चैन्नई में इलेक्ट्रिक बसों की संख्या बढ़ रही है। फोटो: शैलेष 
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भारत का ई-सफर: इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए नीतियों की पड़ताल जरूरी

ई-मोबिलिटी क्रांति: साफ हवा, भरोसेमंद चार्जिंग नेटवर्क और भारी वाहनों के लिए व्यावहारिक नीतियों की असली परीक्षा

S Shanmuga

भारत इलेक्ट्रिक वाहन की ओर बढ़ रहा है। लेकिन क्या हम हवा को साफ कर रहे हैं या बस प्रदूषण को कहीं और भेज रहे हैं? भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी क्रांति को शेयर बाजार की तेजी की तरह मापा जाता है, गाड़ियों की बिक्री, सब्सिडी देना, फैक्टरियां शुरू करना और स्थानीय राजनीतिक लक्ष्य। लेकिन हवा में मौजूद प्रदूषक बैलेंस शीट नहीं पढ़ते जो कि फेफड़ों में जाते हैं। इसीलिए ई-मोबिलिटी पर सवाल शोरूम या न्यूजरूम के बजाय कहीं और से शुरू होना चाहिए। क्या होगा जब गाड़ियों की संख्या उस तेजी से बढ़ेगी जिस तेजी से हम उनसे होने वाले प्रदूषण को रोक नहीं पाएंगे? यह चुनौती भारत और तमिलनाडु जैसे राज्यों के सामने है जो पेट्रोल और डीजल से दूर होना चाहते हैं।

इंडो-गैंगेटिक प्लेन (गंगा-सिंधु का मैदानी इलाका) सर्दियों में तापमान के बदलाव के कारण प्रदूषक वहीं फंसे रह जाते हैं, जबकि ट्रांसपोर्ट, इंडस्ट्री और कंस्ट्रक्शन से प्रदूषण का बोझ और बढ़ जाता है और जहरीली हवा अब सिर्फ इंडो-गैंगेटिक प्लेन (दिल्ली, लखनऊ, वाराणसी) तक ही सीमित नहीं है। पिछले दशक में मुंबई जैसे तटीय शहरों और बेंगलुरु में भी स्मॉग की स्थिति बदतर हुई है। यहीं वह स्थिति है जहां पर इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की भूमिका प्रमुख हो जाती है।

भारत में ईवी की ओर बदलाव तेजी से हो रहा है, जिसकी वजह है बैटरी की गिरती कीमतें, ईंधन की ऊंची कीमतें, सरकारी फायदे और साफ हवा के लक्ष्य। हालांकि यह बदलाव हर जगह एक जैसा नहीं है। जहां दो-पहिया और तीन-पहिया गाड़ियों को इलेक्ट्रिक बनाना आसान है, वहीं भारी ट्रक इसमें पीछे हैं।

दूसरी ओर इलेक्ट्रिक बसें ट्रांसपोर्ट के लिए बहुत उम्मीद जगाती हैं लेकिन उनके लिए शुरू में बहुत अधिक फंडिंग की जरूरत होती है और प्राइवेट कार खरीदारों को अभी भी ऊंची शुरुआती कीमत और कमजोर रीसेल मार्केट का सामना करना पड़ता है। हालांकि सरकार की पीएम ई ड्राइव योजना इन चिंताओं में से कुछ को समझती है।

सितंबर 2024 में मंजूर हुई और 2028 तक चलने वाली 10,900 करोड़ रुपए की इस स्कीम में 14,028 इलेक्ट्रिक बसों के लिए 4,391 करोड़, इलेक्ट्रिक दो-पहिया और तीन-पहिया गाड़ियों, ट्रकों और एम्बुलेंस के लिए डिमांड इंसेंटिव के तौर पर 3,679 करोड़ रखे गए हैं। साथ ही 72,300 चार्जिंग पॉइंट के लिए, 2,000 करोड़, इलेक्ट्रिक ट्रक और एम्बुलेंस के लिए 500-500 करोड़ रुपए और टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 780 करोड़ रुपए रखें गए हैं। इसका ढांचा समझदारी वाला है और मकसद भी स्पष्ट है यहां सवाल तो इसके लागू होने के तरीके पर है।

जुलाई 2026 तक कुल बजट का सिर्फ 21 प्रतिशत यानी 2,322 करोड़ ही इस्तेमाल हो पाया था। इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर के मामले में तस्वीर अलग है। 24.79 लाख के लक्ष्य के मुकाबले 23.79 लाख वाहनों को मदद मिली लेकिन असल में बाजार पहले से ही इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर तेजी से बढ़ रहा था।

