पिछले 20 वर्षों में दिल्ली, भारत में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के नए उपायों को लागू करने और परखने की प्रयोगशाला रही है। लेकिन नई तकनीक आने के बावजूद पेट्रोल और डीजल (आईसीई) से चलने वाले वाहन आज भी शहर के वायु प्रदूषण का बड़ा कारण हैं।
लोगों को जहरीली हवा से बचाने और स्वच्छ वायु के मानकों को हासिल करने के लिए अब केवल पेट्रोल-डीजल वाहनों को थोड़ा-थोड़ा कम प्रदूषण वाला बनाने से काम नहीं चलेगा। इसके बजाय ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो जीरो टेलपाइप एमिशन वाले वाहनों को बढ़ावा दें और उनके लिए स्पष्ट लक्ष्य तय करें। जीरो टेलपाइप एमिशन वाले वाहन उन्हें कहा जाता है, जिनके चलने समय साइलेंसर (एग्जॉस्ट) से किसी भी प्रकार की प्रदूषक गैस या धुआं नहीं निकलता।
परिवहन क्षेत्र में ऊर्जा परिवर्तन की दिशा से यह साफ दिखाई देता है। दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने वाहन पोर्टल के वाहन पंजीकरण के आंकड़ों और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के ऊर्जा आंकड़ों का विश्लेषण किया। इससे पता चलता है कि डीजल वाहनों को हतोत्साहित करने के लिए लागू सख्त नीतियों के कारण दिल्ली के परिवहन क्षेत्र की ऊर्जा संरचना में बड़ा बदलाव आया है।
वित्त वर्ष 2012-13 से 2025-26 के बीच दिल्ली में डीजल वाहनों का पंजीकरण 72 प्रतिशत घट गया। सबसे अधिक गिरावट डीजल टैक्सियों में दर्ज की गई, जिनका पंजीकरण 96 प्रतिशत कम हुआ। इसके अलावा माल ढोने वाले डीजल वाहनों का पंजीकरण 78 प्रतिशत और निजी डीजल कारों का पंजीकरण 71 प्रतिशत घट गया।
इन नीतिगत उपायों का असर दिल्ली के परिवहन क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले ईंधनों के स्वरूप पर भी पड़ा। वर्ष 2016-17 में परिवहन क्षेत्र की कुल ऊर्जा खपत में डीजल की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर थी, जो घटकर 2025-26 में केवल 15 प्रतिशत रह गई।
इसके विपरीत, अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन सीएनजी का उपयोग लगातार बढ़ा। वर्ष 2018-19 में, जब परिवहन क्षेत्र की कुल ऊर्जा खपत सबसे अधिक थी, तब सीएनजी की हिस्सेदारी 57 प्रतिशत थी, जबकि पेट्रोल और डीजल की हिस्सेदारी 29-29 प्रतिशत थी।
इससे स्पष्ट है कि दिल्ली के परिवहन तंत्र में कभी सबसे प्रमुख ईंधन रहा डीजल अब अपनी प्रमुख स्थिति खो चुका है।
दिल्ली के परिवहन क्षेत्र में ऊर्जा का बदलता परिदृश्य: डीजल की घटती खपत
दिल्ली में यह बदलाव 1998 से 2023 के बीच लागू किए गए कानूनी प्रावधानों और न्यायिक निर्देशों की लंबी श्रृंखला का परिणाम है। वर्ष 1998 में सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि बसों, ऑटो-रिक्शा और टैक्सियों सहित सभी सार्वजनिक परिवहन वाहनों को सीएनजी में बदला जाए।
इसके बाद दिल्ली ने वाहन ईंधन और उत्सर्जन मानकों को तेजी से सख्त किया। 1999 में भारत स्टेज (बीएस)-एक और 2000 में बीएस-दो मानक लागू किए गए। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से मानकों को और कड़ा करते हुए 1 अप्रैल 2020 से पूरे देश में बीएस-चार मानक लागू किए गए। वर्ष 2023 में बीएस-छह स्टेज-2 और वास्तविक सड़क परिस्थितियों में वाहन प्रदूषण की जांच करने वाले रियल ड्राइविंग एमिशन नियम भी लागू कर दिए गए।
