सीएसई की कार्यकारी निदेशक (रिसर्च एंड एडवोकेसी) अनुमिता रॉयचौधरी अनिल अग्रवाल डायलॉेग को संबोधित करते हुए। फोटो: विकास चौधरी  
वायु

स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट रिपोर्ट: निगरानी की कमी से कमजोर हुई वायु प्रदूषण की लड़ाई

भारत की केवल 15 प्रतिशत आबादी ही वायु प्रदूषण की निगरानी के लिए लगे रियल टाइम मॉनिटर के पास रहती है, बाकी 85 प्रतिशत, यानी 1.2 अरब से अधिक लोग, ऐसे क्षेत्रों में सांस लेते हैं जहां प्रदूषण का कोई नियमित माप उपलब्ध नहीं है

DTE Staff

  • निगरानी केवल कुछ बड़े शहरों तक सीमित है. पूरे जिले, औद्योगिक क्षेत्र और तेजी से बढ़ रहे शहरों के बाहरी इलाके अब भी निगरानी व्यवस्था से बाहर हैं.

  • सीएसई और डाउन टू अर्थ की वार्षिक ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट’ 2026 रिपोर्ट कल अनिल अग्रवाल डायलॉग में जारी की गई।

  • 'स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट 2026' रिपोर्ट के अनुसार, छोटे शहरों में प्रदूषण की स्थिति गंभीर है।

  • इस असमानता को दूर करने के लिए एकीकृत और पारदर्शी आंकड़ा व्यवस्था की जरूरत है।

1.4 अरब से अधिक आबादी वाले भारत में अलग-अलग जगहों पर प्रदूषण का स्तर भी अलग है, लेकिन देश में हवा की जांच करने की व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं है, जितनी जरूरत है। ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट 2026 ’ रिपोर्ट में कहा गया है कि वायु प्रदूषण की समस्या बड़ी और जटिल है, पर निगरानी व्यवस्था अभी उसके मुताबिक नहीं बनी है।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की अर्बन लैब की डिप्टी प्रोग्राम मैनेजर शरणजीत कौर ने कहा, “हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि भारत की केवल 15 प्रतिशत आबादी. करीब 20 करोड़ लोग ऐसे क्षेत्र में रहते हैं जहां 10 किलोमीटर के दायरे में निरंतर वायु गुणवत्ता मॉनिटर मौजूद है। शेष 85 प्रतिशत, यानी 1.2 अरब से अधिक लोग, ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां प्रदूषण का नियमित और विश्वसनीय मापन ही नहीं हो रहा।” कौर स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट 2026 ’ रिपोर्ट के प्रमुख लेखकों में शामिल हैं।

वायु प्रदूषण की निगरानी कैसे करता है भारत?

भारत में निगरानी की दो प्रमुख व्यवस्थाएं हैं। पहली, राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम, जिसकी शुरुआत 1984-85 में हुई थी। यह मैनुअल केंद्रों पर आधारित है, जहां सप्ताह में दो बार वायु गुणवत्ता मापी जाती है। इससे कुछ गिने-चुने प्रदूषकों के लंबे समय का औसत आंकड़ा मिलता है।

दूसरी व्यवस्था है निरंतर वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्र, जो वास्तविक समय यानी रियल टाइम में हर घंटे कई प्रकार के प्रदूषकों का आंकड़ा देते हैं।

वर्तमान में देश में 294 शहरों में 562 रियल टाइम मॉनिटर और 419 शहरों.कस्बों में 966 मैनुअल केंद्र कार्यरत हैं, लेकिन कौर बताती हैं कि ये बड़े आंकड़े एक सच्चाई को छिपा देते हैं. निगरानी मुख्य रूप से बड़े शहरों तक सीमित है। वह कहती हैं, “पूरे के पूरे जिले, औद्योगिक क्षेत्र और तेजी से बढ़ते शहरों के बाहरी इलाके निगरानी तंत्र से बाहर हैं।”

सीएसई में रिसर्च एवं एडवोकेसी की कार्यकारी निदेशक और सतत शहरीकरण कार्यक्रमों की प्रमुख अनूमिता रायचौधरी कहती हैं, “निगरानी में यह कमी केवल जानकारी की कमी नहीं है, बल्कि इससे यह भी पता चलता है कि पर्यावरण से जुड़ी प्रशासनिक व्यवस्था में कितनी गहरी असमानता है। जिन शहरों में ज्यादा मॉनिटर लगे हैं, वे सुधार दिखा सकते हैं, स्वच्छ हवा के लिए पैसा पा सकते हैं और अपनी योजनाएं बना सकते हैं. लेकिन सैकड़ों छोटे शहर ऐसे हैं, जहां धूल-कण वाला प्रदूषण उतना ही या उससे ज्यादा हो सकता है, फिर भी वहां तुरंत मिलने वाला कोई आंकड़ा ही नहीं है।”

