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भारत का ई-सफर: क्या हाउसिंग सोसाइटी आपके ईवी चार्जर पर रोक लगा सकती है? फैसला अब सुप्रीम कोर्ट करेगा

ग्रेटर नोएडा के एक निवासी द्वारा अपनी हाउसिंग सोसाइटी पर निजी ईवी चार्जर लगाने के अनुरोध पर कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाने के बाद दायर याचिका में केंद्रीय विद्युत मंत्रालय के 2024 के ईवी चार्जिंग अवसंरचना संबंधी दिशा-निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू कराने की मांग की गई है

Pulaha Roy

  • ग्रेटर नोएडा के निवासी रचित कट्याल ने अपनी हाउसिंग सोसाइटी द्वारा निजी ईवी चार्जर लगाने के अनुरोध पर कार्रवाई नहीं किए जाने के आरोप के बाद सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है।

  • उनकी याचिका में हाउसिंग सोसाइटियों में ईवी चार्जिंग अवसंरचना के लिए केंद्रीय विद्युत मंत्रालय के 2024 के दिशा-निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू कराने की मांग की गई है।

  • कट्याल का दावा है कि लगभग 4,000 फ्लैटों वाली निराला एस्टेट सोसाइटी में अनुमानित 56 इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए केवल दो चार्जिंग प्वाइंट उपलब्ध हैं।

  • यह मामला एक बड़े कानूनी सवाल को सामने लाता है—क्या भारत में इलेक्ट्रिक वाहन मालिकों को अपने घर या आवंटित पार्किंग में वाहन चार्ज करने का ऐसा अधिकार प्राप्त है, जिसे कानून के जरिए लागू कराया जा सके?

रचित कट्याल सिर्फ अपने इलेक्ट्रिक वाहन को घर पर चार्ज करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने अपनी आवंटित पार्किंग में, अपने खर्च पर, एक निजी ईवी चार्जर लगाने की अनुमति मांगी। केंद्रीय विद्युत मंत्रालय के दिशा-निर्देश इसकी इजाजत देते हैं।

उन्होंने मई 2025 में सबसे पहले यह अनुमति मांगी थी। लेकिन सात महीने, छह ईमेल और एक फाइनल रिमाइंडर)भेजने के बाद भी उन्हें अनुमति नहीं मिली। आखिरकार, जनवरी 2026 में उन्होंने इस मामले को लेकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

ग्रेटर नोएडा स्थित निराला एस्टेट के निवासी कट्याल ने 26 मई 2025 को अपनी हाउसिंग सोसाइटी के प्रबंधन को पत्र लिखकर अपने खर्च पर प्रमाणित (सर्टिफाइड) ईवी चार्जर लगाने के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) मांगा।

याचिका के अनुसार, उसी दिन उनका आवेदन “उच्च प्रबंधन” को भेज दिया गया, लेकिन इसके बाद कई बार ईमेल के माध्यम से याद दिलाने के बावजूद उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।

जुलाई 2025 में सोसाइटी प्रबंधन ने जवाब दिया कि टॉवर 31 के पास पहले से ही एक ईवी चार्जिंग स्टेशन उपलब्ध है। हालांकि, उसने कट्याल की उस मूल मांग पर कोई जवाब नहीं दिया, जिसमें उन्होंने अपनी आवंटित पार्किंग में निजी चार्जर लगाने की अनुमति मांगी थी।

दिसंबर 2025 में कट्याल ने एक फाइनल रिमाइंडर भेजा। इसमें उन्होंने लिखा कि करीब 4,000 फ्लैटों वाली इस सोसाइटी में उनके अनुमान के अनुसार लगभग 56 इलेक्ट्रिक वाहन हैं, लेकिन उनके लिए केवल दो चार्जिंग प्वाइंट उपलब्ध कराए गए हैं।

जब कोई समाधान नहीं निकला, तो कट्याल ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय जाने के बजाय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका (पीआईएल) दायर कर दी। याचिका में केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार, निराला एस्टेट के सचिव और सोसायटी में सुविधाओं का प्रबंधन कर रही कंपनी कुशमैन एंड वेकफील्ड प्रॉपर्टी मैनेजमेंट सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को प्रतिवादी बनाया गया है।

मामला अभी सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। इस पर अभी सुनवाई शुरू नहीं हुई है और फिलहाल इसकी अगली सुनवाई की संभावित तिथि 18 अगस्त 2026 निर्धारित है।

