अहमदाबाद में लगभग 4000 बसें होनी चाहिए, लेकिन अभी लगभग 1100 बसें चल रही हैं। फोटो: राजू सजवान 
वायु

भारत का ई-सफर: गुजरात में सार्वजनिक परिवहन से निकलेगा समाधान, निजी गाड़ियों पर अंकुश लगाना होगा

गुजरात में बढ़ते निजी वाहनों और प्रदूषण पर लगाम के लिए विशेषज्ञ सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करने, बसों व मेट्रो नेटवर्क के विस्तार और ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट जैसी नीतियों को तेज करने की जरूरत पर जोर दे रहे हैं

Raju Sajwan

गुजरात में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को लेकर अभी फिलहाल कोई बड़ा रूझान नहीं दिख रहा है, जबकि सड़कों पर वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर अंकुश पाना संभव नहीं दिखता। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए सड़कों पर वाहनों की संख्या में कमी लानी होगी। खासकर निजी वाहनों के प्रति लोगों का मोह कम करना होगा। 

सेंटर फॉर एनवायरमेंटल प्लानिंग एंड टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी (सीईपीटी) अहमदाबाद के एसोसिएट प्रोफेसर रुतुल जोशी ने डाउन  टू अर्थ से कहा, “वाहनों से होने वाले प्रदूषण को रोकने और सड़कों पर यातायात जाम को काबू करने के लिए दीर्घकालिक उपाय के तौर पर सार्वजनिक परिवहन को अपनाना होगा, जिस और अभी भी कम ध्यान दिया जा रहा है।”

अहमदाबाद की 80 लाख आबादी के लिए केंद्र सरकार के सेवा-स्तर मानक के अनुसार कम से कम 4,000 बसों की जरूरत है, लेकिन अभी 1,117 बसें ही अहमदाबाद में हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार सूचना का अधिकार कानून के तहत मिली जानकारी के मुताबिक अहमदाबाद म्युनिस्पिल ट्रांसपोर्ट सर्विस और अहमदाबाद जनमार्ग लिमिटेड के अधीन अभी 1,117 बसें चल रही हैं।

एएमटीएस की 867 बसों में से 125 बसें अहमदाबाद नगर निगम की है, जबकि 742 बसें प्राइवेट हैं। जबकि अहमदाबाद जनमार्ग लिमिटेड की 250 बसें बीआरटीएस यानी बस रैपिड ट्रांजिट सिसस्टम के तहत चलती हैं, जो अहमदाबाद नगर निगम की हैं, लेकिन बसों का संचालन चार प्राइवेट ऑपरेटरों के पास है। इसके अलावा अमदाबाद में अभी 40 किलीमीटर का सफर मेट्रो से किया जाता है। इसमें लगभग रोजाना 35 हजार लोग यात्रा करते हैं।  

जोशी ने कहा कि यदि हम सारा ध्यान इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या बढ़ाने में लगा देते हैं, जबकि अभी भी देश में बिजली उत्पादन का बड़ा जरिया जीवाश्म ईंधन ही है तो इलेक्ट्रिक व्हीकल से समस्या का समाधान कैसे होगा।

उन्होंने चिंता जताई कि देश में पिछले कुछ सालों से यातायात में सुधार के लिए चलाए जा रहे कई प्रयासों से ध्यान भटक रहा है। ट्रांजिट ओरियेंटेड डवलपमेंट (टीओडी) पॉलिसी जैसे महत्वपूर्ण प्रयास तेजी से नहीं किए जा रहे हैं। टीओडी यानी सार्वजनिक परिवहन केंद्रित विकास, जिसमें बस, मेट्रो या रेल के आसपास घनी और मिश्रित उपयोग वाली बस्तियां विकसित की जाती हैं।

वह कहते हैं कि शहरी परिवहन की और भी दिक्कतें हैं, उनका समाधान किए बिना केवल इलेक्ट्रिक वाहनों को सपाेर्ट करने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता। जैसे कि अहमदाबाद में सावर्जनिक परिवहन का एक और महत्वपूर्ण विकल्प ऑटो रिक्शा है, लेकिन अभी तक यह सही आंकड़ा ही उपलब्ध नहीं है कि आखिर शहर में कितने ऑटो चल रहे हैं। उन्हें सुव्यवस्थित किया जाना चाहिए। ऑटो रिक्शा को ईवी में परिवर्तित किया जाना चाहिए।

सीईपीटी विश्वविद्यालय, अहमदाबाद में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन अर्बन ट्रांसपोर्ट के सेवानिवृत्त प्रोफेसर और निदेशक एच एम शिवानंद स्वामी भी कहते हैं कि सड़कों से निजी वाहनों की संख्या कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन ही एकमात्र विकल्प है। यही वजह है कि राज्य सरकार अहमदाबाद जैसे बड़े शहरों में बसों की संख्या बढ़ा रही है, बल्कि इलेक्ट्रिक बसों की ओर खास ध्यान दिया जा रहा है।

उनके मुताबिक सिटी बसों के बेड़ों में  ई-बसों की संख्या बढ़ाई जा रही है। राज्य के छह नगर निगमों में विशेष अभियान के तहत ई-बसें चरणबद्ध तरीके से सड़कों पर उतारी जा रही हैं। पीएम-ई बस, पीएम-ई ड्राइव व सीएम बस स्कीम के तहत यह अभियान चल रहा है। इतना ही नहीं, बसों के संचालन में आ रहे खर्च और यात्रियों से वसूले जा रहे किराये के बीच के अंतर की भरपाई सरकार कर रही है। इसे वायबिलिटी गैप फंड कहा जाता है।

एक सरकारी विज्ञप्ति के मुताबिक फेम-दो योजना के तहत गुजरात में अहमदाबाद में 200, राजकोट में 150 और सूरत में 300 इलेक्ट्रिक बसें तैनात की जा चुकी हैं। वहीं, पीएम ई-ड्राइव योजना के तहत अहमदाबाद के लिए 1,200 और सूरत के लिए 600 नई इलेक्ट्रिक बसें आवंटित की गई हैं। इसके अलावा पीएम ई-बस सेवा योजना के तहत गुजरात के लिए 750 बसें स्वीकृत हैं और इनमें से 555 के लिए मार्च 2026 तक स्वीकृति-पत्र जारी हो चुके थे। 

इससे स्पष्ट है कि गुजरात सरकार सार्वजनिक परिवहन को इलेक्ट्रिक बनाने पर जोर दे रही है, लेकिन राज्य में बसों के मौजूदा बेड़े को देखें तो बदलाव की रफ्तार अभी धीमी है। वाहन पंजीकरण के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार गुजरात में 878 और 618 को मिलाकर कुल 1,496 इलेक्ट्रिक बसें पंजीकृत हैं, जबकि 64,784 बसें डीजल और 2,789 बसें सीएनजी से चलने वाली हैं। यानी इन तीन ईंधन श्रेणियों की कुल 69,069 बसों में इलेक्ट्रिक बसों की हिस्सेदारी महज 2.17 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि फिलहाल राज्य के कुल बस बेड़े में डीजल का दबदबा कायम है।