प्रोफेसर कार्तिक आत्मनाथन और प्रोफेसर सीएस शंकर राम  
वायु

"ईवी लक्ष्य के लिए कंबशन इंजन वाली गाड़ियों की खरीद व निर्माण को बंद करना होगा"

भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ऑन जीरो एमिशन ट्रकिंग (सीओईजेडईटी) विभाग में कार्यरत प्रोफेसर कार्तिक आत्मनाथन और प्रोफेसर सीएस शंकर राम शून्य-उत्सर्जन ट्रकिंग, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और माल ढुलाई के विद्युतीकरण को बढ़ावा देने के लिए शोध, तकनीकी ब्लूप्रिंट और उद्योग सहयोग पर काम कर रहे हैं। डाउन टू अर्थ के अनिल अश्विनी शर्मा ने संयुक्त रूप से दोनों प्रोफेसर से भारत में इलेक्ट्रीक मोबिलिटी के अब तक के सफर और इस सेक्टर के भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से बातचीत की है। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश

Anil Ashwani Sharma

भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के लिए अब तक क्या-क्या तैयारी हो रही हैं ?

कार्तिक - हमारे आकलन के अनुसार ई-मोबिलिटी के स्तर पर इस सवाल का जवाब देना बहुत मुश्किल है। हां अगर आप रेल ट्रांसपोर्ट के इलेक्ट्रिफिकेशन को देखें तो हमने बहुत अच्छा काम किया है। बहुत ही बढ़िया तरीके से इस काम को अंजाम दिया है। अमेरिका और बाकी सभी देशों से भी कहीं बेहतर स्थिति में हैं हम। अगर ईवी के कमर्शियल गाड़ियों यानी ट्रकों को देखें तो हम अभी शुरुआत ही कर रहे हैं। अगर आप दो-पहिया वाहनों को देखें तो सरकार ने अपना काम किया है और इंडस्ट्री ने अपना काम किया है। अब इलेक्ट्रिफिकेशन का सफर धीरे-धीरे शुरू होगा। आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि लाखों ग्राहकों का एक बड़ा ग्रुप पांच साल में बदल जाएगा। इन बदलावों में 15-20 साल लगते हैं। इसी तरह ग्राहकों का व्यवहार भी धीरे-धीरे बदलता है। एक बात साफ है रेगुलेटरी नियमों ( नियामक अनुपालन ) को छोड़कर जैसे कि दिल्ली ने अभी जो किया है, उन्होंने कंबशन इंजन वाले टू-व्हीलर की बिक्री आगामी एक अप्रैल 2028 से बंद करने काका निर्णय लिया है। भारत सरकार ने विदेशों की औसत सरकारों की तुलना में बहुत अधिक काम किया है।

क्या इस मामले में और बेहतर काम किया जा सकता है ?

कार्तिक -बेशक हर कोई हर चीज में बेहतर कर सकता है इसलिए हम जो करते हैं उसे बेहतर बनाने की कोई सीमा नहीं है। इंडस्ट्री में अगर आप कार इंडस्ट्री को देखें तो मुझे लगता है कि महिंद्रा और टाटा जैसी भारतीय कंपनियों ने बहुत कुछ किया है। इलेक्ट्रिक कार डेवलपमेंट, कार डेवलपमेंट में निवेश और बाजार में लाए गए प्रोडक्ट्स की संख्या के मामले में भारतीय कंपनियों ने बहुत बेहतर काम किया है। अगर आप ट्रकों और बसों को देखें तो यह शुरुआती चरण में हैं और अभी शुरू हो रहा है। इंडस्ट्री काफी कुछ कर रही है। वे और भी बहुत कुछ कर सकते हैं। शोध का काम अभी शुरू ही हुआ है यानी हमें शुरू किए हुए लगभग 5 साल हो गए हैं। हमने देर से शुरुआत की है। एकेडेमिया ( शैक्षिक जगत ) निश्चित रूप से बहुत पहले शुरू हो सकता था, जैसे चीन में हुआ। हमने ऐसा नहीं किया। लेकिन पिछले 5 सालों में हम काफी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। हालांकि इंडस्ट्री और एकेडेमिया भी सरकारी पहलों पर प्रतिक्रिया देने में धीमे रहे हैं। लेकिन कुल मिलाकर मुझे लगता है कि ई-मोबिलिटी पर भारत का जो संदेश है वह बहुत सकारात्मक है। इसके बावजूद अगर हमारे इलेक्ट्रिफिकेशन में चीन की भूमिका और भी बड़ी होती लेकिन भौंगोलिक रणनीति की वजहों से अभी मुमकिन नहीं है। अगर हमारे इलेक्ट्रिफिकेशन में चीन की भूमिका और भी बड़ी होती तो हम और भी तेजी से आगे बढ़ते। लेकिन दूसरी बात भी बहुत जरूरी है कि हम उसे इलेक्ट्रिफिकेशन में नहीं आने दे सकते। यह हमारे राष्ट्रीय हित में नहीं है। यह एक ऐसा मौका है जो दुर्भाग्य से जियोपॉलिटिकल कारणों से हाथ से निकल गया। मुझे नहीं लगता कि हमारी सरकार गलत है। मुझे लगता है कि हमारी सरकार की नीतियां सही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसा करना मुमकिन नहीं है।