डीजल वाहनों के उपयोग को कम करने के लिए आर्थिक स्तर पर भी कई सख्त कदम उठाए गए। दिल्ली में प्रवेश करने वाले भारी ट्रकों पर पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क लगाया गया। बड़ी डीजल कारों और एसयूवी पर पर्यावरण प्रदूषण शुल्क लगाया गया, जबकि दिल्ली में बिकने वाले डीजल पर वायु पर्यावरण शुल्क (एयर एम्बिएंस चार्ज) भी लगाया गया।
इसके अलावा, वाहनों की संख्या नियंत्रित करने के लिए 10 साल पुराने डीजल और 15 साल पुराने पेट्रोल वाहनों के संचालन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया। साथ ही, राजधानी से केवल होकर गुजरने वाले, लेकिन दिल्ली में जिनका कोई गंतव्य नहीं था, ऐसे ट्रकों को शहर में प्रवेश से रोकने के लिए पूर्वी और पश्चिमी परिधीय एक्सप्रेस-वे का निर्माण किया गया, ताकि वे दिल्ली के बाहर से ही अपने गंतव्य तक जा सकें।
इन सभी चरणबद्ध उपायों के बावजूद, जिनके तहत बीएस-1 से बीएस-6 तक प्रति वाहन कणीय प्रदूषण (पार्टिकुलेट मैटर) उत्सर्जन में 90-95 प्रतिशत से अधिक की कमी लाई गई, दिल्ली अब भी स्वच्छ वायु गुणवत्ता के लक्ष्य हासिल नहीं कर सकी है। इसकी सबसे बड़ी वजह सड़कों पर वाहनों की लगातार बढ़ती संख्या है।
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) द्वारा विश्लेषित प्रदूषण के स्रोतों पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि दिल्ली में पीएम2.5 प्रदूषण का सबसे बड़ा स्थानीय स्रोत अब भी वाहन हैं। सर्दियों में कुल पीएम2.5 प्रदूषण में वाहनों की हिस्सेदारी 19 से 24 प्रतिशत (औसतन 23 प्रतिशत) रहती है, जबकि गर्मियों में यह 18 से 21 प्रतिशत (औसतन 19 प्रतिशत) होती है।
इतना ही नहीं, गंभीर प्रदूषण वाले दिनों के विस्तृत विश्लेषण से पता चलता है कि दिल्ली में स्थानीय स्तर पर होने वाले कुल कणीय प्रदूषण उत्सर्जन का लगभग आधा हिस्सा अकेले परिवहन क्षेत्र से आता है, जो अन्य सभी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक है।
दिल्ली में पीएम2.5 का वार्षिक रुझान: प्रदूषण घटा, पर खतरा अभी टला नहीं
दिल्ली के इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि केवल पेट्रोल-डीजल जैसे दहन आधारित इंजनों को पहले से कम प्रदूषणकारी बनाते रहने से लोगों के स्वास्थ्य की पर्याप्त सुरक्षा नहीं हो सकती और न ही स्वच्छ वायु गुणवत्ता के मानकों को हासिल किया जा सकता है।
इसी पृष्ठभूमि में दिल्ली की इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) नीति पहले की केवल ईंधन बदलने वाली रणनीति से आगे बढ़कर, वाहनों के विद्युतीकरण के लिए स्पष्ट और महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय करती है। इस नीति में सबसे अधिक चलने वाले वाहनों जैसे सार्वजनिक बसें, दोपहिया और तिपहिया वाहन, डिलीवरी वाहन तथा ऐप-आधारित टैक्सी सेवाओं को प्राथमिकता दी गई है। इसका उद्देश्य उन स्थानों पर स्थानीय वायु प्रदूषण को खत्म करना है, जहां यात्रियों और आम लोगों के प्रदूषण के संपर्क में आने का खतरा सबसे अधिक होता है।
राष्ट्रीय स्तर पर जरूरी कदम
दिल्ली का अनुभव बताता है कि केवल पेट्रोल-डीजल जैसे दहन आधारित इंजनों को नई और उन्नत प्रदूषण नियंत्रण तकनीक से लैस कर देने भर से शहरी वायु प्रदूषण की समस्या पूरी तरह हल नहीं हो सकती। पूरे देश में हर साल करीब 30 लाख नए वाहन सड़कों पर उतर रहे हैं, जिससे स्वच्छ इंजन तकनीक से मिलने वाला लाभ काफी हद तक खत्म हो जाता है।
