रामराम मिश्रा ने लगभग 30 साल तक डीजल बसें चलाने के बाद ई-बसें चलानी शुरू कीं; डीजल बसें चलाने की वजह से उनका बायां पैर खराब हो गया था। पूजा दास / सीएसई 
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भारत का ई-सफर : ओडिशा में ई-बसें बदल रही हैं शहरी ड्राइवरों की जिंदगी

डीजल बस और ट्रक चलाने वाले ड्राइवर कहते हैं कि तय आठ घंटे की शिफ्ट, वातानुकूलित केबिन और गियरलेस वाहन से उनके स्वास्थ्य और काम-काज के संतुलन में सुधार हुआ है

Puja Das

जब रामराम मिश्रा ने करीब तीन दशक पहले पहली बार डीजल बस की स्टेयरिंग संभाली थी, तब इंजन की गर्मी और शारीरिक रूप से थका देने वाली लंबी ड्राइविंग उनकी नौकरी का हिस्सा बन गई थी। अब वह कॉम्प्रिहेंसिव रीजन अर्बन ट्रांसपोर्ट (सीआरयूटी) के ड्राइवर हैं और इलेक्ट्रिक बस (ई-बस) चलाते हैं। ई-बस ने आज उनकी कामकाजी जिंदगी पूरी तरह बदल दी है। 

ओडिशा सरकार ने जुलाई 2022 में सीआरयूटी द्वारा संचालित अपनी प्रमुख सार्वजनिक परिवहन सेवा "मो बस" के तहत पहली बार ई-बसों का बेड़ा शुरू किया था। बाद में मो बस सेवा का नाम बदलकर अमा (एएमए) बस सेवा कर दिया गया।   

यह शुरुआत ओडिशा इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) नीति, 2021 का हिस्सा थी, जिसका लक्ष्य पांच वर्षों के भीतर शहरों की बस सेवाओं के लिए खरीदी जाने वाली नई सार्वजनिक परिवहन वाली बसों से कम से कम 50 प्रतिशत को इलेक्ट्रिक करना था। राज्य परिवहन विभाग के एक अधिकारी ने डाउन टू अर्थ  को बताया कि अब तक बसों का 20 प्रतिशत विद्युतीकरण हो चुका है। उन्होंने कहा कि जल्द जारी होने वाली संशोधित राज्य ईवी नीति में 2029 तक 50 प्रतिशत, 2036 तक 70 प्रतिशत और 2047 तक 80 प्रतिशत बसों को इलेक्ट्रिक करने का लक्ष्य रखा जाएगा।

वर्तमान ईवी नीति, जिसकी अवधि दिसंबर 2025 में समाप्त हो गई है वह ई-बसों की खरीद पर प्रोत्साहन देती है। इसके तहत गैर-वातानुकूलित बसों के लिए एक्स-शोरूम कीमत का 10 प्रतिशत या 2 लाख रुपये, जो भी कम हो, और प्रीमियम वातानुकूलित बसों के लिए अधिकतम 4 लाख रुपये की सहायता दी जाती है। 31 दिसंबर, 2025 की सरकारी अधिसूचना में दिए गए चार साल के आंकड़ों के आधार पर, कुल 26,22,089 वाहनों में बसों की हिस्सेदारी केवल 0.19 प्रतिशत है।

हालांकि, ऊपर उद्धृत राज्य के वाणिज्य एवं परिवहन विभाग के सरकारी अधिकारी ने DTE को बताया कि ई-बस की करीब 1.5 करोड़ से 1.8 करोड़ रुपये की लागत को देखते हुए यह प्रोत्साहन मामूली है। अधिकारी ने ओडिशा की प्रगति का श्रेय मुख्य रूप से सरकारी खरीद को दिया और कहा कि सभी एमए यानी अमा ई-बसें राज्य द्वारा संचालित हैं और राज्य में अब तक किसी निजी बस ऑपरेटर ने अपने बेड़े का विद्युतीकरण नहीं किया है।