भारी वाहनों के सेगमेंट के आंकड़े एक कड़वी सच्चाई दिखाता है। 5,600 से अधिक इलेक्ट्रिक ट्रकों के लक्ष्य के मुकाबले सिर्फ 55 ट्रकों को फंड मिला और 3,800 इलेक्ट्रिक एम्बुलेंस के प्लान के मुकाबले एक भी एम्बुलेंस नहीं आई। इसके अलावा पिछली योजना के तहत मंज़ूर किए गए 6,500 पब्लिक चार्जर में से एक भी नहीं लगाया गया। यह इंफ्रास्ट्रक्चर की उस पुरानी कमी को दिखाता है जो नए पीएमई ड्राइव फ्रेमवर्क को विरासत में मिली है। जहां एक आम यात्री घर पर स्कूटर चार्ज कर सकता है, वहीं एक ट्रक ड्राइवर हाईवे पर हेवी-ड्यूटी चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के भरोसे नहीं रह सकता।

भारी इलेक्ट्रिक ट्रकों की कीमत डीजल वाले ट्रकों से काफी अधिक होती है। ऑपरेटरों को इलेक्ट्रिक पर जाने के लिए भरोसेमंद चार्जिंग कॉरिडोर, सस्ता फाइनेंस, अच्छी बैटरी लाइफ और रीसेल वैल्यू की साफ जानकारी चाहिए। असली पॉलिसी चुनौती यह नहीं है कि इन भारी वाहनों के लिए कितनी सब्सिडी दी जाए बल्कि यह है कि इलेक्ट्रिक माल ढुलाई को अपने दम पर कमर्शियल रूप से फायदेमंद कैसे बनाया जाए।

यही बात थ्री-व्हीलर पर भी लागू होती है। ऑटो ड्राइवर के लिए इलेक्ट्रिक पर जाना सीधे तौर पर उसकी रोजी-रोटी का सवाल है। पर्यावरण का मुद्दा तो बहुत बाद में आता है। कम ऑपरेटिंग कॉस्ट तभी मायने रखती है जब चार्जिंग सस्ती हो, तुरंत मिल जाए और उसमें घंटों तक इंतजार न करना पड़े। यहीं पर राज्य सरकारों की पॉलिसी को इस कमी को दूर करने के लिए आगे आना होगा। हालांकि केंद्र सरकार कई पहल और रणनीतिक दिशा-निर्देश देती है लेकिन जमीनी हकीकत राज्य ही तय करते हैं।

रजिस्ट्रेशन और टैक्स के नियमों से लेकर पब्लिक ट्रांसपोर्ट की खरीद, चार्जिंग की मंज़ूरी और ग्रिड कनेक्टिविटी तक स्थानीय स्तर पर लागू करने के तरीके से ही ग्राहक का असली अनुभव तय होता है। तमिलनाडु का उदाहरण लें। यह सिर्फ ईवी ट्रांजिशन का लाभ उठाने वाला राज्य नहीं है, यह इस बात का सबसे बड़ा टेस्ट केस है कि इंडस्ट्रियल पॉलिसी, शहरी ट्रांसपोर्ट और पर्यावरण से जुड़े लक्ष्य आपस में कैसे जुड़ते हैं। इसकी सफलता का असली पैमाना सिर्फ यह नहीं होगा कि यह कितनी फैक्टरियों या गाड़ियों को अपनी ओर खींचता है बल्कि यह होगा कि क्या इलेक्ट्रिक गाड़ियों के इस्तेमाल से लोगों के शहरों में आने-जाने का तरीका बदलता है।

इस प्रयोग में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को केंद्र में रखना होगा न कि उसे किनारे रखना होगा। क्योंकि एक इलेक्ट्रिक बस, जीवाश्म ईधन से चलने वाली गाड़ियों की सौ यात्राओं की जगह ले सकती है। इसलिए भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर एक और प्राइवेट कार जोड़ने के बजाय ट्रांसपोर्ट को इलेक्ट्रिक बनाने से जनता को कहीं अधिक फायदा होता है। लेकिन अगर ये बसें कुछ ही बड़े शहरों तक सीमित रह गईं तो इस बदलाव के बस एक शहरी दिखावा बनकर रह जाने का खतरा है न कि पूरे राज्य के लिए एक सही मोबिलिटी रणनीति बनने का।

नई पीएम ई-ड्राइव योजना का लक्ष्य 72,300 चार्जिंग पॉइंट बनाना है लेकिन असली काम मंज़ूरी मिले हुए चार्जर से हटकर असल में काम करने वाले चार्जर लगाने पर होना चाहिए। जिन खरीदारों के पास अपनी पार्किंग नहीं है, उनके लिए भारत में अभी भी ऐसा भरोसेमंद पब्लिक नेटवर्क नहीं है जिससे ईवी को पेट्रोल कार जितना सुविधाजनक बनाया जा सके।

यह घरेलू रुकावट कई अपार्टमेंट मालिकों को परेशान करती है जिनके पास ईवी खरीदने के लिए पैसे तो हैं लेकिन प्लग लगाने की कोशिश करते समय उन्हें रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन की मनमानी का सामना करना पड़ता है। कानूनी तौर पर "चार्ज करने का अधिकार" ( राइट टू चार्ज ) लागू करने से यह बाधा दूर हो जाएगी। आखिरकार साफ-सुथरी मोबिलिटी इस बात पर निर्भर नहीं होनी चाहिए कि कोई हाउसिंग सोसाइटी कमेटी किसी निवासी को अपनी कानूनी रूप से खरीदी गई गाड़ी को चार्ज करने की इजाजत देती है या नहीं।