ब्लैक कार्बन जैसे अल्पकालिक जलवायु प्रदूषकों पर हुए शोध बताते हैं कि आधुनिक बीएस-6 और यूरो-6 तकनीक वाले फिल्टर कणीय प्रदूषण की कुल मात्रा तो कम करते हैं, लेकिन अधजला ईंधन, ठंडे इंजन को स्टार्ट करने के दौरान होने वाला उत्सर्जन और लंबे समय तक इस्तेमाल से इंजन के घिसने जैसी वजहों से प्रदूषण अब भी खतरनाक स्तर पर बना रहता है।
घनी आबादी वाले शहरों में, जहां वायु प्रदूषण को 30 से 70 प्रतिशत तक कम करने की जरूरत है, वहां लोगों को जहरीले प्रदूषण से बचाने के लिए ऐसे वाहनों की जरूरत है जिनके साइलेंसर (एग्जॉस्ट) से कोई भी प्रदूषक न निकले। यह लक्ष्य केवल बैटरी से चलने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों या अन्य शून्य-उत्सर्जन तकनीक वाले वाहनों से ही हासिल किया जा सकता है।
इस बदलाव के लिए स्पष्ट लक्ष्य तय करना जरूरी है, लेकिन भारत के मौजूदा सरकारी मानक अभी वैश्विक शून्य-उत्सर्जन (जीरो एमिशन) मानकों से अलग हैं।
कैलिफोर्निया एयर रिसोर्सेज बोर्ड (सीएआरबी) और यूरोपीय संघ (ईयू) केवल उन्हीं वाहनों को शून्य-उत्सर्जन वाहन मानते हैं, जिनमें आंतरिक दहन इंजन (पेट्रोल, डीजल या सीएनजी इंजन) बिल्कुल नहीं होता। इसमें बैटरी से चलने वाले इलेक्ट्रिक वाहन और हाइड्रोजन फ्यूल सेल वाहन शामिल हैं।
इसी तरह चीन भी सामान्य (नॉन-प्लग-इन) हाइब्रिड वाहनों को शून्य-उत्सर्जन वाहन नहीं मानता, बल्कि उन्हें केवल ईंधन की बचत करने वाले (फ्यूल-एफिशिएंट) वाहन की श्रेणी में रखता है।
इसके विपरीत, भारत में नीति आयोग के ढांचे में फ्लेक्स-फ्यूल (उच्च इथेनॉल मिश्रण) वाले वाहन, संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) से चलने वाले वाहन और सामान्य हाइब्रिड वाहनों जैसी मध्यवर्ती तकनीकों को भी शुद्ध बैटरी से चलने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) के समान श्रेणी में रखा गया है।
इस मिश्रित परिभाषा के कारण इन बीच की तकनीक वाले दहन इंजन वाहनों को भी वे सब्सिडी, कर छूट और ईंधन दक्षता से जुड़े प्रोत्साहन (सुपर-क्रेडिट) मिल जाते हैं, जो मूल रूप से शुद्ध इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए बनाए गए हैं।
इसका नतीजा यह होता है कि वाहन कंपनियों पर पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहन विकसित करने, देश में बैटरी निर्माण बढ़ाने और शून्य-उत्सर्जन वाहनों की अलग आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) तैयार करने का दबाव कम हो जाता है।
तब देशभर में तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ने के लिए भारत को अल्पकालिक सब्सिडी पर निर्भर रहने के बजाय सख्ती से लागू होने वाले कानूनी नियम बनाने होंगे। साथ ही, इस बदलाव में आ रही बड़ी व्यावहारिक और परिचालन संबंधी बाधाओं को भी दूर करना होगा।
पीएम ई-ड्राइव जैसी उपभोक्ता सब्सिडी योजनाओं का बजट घटने के साथ अब इस क्षेत्र की दीर्घकालिक प्रगति उन नीतिगत उपायों पर निर्भर करेगी, जिनका अब तक पर्याप्त उपयोग नहीं हुआ है। इनमें वाहन निर्माताओं के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी बिक्री लक्ष्य तय करना और आपूर्ति पक्ष (सप्लाई साइड) से जुड़े सख्त नियम लागू करना शामिल है।