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की स्थिति

चंडीगढ़ में हर नागरिक 10 किलोमीटर के दायरे में किसी न किसी रियल टाइम मॉनिटर के भीतर रहता है। इसमें दिल्ली दूसरे स्थान पर है, जहां केवल 3.5 प्रतिशत आबादी ही माप की सीमा से बाहर है। पुडुचेरी तीसरे स्थान पर है, जहां लगभग 50 प्रतिशत क्षेत्र निगरानी के दायरे में है।

महाराष्ट्र के पास देश के सबसे बड़े निगरानी तंत्रों में से एक है, लेकिन अधिकतर केंद्र मुंबई, पुणे और नागपुर के आसपास केंद्रित हैं, जिससे राज्य के बड़े हिस्से प्रतिनिधित्व से बाहर रह जाते हैं।

बिहार में केवल 13 प्रतिशत लोग ही मॉनिटर के पास 10 किलोमीटर के दायरे में रहते हैं। उत्तर प्रदेश की स्थिति और खराब है, जहां केवल 9 प्रतिशत आबादी ही इस दायरे में आती है। पश्चिम बंगाल में केवल 19 प्रतिशत आबादी किस तरह हवा में रहती हैं, उसकी निगरानी हो पाती है। हुगली और मुर्शिदाबाद जैसे घनी आबादी वाले जिलों में एक भी रियल टाइम मॉनिटर नहीं हैं।

पूर्वोत्तर भारत में केवल असम में कुछ केंद्र मौजूद हैं. बाकी राज्यों में एक या दो केंद्र ही हैं।

शरणजीत कौर के अनुसार, “भारत के 742 जिलों में से 64 प्रतिशत से अधिक जिलों में निरंतर निगरानी की कोई व्यवस्था ही नहीं है।”

अनूमिता रायचौधरी इसे इस तरह संक्षेप में बताती हैं, “इसका मतलब है कि देश में रोज जारी होने वाला वायु गुणवत्ता सूचकांक, नीतियों का आकलन और प्रदर्शन आधारित अनुदान, भारत के एक छोटे और शहरी हिस्से के आंकड़ों पर आधारित है। बाकी जगहों पर प्रदूषण लोगों की रोजमर्रा की हकीकत है, लेकिन वह आधिकारिक रूप से दर्ज नहीं होता।”

इस विषय पर अधिक जानकारी और आंकड़ों के लिए ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट’ रिपोर्ट में वायु प्रदूषण से संबंधित अध्याय देखा जा सकता है।

आगे की राह

रायचौधरी के अनुसार, भारत में वायु गुणवत्ता की निगरानी अब एक ही तरह की व्यवस्था तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अगले चरण में ऐसी मिली-जुली व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें सरकारी मानक मॉनिटर, सस्ते लेकिन भरोसेमंद सेंसर और उपग्रह से मिलने वाले आंकड़े साथ मिलकर काम करें. इससे आंकड़े सही भी होंगे और ज्यादा से ज्यादा इलाकों को कवर किया जा सकेगा।

वे आगे कहती हैं, “ साथ ही यह भी जरूरी है कि मॉनिटर ऐसे स्थानों पर लगाए जाएं, जहां जोखिम अधिक है। जैसे स्कूल, अस्पताल आदि। जैसे-जैसे शहर फैलते हैं और उत्सर्जन के स्रोत बदलते हैं, वैसे-वैसे निगरानी केंद्रों की स्थिति में भी समय-समय पर बदलाव होना चाहिए और नए प्रदूषण पैटर्न तथा भूमि उपयोग के अनुसार स्थानों की नियमित समीक्षा होनी चाहिए।”

उन्होंने यह भी कहा कि भारत को ऐसी एकीकृत और पारदर्शी आंकड़ा व्यवस्था की जरूरत है, जहां अलग-अलग संस्थाओं के सभी आंकड़े एक साथ जोड़कर एक आसान राष्ट्रीय पोर्टल पर सबके लिए उपलब्ध हों।