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भारत का ई-सफर: इंडिया इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इंडेक्स में उत्तर प्रदेश का प्रदर्शन बेहतर, पर चार्जिंग स्टेशन, इंसेंटिव की चुनौतियां बरकरार

प्रदेश में फिलहाल करीब 2,500 इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग स्टेशन ही कार्यरत हैं, जबकि सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक प्रदेश में 10,000 चार्जिंग स्टेशन विकसित करने का है

Vivek Mishra

उत्तर प्रदेश उन शुरुआती राज्यों में रहा जिसने अगस्त 2019 में इलेक्ट्रिक वाहन विनिर्माण नीति अधिसूचित की थी। लेकिन क्षेत्र में तेजी से हो रहे बदलावों को देखते हुए राज्य सरकार ने इस नीति को बदलकर 4 अक्तूबर 2022 को नई उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रॉनिक व्हीकल मैन्युफैक्चरिंग एंड मोबिलिटी पॉलिसी (यूपी ईवीएमएमपी, 2022) अधिसूचित की। यह नई नीति अक्तूबर 2027 तक प्रभावी रहनी है।

नीति 2022 का ढांचा तीन स्तंभों पर खड़ा किया गया है।  चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण, इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की रफ्तार बढ़ाना, और राज्य में ईवी व बैटरी विनिर्माण को प्रोत्साहन देना। इसके अलावा चार्जिंग ढांचे के लिए नीति शहरों में 3 किलोमीटर गुणा 3 किलोमीटर के ग्रिड में तथा एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्गों पर हर 25 किलोमीटर पर चार्जिंग सुविधा विकसित करने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन यह सब अभी तक धरातल पर नहीं उतरा है। जबकि वर्ष 2030 तक लखनऊ में शत-प्रतिशत सार्वजनिक परिवहन प्रणाली इलेक्ट्रिक मोड में बदलने का लक्ष्य रखा गया है।

वहीं, राज्यों में ईवी प्रगति काआकलन करने वाली नीति आयोग की इंडिया इलेक्ट्रिक मोबिलिटी इंडेक्स (आईईएमआई) 2024 रिपोर्ट को देखें तो उत्तर प्रदेश को 47 अंकों के साथ देश के राज्यों में 10वां स्थान मिला है, जो राष्ट्रीय औसत स्कोर (39) से तो बेहतर है, लेकिन ट्रांसपोर्ट इलेक्ट्रिफिकेशन प्रोग्रेस और ईवी रिसर्च एंड इनोवेशन स्टेटस, दोनों में राज्य को 59-59 अंक मिले, जबकि चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर रेडीनेस के मामले में राज्य सिर्फ 21 अंक ही हासिल कर सका, जो तीनों वर्गों में सबसे कमजोर प्रदर्शन है।

संकेतक-स्तर पर देखें तो कमर्शियल ईवी एडॉप्शन में राज्य ने पूरे 100 अंक हासिल किए लेकिन प्राइवेट ईवी एडॉप्शन का आंकड़ा महज 36 अंक पर सिमटा रहा । इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि गवर्नेंस इनिशिएटिव्स में राज्य को पूरे 100 अंक मिले, मगर परचेज इंसेंटिव्स में केवल 12 और ट्रांजिशन इंसेंटिव्स में शून्य अंक दर्ज हुए। इसके अलावा कैपिटल सब्सिडीज फॉर चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और पावर अवेलेबिलिटी, दोनों संकेतकों में राज्य को शून्य अंक मिले हैं, जबकि ईवी स्टार्टअप्स के मोर्चे पर राज्य ने 79 अंकों के साथ अपेक्षाकृत मजबूत प्रदर्शन किया है।

डाउन टू अर्थ को मिले  27 मई 2026 को हुई सीएम-समीक्षा बैठक के अनुपालन दस्तावेज के अनुसार, प्रदेश में फिलहाल करीब 2,500 इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग स्टेशन ही कार्यरत हैं, जबकि सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक प्रदेश में 10,000 चार्जिंग स्टेशन विकसित करने का है। यानी अभी तक एक चौथाई भी पूरा नहीं किया जा सका है।

वहीं, लखनऊ की कंप्रिहेंसिव इलेक्ट्रिक मोबिलिटी प्लान (सीईएमपी) में बताया गया था कि, लखनऊ में इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती जरूरत को पूरा करने के लिए 2030 तक करीब 7,000 सार्वजनिक ईवी चार्जिंग प्वाइंट की आवश्यकता होगी। जबकि 2025 तक 4,039 सार्वजनिक चार्जर की जरूरत का अनुमान था, लेकिन राज्य में इसके आधे केवल 2500 चार्जिंग स्टेशन ही बन पाए। यानी जरूरत से आधे ही बने।