 'राइट टू रिचार्ज' बिल के मुद्दे पर आपकी क्या राय है ?

कार्तिक - इसके लिए पैसे की जरूरत होगी वरना यह सिर्फ कागज का एक टुकड़ा बनकर रह जाएगा। एक देश के तौर पर हमारे पास उतना पैसा नहीं है। अगर आप मुझे यह अधिकार देते हैं यानी कानूनी रूप से सुरक्षित अधिकार। ऐसे में यदि आप दिल्ली में रहते हैं और मान लीजिए मेरठ जा रहे हैं तो ऐसे में मैं आपको पूरे देश में हर जगह के रिचार्ज स्टेशन के बारे में नहीं बता सकता, क्योंकि हमें नहीं पता कि इसके लिए कौन पैसे देगा, कौन इसकी देखभाल करेगा और कौन सर्विस देगा। हां कुछ जगहों पर यह काम करेगा। जैसे, यदि हाउसिंग सोसायटियों को देखें। वे यह कर सकती हैं यदि रिचार्ज करने का अधिकार मिल जाए तो हाउसिंग सोसायटियां कानूनी तौर पर अपने अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स के अंदर गाड़ियों के रिचार्ज पर रोक नहीं लगा सकतीं। लेकिन सार्वजनिक जगहों पर अगर मैं अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहूं तो मेरे पास चार्जिंग की सुविधा के साथ उस अधिकार को सपोर्ट करने के लिए पैसे नहीं हैं और बात सिर्फ चार्जर की नहीं है बल्कि इलेक्ट्रिक ग्रिड की भी है। हमारे अधिकतर राज्य सरकारों में बिजली विभाग की हालत बहुत खराब है। वे लगातार सब्सिडी दे रहे हैं, सस्ती बिजली दे रहे हैं, पहले सौ यूनिट मुफ्त और फिर 500 यूनिट मुफ्त। यह सब राजनीतिक वजहों से किया जा रहा है। अब इन राजनीतिक वजहों से हमें पैसे खर्च करने पड़ते हैं। ऐसे में इसके लिए शायद ही कोई पैसा हो। चार्जिंग के अधिकार को सपोर्ट करने के लिए तो बिल्कुल भी पैसा नहीं है। लेकिन फिर भी कानूनी ढांचे में आने से इसके अच्छे असर होंगे। अगर मैं एक नया कैंपस बना रहा हूं, जैसे सेंट्रल गवर्नमेंट के कर्मचारियों के लिए रिहायशी कैंपस तो कैंपस यह नहीं कह सकता कि मैं आपको चार्जिंग की सुविधा नहीं दूंगा, आपको खुद ही इसका इंतजाम करना होगा, क्योंकि यह एक अधिकार बन जाता है। तो ऐसी जगहों पर यह काम का साबित होगा लेकिन यह बहुत छोटा क्षेत्र होगा कोई बड़ा क्षेत्र नहीं है।

क्या हम ट्रकों को इलेक्ट्रिक मोड में बदल सकते हैं?

