दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ते ही धान की पराली में आग और आरोप प्रत्यारोप का दौर फिर शुरू हो गया है। इसके साथ ही पंजाब के किसान खलनायक के तौर पर पेश किए जाने लगे हैं क्योंकि पंजाब में जलने वाली पराली का धुआं दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर बढ़ाता है।
आंकड़े भी बताते हैं कि इस साल 15 सितंबर से 5 नवंबर के बीच पंजाब में सबसे अधिक 2,787 पराली में आग की घटनाएं दर्ज की गई हैं। आंकड़े यह भी बताते हैं कि उत्तर भारत के सात राज्यों में इस अवधि में दर्ज 5,737 पराली में आग की घटनाओं में 49 प्रतिशत हिस्सेदारी अकेले पंजाब की है।
चूंकि इस मौसम में हवा का प्रवाह पूर्व से पश्चिम की तरफ रहता है और हवा की गति भी बेहद धीमी हो जाती है, इसलिए दिल्ली-एनसीआर में पीएम-2.5 की सघनता काफी बढ़ जाती है, जिसका सीधा असर वायु गुणवत्ता पर पड़ता है।
लेकिन पराली में आग और उससे होने वाले वायु प्रदूषण की समस्या केवल पंजाब की ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों की है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के कंसोर्टियम फॉर रिसर्च ऑन एग्रोईकोसिस्टम मॉनिटरिंग एंड मॉडलिंग फ्रॉम स्पेस (सीआरईएएमएस) द्वारा 5 नवंबर को जारी बुलेटिन के अनुसार, भारत के सात राज्यों-पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में धान की कटाई के बाद पराली में आग लगाने की घटनाएं देखी जा रही हैं।
कुछ राज्यों में इनके घटने की प्रवृत्ति है तो कुछ राज्यों में यह लगातार बढ़ रही हैं। पंजाब और हरियाणा के अतिरिक्त ज्यादातर राज्यों में इस मौसम में हवा की गति और प्रवाह दिल्ली की तरफ न होने के कारण पराली में आग सुर्खियां नहीं बन पाती।
उदाहरण के लिए, पराली में आग के लिए सबसे अधिक बदनाम पंजाब में ऐसी घटनाएं लगातार कम हो रही हैं। 2020 में इस राज्य में 53107, 2021 में 28937, 2022 में 29400, 2023 में 17403, 2024 में 4755, 2025 में 2933 घटनाएं सैटेलाइट के माध्यम से रिकॉर्ड की गई थीं।
मध्य प्रदेश पराली में आग के मामले में सबसे आगे
आंकड़े बताते हैं कि पिछले सात वर्षों में पंजाब में एक साल को छोड़कर अन्य सभी वर्षों में पराली में आग की घटनाओं में खासी कमी आई है। खासकर पिछले तीन वर्षों में इनमें भारी कमी दर्ज की गई है। इसी तरह हरियाणा में 2021 के बाद लगातार कम घटनाएं दर्ज हो रही हैं। हरियाणा में 2021 में 3997 घटनाओं के मुकाबले 2026 में 80 घटनाएं ही दर्ज की गई हैं। वहीं दूसरी तरफ राजस्थान स्थिति में खास परिवर्तन नहीं आया है। इस राज्य में 2020 में 888 घटनाएं दर्ज की थीं। यह संख्या 2026 में 1039 थी।
मध्य प्रदेश में कहानी दूसरी है। यह राज्य पिछले कुछ वर्षों में पंजाब को पीछे छोड़कर पराली में सबसे अधिक आग दर्ज करने वाला राज्य बना हुआ है। 2025 में उत्तर भारत के छह राज्यों में 33028 घटनाएं दर्ज हुई थीं। इनमें सबसे अधिक 17,067 घटनाएं मध्य प्रदेश में दर्ज हुई थीं। यानी मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक थी। पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश 7290 पराली में आग की घटनाओं के साथ दूसरे स्थान पर था जबकि पंजाब 5114 घटनाओं के साथ तीसरे स्थान पर था।
2024 में भी कुल 36893 पराली में आग की घटनाओं में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 16074 थी और वह पहले स्थान पर था। 10887 घटनाओं के साथ पंजाब दूसरे स्थान पर था। इससे पहले के वर्षों में पंजाब धान की पराली में आग के मामले में लगातार पहले स्थान पर रहा।
2024 में जब मध्य प्रदेश में पहली बार सबसे अधिक पराली जलाने का अनचाहा रिकार्ड दर्ज हुआ तो डाउन टू अर्थ ने सबसे अधिक पराली जलाने वाले जिले श्योपुर का दौरा किया और पाया कि किसान सोयाबीन, उड़द जैसी पारंपरिक फसलों के स्थान पर तेजी से धान की अपनाते जा रहे हैं। यह स्थिति राज्य के अधिकांश जिलों की थी।
डाउन टू अर्थ ने पाया था कि यहां के किसान जागरुकता में कमी और प्रशासन की सख्ती के अभाव में पराली में आग लगा रहे हैं। इस अवधि में हवा की गति दक्षिण और दक्षिण पश्चिम में रहने के कारण मध्य प्रदेश का धुआं दिल्ली की तरफ नहीं आता जिससे पराली में आग की घटनाएं राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खिंया नहीं बन पाती।