार चिंता बनी रहती है। उनकी आशंकाओं की कई परतें होती हैं। इनमें भूमि और आजीविका का नुकसान, विस्थापन और संस्कृति का धीरे-धीरे क्षरण शामिल है।
जंगल पर निर्भर समुदायों के लिए जैव-विविधता का नुकसान भाषा, पहचान और जीवन-पद्धतियों के लिए भी खतरा है। स्वयं जैव-विविधता भी इसी तरह के जोखिमों का सामना कर रही है। एक साल पहले मैं गुजरात में अहमदाबाद से भुज की यात्रा पर थी। मेरे साथ दो वन्यजीव विज्ञानी थे जो पिछले 20 वर्षों से इस मार्ग के लैंडस्केप खासकर राजमार्ग के किनारे पक्षियों की विविधता का अध्ययन कर रहे हैं।
यात्रा के दौरान वे गायब हो चुकी आर्द्रभूमियों और पक्षियों के सिमटते आवासों की ओर इशारा करते रहे। एक ने कहा, “यहां एक आर्द्रभूमि हुआ करती थी।” दूसरे ने बताया, “अब यह कूड़ा-घर बन गई है।” कच्छ के रण में प्रवेश करते हुए एक ने कहा, “मैंने यहां गोडावण देखे हैं।”
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) जमीन पर घोंसला बनाने वाला पक्षी है जो कभी इस क्षेत्र में आम था। यह भारत का सबसे लंबी उड़ान भरने वाला पक्षी माना जाता है। अब ये केवल 100–150 की संख्या में बचे हैं। पूरी यात्रा के दौरान इस प्रजाति का खयाल एक भूत की तरह हमारे ऊपर मंडराता रहा। हम केवल बदलाव को देख नहीं रहे थे, हम एक नुकसान का शोक मना रहे थे।
ऐसी प्रजाति पर क्या बीतती होगी जिसकी संख्या रिकवरी की सीमा से भी नीचे चली गई हो और जो अब अधिकतर कैद (कैपटिविटी) में ही जीवित हो? हम हाशिए पर पड़े समुदायों और संकटग्रस्त प्रजातियों की चिंताओं को स्वीकार करे बगैर ईको एंजायटी की बात कैसे कर सकते हैं? आखिरकार, ग्रह के इस संकट की सबसे भारी कीमत तो वही चुका रहे हैं।