ओडिशा में इलेक्ट्रिक सार्वजनिक परिवहन बेड़े का विस्तार शुरू होने से कुछ साल पहले तक मिश्रा करीब 18 वर्षों तक सीआरयूटी की डीजल बसें चलाते रहे थे। उनके लिए यह बदलाव एक जरूरत भी था। करीब तीन दशक तक स्टेयरिंग के पीछे रहने के बाद उनके बाएं पैर में समस्या पैदा हो गई थी, जिसके चलते उन पारंपरिक बसों को चलाना लगातार मुश्किल होता जा रहा था जिनमें क्लच और पैडल का लगातार इस्तेमाल करना पड़ता है।

मिश्रा ने डाउन टू अर्थ को बताया, “ई-बसें गियरलेस होती हैं। इसलिए मेरा बायां पैर आराम कर सकता है।” उन्होंने आगे कहा, “पारंपरिक बसों के विपरीत, ई-बसें वातानुकूलित होती हैं; वाहन के अंदर गंदगी और धूल आने की गुंजाइश नहीं होती। इनमें धुआं नहीं होता और शोर भी नहीं होता। ई-बस पारंपरिक डीजल बस या ट्रक से कहीं बेहतर है।”

मिश्रा ने आगे कहा, “जब मैं पारंपरिक बसें चलाता था, तो अक्सर मुझे अपनी कमीज उतारनी पड़ती थी। मैं पसीने से पूरी तरह भीग जाता था, क्योंकि यह तटीय इलाका है और यहां बहुत उमस होती है। इंजन भी इतना गर्म हो जाता था कि लंबे समय तक गाड़ी चलाना मुश्किल हो जाता था और उन लंबी यात्राओं (400-500 किलोमीटर) को सहना असहनीय हो गया था।” अब वह रूट 37 पर अमा ई-बस चलाते हैं, जो भुवनेश्वर के बारामुंडा इंटर स्टेट बस टर्मिनल (आईएसबीटी) को त्रिशूलिया स्क्वायर और ओएमएफईडी होते हुए कटक के नाराज मर्थापूर रेलवे स्टेशन से जोड़ता है।

2018 में मो बस के रूप में शुरू हुई यह सार्वजनिक परिवहन सेवा अपनी टिकाऊ परिवहन पहलों के लिए 2022 में संयुक्त राष्ट्र का पुरस्कार जीत चुकी है। बाद में इसने अपने बेड़े में ई-बसों को शामिल किया और फरवरी 2025 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार ने इसका नाम बदलकर अमा बस कर दिया।

ऊपर बताए गए सरकारी अधिकारी के अनुसार, ओडिशा पहले ही अमा बस के 80-90 प्रतिशत बेड़े का विद्युतीकरण कर चुका है और 450 और ई-बसों के लिए ऑर्डर दे चुका है। अधिकारी ने कहा कि इलेक्ट्रिक बसों की अधिक लागत का भार सरकार द्वारा उठाने के फैसले से इस कार्यक्रम में जनता का भरोसा मजबूत हुआ है।

अधिकारी ने कहा, “ये राज्य द्वारा संचालित बसें हैं और राज्य इसका बोझ उठा रहा है, जिसका बहुत अच्छा सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इसलिए लोग इस पहल की काफी सराहना कर रहे हैं।”

नवंबर 2025 में प्रकाशित राज्य सरकार की ओडिशा रिव्यू के अनुसार, अगस्त 2025 तक राज्य की सड़कों पर 450 इलेक्ट्रिक बसें थीं, जिससे ओडिशा भारत में ई-बस अपनाने वाला पांचवां सबसे बड़ा राज्य बन गया था। वर्तमान में सीआरयूटी भुवनेश्वर, कटक और पुरी में ई-बसें संचालित करता है। सेवाओं का विस्तार संबलपुर, झारसुगुड़ा, क्योंझर, बरहामपुर और अंगुल तक करने की योजना है, जिससे आने वाले वर्षों में बेड़ा 1,000 से अधिक बसों का हो जाएगा।