साथ ही, ऐसी नीतियों में मौजूद कमियों को भी दूर करना होगा, जो इस बदलाव की रफ्तार को धीमा करती हैं। उदाहरण के लिए, कॉरपोरेट औसत ईंधन दक्षता (सीएएफई-3) मानकों को फिलहाल हाइब्रिड और जैव-ईंधन (बायोफ्यूल) से चलने वाले वाहनों को अतिरिक्त प्रोत्साहन (क्रेडिट) देकर कमजोर किया गया है। वहीं, पर्यावरण संबंधी कानूनों का भी प्रभावी ढंग से पालन नहीं कराया जा रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन क्षेत्रों में भारत अभी पीछे है, वहां तेजी से निवेश और विस्तार करना होगा। इनमें एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (एसीसी) योजना के तहत देश में बैटरी निर्माण बढ़ाना, शहरों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर मालवाहक मार्गों के साथ भरोसेमंद चार्जिंग स्टेशन विकसित करना तथा वाणिज्यिक वाहनों के लिए हरित (ग्रीन) ऋण की विशेष व्यवस्था करना शामिल है।
इसलिए अब केवल सब्सिडी के भरोसे रहने के बजाय दस प्रमुख रणनीतिक कदमों पर आधारित एक महत्वाकांक्षी और सख्ती से लागू की जाने वाली कार्ययोजना अपनानी होगी। इसकी शुरुआत वाहन निर्माताओं के लिए अनिवार्य बिक्री लक्ष्य तय करने, सीएएफई (कॉरपोरेट औसत ईंधन दक्षता) मानकों को और सख्त बनाने, राज्यों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित करने तथा सरकारी वाहन बेड़ों और ऐप-आधारित टैक्सी सेवाओं के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद अनिवार्य करने से होनी चाहिए।
इसके बाद इलेक्ट्रिक बसों की खरीद और संचालन से जुड़े अनुबंधों में जोखिम कम करना, दोपहिया और तिपहिया इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए आसान वित्तपोषण (फाइनेंस) उपलब्ध कराना, डिलीवरी वाहनों के विद्युतीकरण के लिए अनिवार्य लक्ष्य तय करना तथा प्रमुख मालवाहक गलियारों (फ्रेट कॉरिडोर) में इलेक्ट्रिक ट्रकों को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रोत्साहन देना जरूरी होगा।
इसके साथ ही, सभी के लिए सुलभ सार्वजनिक चार्जिंग नेटवर्क सुनिश्चित करना, देश में बैटरी रीसाइक्लिंग उद्योग विकसित करना और बैंकों द्वारा ऋण देने में आने वाली बाधाओं को दूर करना भी आवश्यक है। इन कदमों से इलेक्ट्रिक वाहनों के व्यापक प्रसार में बची हुई प्रमुख व्यावहारिक चुनौतियों को दूर किया जा सकेगा।
इस समग्र कार्ययोजना को प्रभावी ढंग से लागू करना इसलिए जरूरी है, ताकि इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी सेल के लिए लंबे समय तक स्थिर और सुनिश्चित मांग तैयार हो सके। ऐसी निरंतर मांग से यह सुनिश्चित होगा कि सरकार की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं के तहत जिन इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरियों के निर्माण को बढ़ावा दिया जा रहा है, उनके लिए बाजार भी उपलब्ध हो और उनका पर्याप्त उपयोग हो सके।
दीर्घकाल में ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ हवा सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी है कि भारत की राष्ट्रीय नीतियां ऐसे कड़े शून्य-उत्सर्जन ढांचे के अनुरूप हों, जिसमें केवल उन्हीं वाहनों को शून्य-उत्सर्जन माना जाए जिनके साइलेंसर (टेलपाइप) से कोई भी प्रदूषक नहीं निकलता। इससे न केवल देश की पेट्रोलियम ईंधन पर निर्भरता कम होगी, बल्कि शहरों में वायु प्रदूषण घटाने के लक्ष्य भी अधिक प्रभावी ढंग से हासिल किए जा सकेंगे।