कार्तिक - पहले से ही 1,300 इलेक्ट्रिक ट्रक चल रहे हैं, जिनकी क्षमता 55 टन तक है। इलेक्ट्रिक ट्रक बनाने वाली 5 कंपनियां पहले से ही मौजूद हैं। टाटा मोटर्स, अशोक लेलैंड, प्रोपेल, इलेक्ट्रा आदि। असल में 7-8 कंपनियां हैं जो हेवी इलेक्ट्रिक ट्रक बना रही हैं। टेक्नोलॉजी अब काफी मैच्योर हो चुकी है। क्योंकि भारत में हमारे पास जीरो-एमिशन ट्रकों के लिए एक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस है। यह सपोर्ट सेंटर इंडस्ट्री और सरकार के साथ मिलकर काम करता है। चीन में हजारों-लाखों इलेक्ट्रिक ट्रक हैं और यूरोप में पहले ही लगभग 8 से 10,000 इलेक्ट्रिक ट्रक हैं। तो अब इसमें कोई शक नहीं है कि इलेक्ट्रिफिकेशन मुमकिन है। हमारे पास एक रिपोर्ट है जो ट्रकों के इस्तेमाल ( पेनिट्रेशन ) पर है। सरकार को भी लगता है कि ट्रकों को इलेक्ट्रिक बनाने का यह अभियान बहुत सफल होगा। सरकार अब एक और फाइनेंसिंग स्कीम लेकर आ रही है, जिसमें वे 1 बिलियन डालर अलग से रख रहे हैं। यह कर्ज रिस्क कवर देने के लिए है। लेंडर्स के लिए रीपेमेंट रिस्क कवर। आज समस्या क्या है ? अगर मैं कोई डीजल ट्रक बेचता हूं और वह व्यक्ति  (आज के समय में 2 प्रतिशत लोग) अपने बकाया पैसे यानी मासिक किस्तें ठीक से नहीं चुकाते तो मेरे पास बस यही विकल्प है कि मैं गाड़ी जब्त कर लूं, बस इतना ही कर सकता हूं। हम और कुछ नहीं कर सकते। गाड़ी फाइनेंस करने का मॉडल इसी तरह काम करता है। अब अगर मैं लोन देने वाले के तौर पर डीजल ट्रक जब्त करता हूं तो मुझे पता होता है कि 2 साल पुराने या 5 साल पुराने ट्रक की मार्केट वैल्यू क्या है। इसके लिए एक सेकंड हैंड मार्केट मौजूद है लेकिन अगर मैं इलेक्ट्रिक ट्रक फाइनेंस करता हूं। अब अगर मैं ट्रक ज़ब्त कर लूं तो मुझे नहीं पता कि उनका क्या करूंगा। इनका कोई सेकंड हैंड मार्केट नहीं है। तो एक लेंडर ( कर्ज देने वाले ) के तौर पर अगर मुझे कर्ज देना है तो मुझे अपने रिस्क को कवर करना होगा। अब सरकार उस रिस्क कवरेज प्रोडक्ट को एक अलग स्कीम के तौर पर ला रही है। इस पर कई कई बार बातचीत ( कंसल्टेशन ) भी हुई है। सरकार ने हमसे भी सलाह ली है और हमारे सेंटर ऑफ एक्सीलेंस से इनपुट भी लिए गए हैं और वे 3-4 प्रतिशत की ब्याज में कमी वाली सब्सिडी भी दे रहे हैं तो फाइनेंसिंग के लिए भी सरकार पीएमई डायरेक्ट के अलावा एक नई स्कीम ला रही है।

शंकर राम -मुझे लगता है कि सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर जीरो एमिशन ट्रकिंग में भी हम बैटरी इलेक्ट्रिक ट्रकों के अलग-अलग पहलुओं पर काम कर रहे हैं। अध्ययन से पता चलता है कि भारत में बैटरी इलेक्ट्रिक ट्रकों की संख्या तेजी से बढ़ेगी। यह कुछ दस-बीस से शुरू होकर अब शायद 1,000-1,200 के करीब है। यह हर साल तेजी से बढ़ेगा। हमारी सरकार ने भी कुछ योजनाएं शुरू की हैं। बेशक ट्रकों के लिए बहुत छोटे स्तर पर पीएमई के जरिए लेकिन मुझे लगता है कि ऐसी पहल से भी इसे अपनाने में बढ़ावा मिलेगा।

 ई-कार के मामले में क्या चुनौतियां हैं और आगे का रास्ता क्या है ?