मिश्रा के अनुसार, इस बदलाव से काम करने की परिस्थितियों में भी सुधार हुआ है। “ड्यूटी आठ घंटे की होती है, रूट तय है, लंबी ड्राइव नहीं है, दूरी भी निश्चित है और अधिकतम 180 किलोमीटर तक की होती है। एक बार चार्ज करने पर आपकी पूरी शिफ्ट निकल जाती है।”

जब उनसे पूछा गया कि रेंज को लेकर चिंता रहती है या नहीं, चार्जिंग में लगने वाला समय ड्राइवरों के काम के घंटों में से काटा जाता है या नहीं और सेवा के दौरान वाहन को चार्ज करने की जरूरत पड़ती है या नहीं, तो मिश्रा मुस्कुराते हुए बोले, “पारंपरिक बस के मुकाबले मैं वाहन के चार्ज होने के दौरान आराम कर सकता हूं, जबकि पारंपरिक बस में मुझे ईंधन भरवाने के लिए पेट्रोल पंप जाना पड़ता था। बस डिपो से निकलते ही हमारी शिफ्ट शुरू हो जाती है। उसके बाद बस के साथ क्या होता है, उससे हमारे शिफ्ट के समय पर कोई असर नहीं पड़ता।” उन्होंने संक्षेप में कहा, “कुल मिलाकर, यह बेहतर और आरामदायक है।”

बेड़े के विस्तार के साथ चार्जिंग ढांचे का भी विस्तार हुआ है। वाणिज्य एवं परिवहन विभाग के प्रधान सचिव एनबीएस राजपूत ने डाउन टू अर्थ को बताया कि ओडिशा ने सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत नगर निकाय क्षेत्रों में 100 सार्वजनिक ईवी चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने के लिए निजी साझेदारों के साथ समझौता किया है।

राजपूत ने कहा, “अटल बस स्टैंड योजना के तहत ब्लॉक स्तर पर 18 और चार्जिंग सुविधाएं विकसित की जा रही हैं, जबकि भविष्य में सरकार द्वारा खरीदे जाने वाले वाहनों को केवल ईवी तक सीमित रखा जाएगा।”

32 वर्षीय धर्मानंद पॉली के लिए ई-बसों की ओर रुख बेहतर कामकाजी परिस्थितियों के साथ-साथ पारिवारिक परिस्थितियों से भी प्रेरित था। देशभर में मालवाहक ट्रक और रात में चलने वाले यात्री वाहन चलाने में 12 साल बिताने के बाद वह करीब एक सप्ताह पहले ही घर के करीब रहने के लिए अमा ई-बस चलाने के लिए शामिल हुए।

पॉली ने डाउन टू अर्थ को बताया, “पिछले छह महीनों में मेरी मां की तबीयत लगातार खराब होती गई, इसलिए घर से दूर रहना अब संभव नहीं था।”

मिश्रा की ही बात दोहराते हुए पॉली ने भी कहा, “ई-बस चलाना आरामदायक है। इससे गर्मी से राहत मिलती है और न धुआं है, न शोर। इसके अलावा, अब मुझे पूरे भारत में लगातार यात्रा नहीं करनी पड़ती और समय तथा घंटों की चिंता नहीं रहती। पहले बाहर की 24 घंटे की शिफ्ट में मैं 300-400 किलोमीटर चलाने के बाद कुछ देर आराम कर सकता था। अब आठ घंटे की शिफ्ट में मुझे 200 किलोमीटर भी नहीं चलाना पड़ता।”

28 वर्षीय त्रिलोचन गुरु भी दो साल पहले ट्रकों से एएमए की ई-बस पर आने के बाद राहत महसूस कर रहे हैं। उन्होंने डाउन टू अर्थ को बताया कि पांच-छह साल तक आयरन ओर, कोयला और कृषि उत्पाद जैसी वस्तुओं की ढुलाई के दौरान धुएं, धूल और गर्मी के कारण उन्हें नियमित रूप से आंखों में जलन और सिरदर्द होता था। सामान लोड होने के दौरान लंबे समय तक इंतजार करना और खाने की सीमित उपलब्धता उनकी मुश्किलें और बढ़ा देती थी।

वह अब सुबह या दोपहर की शिफ्ट को प्राथमिकता देते हैं, जिससे वह शाम तक घर लौट सकते हैं।