प्राइवेट इलेक्ट्रिक कारों को एक और बाधा का सामना करना पड़ता है, वह है पेट्रोल मॉडल की तुलना में शुरुआती कीमत, और उसके बाद रीसेल (दोबारा बेचने) की चिंता। जहां पारंपरिक इंजन की टूट-फूट की जांच करना आसान है, वहीं ईवी का सबसे कीमती हिस्सा उसकी बैटरी के मामले में कहीं नहीं दिखता है। बैटरी की सेहत जांचने का कोई भरोसेमंद तरीका न होने पर सेकंड-हैंड मार्केट सिर्फ अंदाजे लगाने का खेल बन कर रह जाता है। रीसेल वैल्यू गिर जाती है और जोखिम बढ़ जाते हैं, जिससे नए खरीदार डर सकते हैं। बैटरी-हेल्थ सर्टिफिकेशन को अनिवार्य करने से यह समस्या हल हो सकती है।

बैटरी रीसाइक्लिंग सिर्फ पर्यावरण की देखभाल नहीं है, यह संसाधनों की सुरक्षा और आर्थिक अस्तित्व के लिए भी जरूरी है। भारत के बैटरी-वेस्ट नियम इस सेक्टर को व्यवस्थित करने के लिए एक मजबूत ढांचा देते हैं, जिससे अच्छी क्षमता वाली बैटरियों को कच्चा माल निकालने से पहले दोबारा इस्तेमाल का मौका मिल सके। यही बैटरी सर्कुलरिटी का मुख्य तर्क है। गाड़ी के रिटायर होते ही बैटरी को कबाड़ मानने के बजाय उससे दो बार फायदा उठाना। इसके अलावा, मानव संसाधन की कमी भी है।

भारत ईवी तो तेजी से बना सकता है, लेकिन बैटरी की जांच करने, इलेक्ट्रिक ड्राइवट्रेन की मरम्मत करने और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का रखरखाव करने वाले टेक्नीशियन को उतनी तेजी से तैयार नहीं कर सकता। बिना जरूरी हुनर के तकनीकी बदलाव करना वैसा ही है जैसे बिना पायलट को ट्रेनिंग दिए एयरपोर्ट बनाना है।

आखिरकार पॉलिसी बनाने वालों को एक बड़ी विरोधाभासी स्थिति का सामना करना होगा। ईवी में टेलपाइप नहीं होता, लेकिन उसे चार्ज करने वाली बिजली अधिकतर जीवाश्म ईंधन से आती है। अगर ट्रांसपोर्ट का इलेक्ट्रिफिकेशन तेजी से आगे बढ़ता है जबकि पावर ग्रिड कार्बन-इंटेंसिव (अधिक कार्बन उत्सर्जन वाला) बना रहता है तो हम प्रदूषण को खत्म करने के बजाय सिर्फ उसे एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहे होंगे।

क्या हम हवा को साफ कर रहे हैं या बस सड़क से निकलने वाले धुएं को पावर प्लांट तक पहुंचा रहे हैं? इसका जवाब ईवी को नकारना नहीं है बल्कि यह समझना है कि इलेक्ट्रिफिकेशन साफ-सुथरी मोबिलिटी का सिर्फ एक हिस्सा है। इसकी सफलता साफ ग्रिड, रिन्यूएबल एनर्जी, भरोसेमंद पब्लिक ट्रांसपोर्ट और गाड़ियों के कम अनावश्यक इस्तेमाल पर निर्भर करती है।

पीएम ई ड्राइव योजना की तुरंत तारीफ नहीं की जा सकती लेकिन इसे नजरअंदाज भी नहीं किया जाना चाहिए। इसकी दिशा मोटे तौर पर सही है। लेकिन सफलता को बजट आवंटन या गाड़ी की सब्सिडी से नहीं मापा जाना चाहिए।

इसे असल में काम कर रहे चार्जर, चल रही बसों, डीजल की जगह ले रहे ट्रकों, रिसायकल हो रही बैटरी और असल में कम हो रहे प्रदूषण से मापा जाना चाहिए। भारत ने इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का खाका तैयार कर लिया है। अब राज्यों को इसे हकीकत में बदलने के लिए एक सुव्यवस्थित तंत्र बनाने होंगे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत ऐसा इलेक्ट्रिक ट्रांजिट सिस्टम बना सकता है जो ऑपरेटर्स के लिए कमर्शियल तौर पर फायदेमंद हो और साथ ही पावर प्लांट से लेकर सड़क तक हर स्तर पर पर्यावरण के अनुकूल हो।

(प्रिंसटन विश्व विद्यालय से पास आउट एस षणमुगा चेन्नई के एक तकनीकी शिक्षाविद हैं।)