फोटो: विकास चौधरी 
वायु

भारत का ई-सफर: पीएम ई-ड्राइव योजना में कानपुर नगर आगे, देहात उपेक्षित; अवैध चार्जिंग और परमिट संकट से बढ़ी अव्यवस्था

कानपुर में ईवी से वायु प्रदूषण में कमी की उम्मीद जताई जा रही है पर चार्जिंग ढांचे की कमी और अवैध स्टेशनों की मनमानी से चुनौतियां बढ़ गई हैं

Vivek Mishra

कानपुर उन गिने-चुने उत्तर प्रदेश के शहरों में है जिनके लिए वाहन-उत्सर्जन का शहर-विशिष्ट वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर द्वारा उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के लिए किए गए सोर्स एपॉर्शनमेंट अध्ययन (2022) के अनुसार शहर में पीएम 2.5 उत्सर्जन में सड़क की धूल के बाद वाहनों की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत है, जबकि नाइट्रोजन ऑक्साइड (एनओएक्स) उत्सर्जन में करीब 85 प्रतिशत हिस्सा अकेले वाहनों से आता है। अच्छी बात यह है कि सीपीसीबी का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक विश्लेषण (2021 से 2023) शहर में वायु प्रदूषण में 19 फीसदी की कमी बताता है।

स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत कानपुर भी स्मार्ट सिटी की सूची में दर्ज है लेकिन  सड़कों पर बेलगाम ट्रैफिक और ई-रिक्शा और ईवी तिपहिया वाहनों ने अपना डेरा जमा रखा है और ईवी में दोपहिया वाहन भी धीरे-धीरे यहां लोकप्रिय हो रहा है।

कानपुर के सनिगवां के रहने वाले मोहित सविता डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि जबसे उन्होंने ईवी स्कूटर खरीदा है तबसे उनका ग्रॉसरी डिलवरी का काम बढ़िया चलने लगा है।  वह बताते हैं कि 200 रुपए रोजाना करीब वह ईंधन का बचा लेते हैं। 4 घंटे की चार्जिंग में 70 से 80 किलोमीटर चल जाती है। वह चार्जिंग घर पर ही करते हैं। उन्होंने बताया कि चार्जिंग के लिए अभी बाहर कोई खास व्यवस्था नहीं हो पाई है, जिसकी सख्त जरूरत है।

कानपुर में ईवी स्कूटर या दोपहिया वाहन बेचने वाले निजी संचालकों के पास उनकी खुद की गाड़ी के लिए ईवी चार्जिंग स्टेशन है लेकिन पब्लिक एक्सेस चार्जिंग स्टेशन की कमी है। अभी हाल ही में सिटी क्लब के पास शुरू हुए एक निजी चार्जिंग स्टेशन खोला गया है कि जिसमें पब्लिक एक्सेस है।

वहां माल ढुलाई रिक्शे को चार्ज करते हुए सुनील मौर्या ने कहा कि इस सुविधा की शहर को बहुत जरूरत है क्योंकि अवैध चार्जिंग स्टेशन बहुत ज्यादा पैसा वसूलते हैं। प्रति घंटे 70 से 80 रुपए ई-रिक्शा चार्जिंग का ले लेते हैं।

राजधानी लखनऊ में 27 मई 2026 की सीएम-समीक्षा बैठक के अनुपालन दस्तावेज के अनुसार, पीएम ई-ड्राइव योजना के पहले चरण में कानपुर नगर और कानपुर देहात, दोनों जनपद शामिल हैं, लेकिन दोनों के बीच आवंटन में बड़ा अंतर है। कानपुर नगर में 12 चार्जिंग स्थल स्वीकृत हुए हैं, जिनमें 4 "कैटेगरी-ए" (सरकारी/केंद्रीय परिसर) और 8 "कैटेगरी-बी" (सरकार-नियंत्रित उच्च-यातायात स्थल, जैसे रेलवे स्टेशन, बस टर्मिनल) श्रेणी में हैं।

इसके उलट कानपुर देहात में केवल 2 स्थल स्वीकृत हुए हैं, दोनों ही कैटेगरी-ए श्रेणी में, यानी 238 प्रदेशव्यापी स्वीकृत स्थलों में सबसे कम हिस्सा पाने वाले जनपदों में कानपुर देहात शामिल है। हालांकि, अभी धरातल पर काम होना बाकी है।

वहीं, कानपुर ई-बसों के डिपो मे भी अभी 100 बसें हैं। जिसमें 3 किलोमीटर का 10 रुपए और अधिकतम 28 किलोमीटर का 45 रुपए तक किराया वसूला जाता है। डिपो पर मौजूद एक व्यक्ति ने बताया कि यहां दो साल पहले 3 बसे चार्जिंग के दौरान ही जल गई थीं। इनमें से अभी तक दो ही बसें रिप्लेस हुई हैं।

ईवी को बढावा देने के बाद कानपुर में सबसे बड़ी चुनौती सीएनजी चालकों के सामने उभर कर आई है। सीएनजी के ड्राइवर से जुड़ी एसोसिएशन के अध्यक्ष संतोष दुबे ने डाउन टू अर्थ को बताया कि ईवी में रिक्शा और तिपहिया को इतनी छूट दी जा रही है कि सीएनजी के पुराने विक्रम शेयरिंग ऑटो चालकों पर आजीविका  का संकट आकर खड़ा हो गया है।

वह समझाते हैं कि 3,300 सीएनजी तिपहिया विक्रम वाहनों की संख्या घटकर अब 1,500 से भी नीचे आ गई है। यह 50 फीसदी की कमी इसलिए आई क्योंकि इन वाहनों पर जो 4 लाख रुपए की परमिट बनती थी उसे खत्म कर दिया गया है। अब सात लाख रुपए की इस वाहन की कीमत घटकर एक लाख भी नहीं मिल रही है। स्क्रैप में भी इतने पैसे नहीं मिल रहे हैं कि इससे ई-वाहनों पर शिफ्ट किया जा सके। वहीं संजीवनगर ई-बस डिपो के पास कई ई वाहन रिक्शा चालक या तो घर पर खुद से रिचार्ज करते हैं या फिर अवैध चार्जिंग स्टेशन पर बैटरी चार्ज करवाते हैं।

आरटीओ पांडेय कहते हैं कि ईंधन के लिए सीएनजी बेहतर है लेकिन उसकी आपूर्ति के लिए हमें आयात निर्भर रहना पड़ता है, जबकि हम ऊर्जा नवीकरणीय माध्यमों से धीरे-धीरे बढ़ाते जा रहे हैं। ईवी को उसके साथ जोड़ना अग्रिम नीति होगी इसलिए सीएनजी के बजाए ईवी को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

हालांकि, ई-रिक्शा और तिपहिया वाहनों के लिए हर शहर में एक सर्वे की जरूरत है कि किसी शहर में असल में कितने रिक्शों को सड़क पर अनुमति दी जा सकती है। इसमें भी परमिट व्यवस्था होनी चाहिए या फिर मोटर अधिनियमों में इसको रेग्युलेट करने के लिए प्रावधान होने चाहिए।