गुरु कहते हैं, “मुझे हर शिफ्ट में करीब 90-100 किलोमीटर चलाना होता है और एक बार चार्ज करने पर करीब 100-120 किलोमीटर चल जाता है। पहले जब पारंपरिक ट्रकों में सामान लादा जाता था, तब मुझे आराम करने की अनुमति नहीं थी।”

36 वर्षीय पूर्व ट्रक चालक दिबाकर बेहरा ड्राइविंग लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए परिवहन कार्यालय जाने के बाद ओडिशा की अमा ई-बसों में आ गए।

उन्होंने कहा, “मैंने दो महीने पहले अपने ट्रक ड्राइविंग लाइसेंस को रीन्यू कराने के बजाय कुछ जटिलताओं के कारण उसे छोड़ दिया। फिर एक दोस्त ने मुझे ई-बसों के बारे में बताया और यह मुझे फायदेमंद लगा। इसमें एसी है और मुझे शहर से बाहर नहीं जाना पड़ता।”

हालांकि, ड्राइवर इस बदलाव की काफी सराहना करते हैं, लेकिन चार्जिंग की विश्वसनीयता अब भी चिंता का विषय है। बेहरा की बस की कंडक्टर आंचल पांडे ने कहा कि चक्रवात की आशंका वाले ओडिशा के मौसम के कारण भुवनेश्वर समेत कई जगहों पर बिजली कटौती अक्सर होती है।

उनका अनुमान है कि महीने में तीन-चार बार बिजली जाती है, लेकिन उन्होंने कहा कि कम से कम तीन-चार चार्जिंग डिपो मौजूद होने से अधिकारियों के लिए किसी एक केंद्र पर बिजली आपूर्ति बनाए रखना संभव हो जाता है, ताकि बसों का संचालन जारी रहे।

सीआरयूटी के एक अधिकारी ने डाउन टू अर्थ को बताया कि एजेंसी ने निर्बाध संचालन के लिए कई डिपो में चार्जिंग ढांचा विकसित किया है। नाराज डिपो में 200 बसों, पतरापड़ा में 125, गड़ाकाना में 100, पोखरीपुट में 150 और चंद्रशेखरपुर में करीब 30 बसों को रखने की क्षमता है। इनमें से अधिकांश सुविधाएं ई-बसों के लिए समर्पित हैं। डिपो में ई-रिक्शा के लिए अलग चार्जिंग स्टेशन भी स्थापित किए गए हैं।

राज्य परिवहन विभाग के अधिकारी के अनुसार, राज्य की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने की कोशिश अब सहायक ढांचे तक भी पहुंच रही है। ओडिशा ब्लॉक स्तर पर 318 अटल बस स्टैंड  विकसित कर रहा है, जो मुख्यमंत्री बस सेवा के पूरक होंगे। इनमें से करीब 96 शुरू किए जा चुके हैं, लगभग 100 निर्माणाधीन हैं और करीब 80 टेंडर प्रक्रिया में हैं। हाल में कैबिनेट द्वारा नौ शहरी बस स्टैंडों को भी इस कार्यक्रम में शामिल करने के फैसले के बाद एबीएस की कुल संख्या बढ़कर 327 हो गई है।

जहां शहरी इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का तेजी से विस्तार हुआ है, वहीं ग्रामीण सार्वजनिक परिवहन अभी इस बदलाव से दूर है। राजपूत ने बताया कि राज्य के स्वामित्व वाला उपक्रम और अंतर-शहरी तथा ग्रामीण बस सेवाओं के लिए जिम्मेदार ओडिशा स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन ने अपने बेड़े में 100 ई-बसें शामिल करने के लिए टेंडर जारी किए हैं।

हालांकि, उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री बस सेवा के तहत चलने वाली बसें 12 साल की ग्रॉस कॉस्ट कॉन्ट्रैक्ट व्यवस्था के तहत चल रही हैं, जो 2024 में शुरू हुई थी। इसलिए तत्काल विद्युतीकरण मुश्किल है।