डाउन टू अर्थ को राज्य के एक अधिकारी ने बताया कि केंद्र सरकार की पीएम ई-ड्राइव योजना के तहत प्रदेश में करीब 900 स्थान चयनित कर मंत्रालय को साझा किए जा चुके हैं, इनमें से पहले चरण में 10 शहरों के 20 समूहों (क्लस्टर) में 238 स्थानों पर योजना स्वीकृत हो चुकी है, जिन पर कुल 714 चार्जर और 1,800 चार्जिंग पॉइंट लगाए जाने हैं। इस मद में अब तक 61.33 करोड़ रुपये का अनुदान निर्गत किया जा चुका है। जिस पर काम चल रहा है।

27 मई 2026 की सीएम-समीक्षा बैठक के अनुपालन दस्तावेज के अनुसार, केंद्र सरकार की पीएम ई-ड्राइव योजना के पहले चरण में जिन 10 शहरों को शामिल किया गया है उनमें लखनऊ भी है। यहां 3 क्लस्टरों में कुल 36 चार्जिंग स्थल स्वीकृत हुए हैं, जिनमें से 11 "कैटेगरी-ए" (सरकारी/केंद्रीय परिसर, जैसे दफ्तर, अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, जहां आम जनता की मुफ़्त पहुंच अनिवार्य है) और 25 "कैटेगरी-बी" (सरकार-नियंत्रित उच्च-यातायात स्थल, जैसे रेलवे स्टेशन, बस टर्मिनल, स्टेशन) श्रेणी में आते हैं। भारी उद्योग मंत्रालय के पीएम ई-ड्राइव परिचालन दिशानिर्देशों के अनुसार कैटेगरी-ए स्थलों को केंद्र से शत-प्रतिशत सब्सिडी मिलती है, जबकि कैटेगरी-बी को अपेक्षाकृत कम (80/70 प्रतिशत) सब्सिडी मिलती है।

वहीं, शहरों में दौड़ रही ई-बसों की चार्जिंग के लिए चार्जिंग डिपो बनाए गए हैं। मसलन लखनऊ में दुबग्गा स्थित ओवरनाइट चार्जिंग का मुख्य डिपो है जबकि शहर में अन्य चार अपारच्युनिटी चार्जिंग स्टेशन हैं।

गोमती नगर स्थित विराज खंड में स्थित ऐसे ही अपारच्युनिटी चार्जिंग डिपो पर ई-बस की चार्जिंग कराने आए कंडक्टर राजकुमार शुक्ला डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि प्रत्येक बस रोजाना करीब 200 से 220 किलोमीटर तक दौड़ती है जबकि 180 केवी की फास्ट चार्जिंग 45 से 50 मिनट में बस को फुल चार्ज कर देती है।

वह बताते हैं कि सवारियों को यह ई-बस पसंद आ रही है और लगभग फुल रहती है। लेकिन इसके पीछे वह मानव संसाधन और प्रबंधन की दुर्दशा का एक भी बताते हैं। वह कहते हैं कि उनकी ज्वाइनिंग में लिखा गया था कि प्रत्येक किलोमीटर में उन्हें 4 रुपए 70 पैसे मिलेंगे लेकिन उन्हें वेतन में प्रति किलोमीटर 3. 75 पैसे ही दिए जा रहे हैं। इसके अलावा वेतन भी समय से नही दिया जा रहा।

कंडेक्टर इसके लिए हड़ताल भी कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि एसएस इंटरप्राइजेज के तहत यह ई-बसों को चलाने का ठेका मिला है और 7 मिनट के भीतर पूरी बस भरने का टार्गेट दिया जाता है। यदि ऐसा नहीं किया जाए और आगे बढ़ा दिया जाए तो उनकी सैलरी से पैसे काट लिए जाते हैं।

वहीं, ई-बसों की चार्जिंग के लिए बनाए गए इन स्टेशनों पर एक और समस्या यह है कि यदि बिजली आपूर्ति ठप हो जाए तो यह चार्जिंग स्टेशन काम नहीं कर पाएंगे। डिपो पर मौजूद संचालक ने बताया कि बरसात या कभी आकस्मिक स्थिति में बिजली कटौती होती है तब यह समस्या आती है हालांकि, बसों को दूसरे डिपो पर भेज दिया जाता है। इसके लिए निरंतर बिजली आपूर्ति अनिवार्य है।

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