इस मामले और इससे जुड़े व्यापक सवाल क्या भारत में "रिचार्ज का अधिकार" (राइट टू रिचार्ज) जैसा कोई अधिकार है को समझने के लिए डाउन टू अर्थ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता श्रीराम पी. से बातचीत की।

कानून क्या कहता है

संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को उन याचिकाओं की सुनवाई का अधिकार है, जिनमें मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया जाता है। याचिकाकर्ता के वकील श्रीराम पी. के अनुसार, इस मामले का मूल मुद्दा यह है कि केंद्रीय विद्युत मंत्रालय ने 2024 में ईवी चार्जिंग अवसंरचना संबंधी दिशा-निर्देश जारी तो किए हैं, लेकिन उनका प्रभावी ढंग से पालन नहीं हो रहा है।

यही बात इस याचिका की मांगों को महत्वपूर्ण बनाती है। याचिका में सबसे पहले सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया गया है कि वह सभी राज्य सरकारों को 'इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग अवसंरचना की स्थापना और संचालन संबंधी दिशा-निर्देश, 2024' का समुचित और प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने का निर्देश दे। यदि अदालत ऐसा करने से इनकार करती है, तो वैकल्पिक रूप से उत्तर प्रदेश तक सीमित राहत देने की मांग की गई है।

यह मामला महाराष्ट्र के एक समान मामले से अलग है। वहां मुंबई निवासी अमित ढोलकिया को अपने घर की पार्किंग में ईवी चार्जर लगाने के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) नहीं मिला था, जिसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया था। कट्याल की याचिका में उस मामले का हवाला देते हुए कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय ने बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा था।

जनवरी 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र के सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार को निर्देश दिया था कि वह हाउसिंग सोसाइटियों में ईवी चार्जिंग अवसंरचना से जुड़े नियमों को अंतिम रूप दें। हालांकि, यह आदेश केवल महाराष्ट्र तक सीमित था, क्योंकि इसे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक राज्य उच्च न्यायालय ने पारित किया था।

इसके विपरीत, रचित कट्याल की याचिका सर्वोच्च न्यायालय से ऐसे निर्देश जारी करने की मांग करती है, जिनका प्रभाव पूरे देश में हो सके। हालांकि, इस मामले में अभी तक सर्वोच्च न्यायालय ने कोई फैसला नहीं दिया है।

'रिचार्ज का अधिकार' कानून बनने के लिए क्या करना होगा?

याचिकाकर्ता के वकील श्रीराम पी. के अनुसार, "रिचार्ज का अधिकार" (राइट टू रिचार्ज ) अभी केवल सरकारी दिशा-निर्देशों के स्तर पर है। इसे कानूनी रूप से बाध्यकारी अधिकार बनाने के लिए एक तय विधायी प्रक्रिया से गुजरना होगा।

उन्होंने बताया कि सबसे पहले सरकार को नीति (पॉलिसी) के आधार पर एक विधेयक (ड्राफ्ट कानून) तैयार करना होगा। इसके बाद यह संसदीय समिति के पास जाएगा, जहां इसकी समीक्षा और सुझाव लिए जाएंगे। अंत में संसद की मंजूरी मिलने के बाद यह एक अधिनियम (कानून) का रूप लेगा। श्रीराम का कहना है कि यह प्रक्रिया हमेशा लंबी नहीं होती। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भारत में सोशल मीडिया से जुड़े नियम अपेक्षाकृत कम समय में कानून और नियामकीय ढांचे का हिस्सा बन गए थे।

फिलहाल रचित कट्याल की याचिका सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई की प्रतीक्षा कर रही है। अदालत ने अभी तक इस मामले पर सुनवाई शुरू नहीं की है और यह भी स्पष्ट नहीं किया है कि वह याचिका में मांगी गई देशव्यापी राहत देगी या केवल निराला एस्टेट तक सीमित कोई आदेश जारी करेगी।

तब तक एक बड़ा सवाल अनुत्तरित बना हुआ है, क्या भारत के लाखों इलेक्ट्रिक वाहन मालिकों को अपने घर या आवंटित पार्किंग में वाहन चार्ज करने का ऐसा अधिकार प्राप्त है, जिसे कानून के जरिए लागू कराया जा सके? फिलहाल इस सवाल का जवाब भी रचित कट्याल के चार्जर की तरह अधर में लटका हुआ है।