कार्तिक- दे कारों के लिए जैसा कि मैंने आपको पहले बताया कि सरकार अभी ट्रकों के लिए एक स्कीम ला रही है और यह सही भी है। इसका पहला कारण जुलवायु और प्रदूषण है। दूसरा था ऊर्जा सुरक्षा  और तीसरा पैसा। अब  उत्सर्जन और उर्जा सुरक्षा दोनों के लिए ट्रक और बसें आयात किए गए ईंधन का 45 प्रतिाश्त इस्तेमाल कर रहे हैं। एक देश के तौर पर नीतियों में एक जैसापन लाने के लिए सरकार सबसे पहले ट्रक और बसों के लिए लेंडर्स को रीसेल प्राइस रिस्क कवर दे रही है। सरकार जो ईंधन आयात करती है उसका 45 प्रतिाश्त ईंधन तो यही लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। हर कोई कार के बारे में बात करता है, चार्ज करने के अपने अधिकार के बारे में, रीसेल प्राइस कवर वगैरह के बारे में। लेकिन कारें  इतना अधिक ईंधन इस्तेमाल नहीं कर रहीं हैं कि मुझे उनकी चिंता करनी पड़े। मुझे पहले उन बड़े वाहनों के बारे में सोचना है जो ऊर्जा सुरक्षा और प्रदूषण में सबसे अधिक योगदान दे रहे हैं। मैं सबसे पहले उन्हीं पर बात करना चाहता हूं। फिर बाद में कारों पर आऊंगा यह अवधि अगले 5 या 7 साल बाद की संभव है। पहले मैं इसे ट्रकों और बसों के लिए बात करना चाहता हूं। इसलिए सरकार की यह एक अच्छी नीति है।  दो पहियों को देखें तो सरकार ने पहले ही एक छोटी स्कीम शुरू की है लेकिन यह बहुत बड़ी स्कीम नहीं है और उन्होंने इसे भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) के माध्यम से शेल फाउंडेशन के साथ मिलकर मई 2026 में 3.1 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 250 करोड़ रुपएए के हरित ऋणों को कवर करने के लिए) का फंड बनाया है । यह रीसेल प्राइस डेट कवर और डेट लॉस कवर देता है। तो टू-व्हीलर्स के लिए थोड़ी सुरक्षा तो है ही। ट्रकों और बसों के लिए वे लगभग 50,000 से 1,00,000 ट्रकों के लिए एक बड़ी स्कीम ला रहे हैं। उसके बाद, सेकंड-हैंड मार्केट इसे संभाल लेगा। यहां तक कि आप मुझसे यह सवाल भी नहीं पूछेंगे यदि मैं 10 साल बाद जिंदा रहा और आप यह इंटरव्यू ले रहे होंगे। आप यह सवाल नहीं पूछेंगे, क्योंकि इलेक्ट्रिक कारों के लिए भी काफी सेकंड-हैंड मार्केट होगा। इसलिए समस्या खत्म हो जाएगी। इसकी जरूरत सिर्फ शुरुआती दौर में होती है तो मुझे लगता है कि अगले 3-5 सालों में कारों के लिए पॉलिसी नीतियां आ जाएंगी लेकिन अभी मुझे लगता है कि राष्ट्रीय हित में ट्रकों और बसों के लिए नीतियों की अधिक जरूरत है। हमें तेल की सबसे अधिक खपत करने वालों यानी ट्रकों और बसों पर ध्यान देना चाहिए। इस सेकटर में सरकार बहुत अच्छी स्कीमें दे रही है। वह इस नए जोखिम यानी रीसेल वैल्यू मार्केट प्रोटेक्शन जोखिम के बारे में सोच रहे हैं।

शंकर राम – इसमें एक और बात है कि अगर हम आमतौर पर गाड़ियों के रीसेल (दोबारा बेचने) की बात करें तो लोग शायद 5-6 साल बाद उन्हें बेचना चाहेंगे। अगर आप पेट्रोल और डीजल वाली गाड़ियों के मुकाबले इलेक्ट्रिक गाड़ियों, जैसे टू-व्हीलर, थ्री-व्हीलर और फोर-व्हीलर की कुल संख्या देखेंतो यह संख्या काफी कम है। तो उस सेगमेंट पर ध्यान देना अधिक सही है जो सबसे अधिक ईंधन की खपत करता है यानी ट्रक और बसें। मुझे लगता है कि यहां एक छोटा सा बदलाव भी बड़ा असर डाल सकता है। मेरा मानना है कि इसमें 7-8 साल बाद  रीसेल (दोबारा बेचने) का पोटेंशियल है तो मुझे लगता है कि इन सभी वजहों को देखते हुए यह एक सही रणनीति है।