दशकों से हिमाचल प्रदेश की पहचान उसके जंगलों, पहाड़ों और स्वच्छ हवा से जुड़ी रही है लेकिन राज्य की राजधानी शिमला समेत इसके प्रमुख कस्बों से गुजरते हुए एक अलग तस्वीर दिखाई देती है। संकरी सड़कों पर वाहनों की लंबी कतारें, व्यस्त समय में डीजल कारें और बसें एक-दूसरे से सटी हुई धीरे-धीरे आगे बढ़ती हुई और और हिमालयी कस्बे की ताजी, स्वच्छ हवा की जगह अब वाहनों के धुएं की गंध महसूस होती है।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के वाहन डैशबोर्ड के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में नए वाहनों का पंजीकरण वर्ष 2000 में महज 2,075 से बढ़कर 2025 में 1,61,959 के शिखर पर पहुंच गया, ढाई दशकों में करीब 78 गुना वृद्धि हुई। शिमला में भी नए पंजीकृत वाहनों की संख्या वर्ष 2000 में महज 42 से बढ़कर हाल के वर्षों में सालाना 2,500 से अधिक हो गई है, जिससे यातायात जाम और परिवहन से होने वाले उत्सर्जन को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं।
राज्य सरकार जिन 12 कस्बों और शहरों के 25 निगरानी केंद्रों पर वायु प्रदूषण की निगरानी करती है, उनमें से कम से कम 13 में वार्षिक औसत पार्टिकुलेट मैटर (पीएम10) का स्तर निर्धारित मानक से अधिक दर्ज किया गया। यह जानकारी हिमाचल प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2022-23 की सबसे हालिया वार्षिक रिपोर्ट में दी गई है।
हिमाचल के सात कस्बों, जिनमें बद्दी, दमतल, काला अम्ब, नालागढ़, पांवटा साहिब, परवाणू और सुंदरनगर को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने “नॉन-अटेनमेंट” शहरों के रूप में वर्गीकृत किया है। इसका अर्थ है कि यहां राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों का उल्लंघन हुआ है।
इसी पृष्ठभूमि में हिमाचल प्रदेश सरकार ने अपने सार्वजनिक परिवहन तंत्र को इलेक्ट्रिक बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इसकी शुरुआत अपने इलेक्ट्रिक बस बेड़े के बड़े पैमाने पर विस्तार से हुई है।
वर्ष 2016 में हिमाचल प्रदेश ने अपनी पहली इलेक्ट्रिक बस शुरू की थी। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश के तहत यह बस रोहतांग दर्रे तक एक पर्यटक रूट पर चलती थी। एक दशक बाद यह कार्यक्रम बढ़कर 407 इलेक्ट्रिक बसों तक पहुंच गया है। अधिकारियों के अनुसार, किसी भी हिमालयी राज्य में यह अपनी तरह का सबसे बड़ा बेड़ा है।
30 जुलाई 2026 को राज्य ने एक ही चरण में हिमाचल सड़क परिवहन निगम (एचआरटीसी) के बेड़े में 297 नई बसें शामिल कीं, जिससे संचालन में मौजूद इलेक्ट्रिक बसों की कुल संख्या बढ़कर 407 हो गई। अधिकारियों के अनुसार, किसी भी हिमालयी राज्य में यह इस तरह का सबसे बड़ा बेड़ा है।
सोलन जिले के क्यारिघाट में 297 बसों को रवाना करते हुए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा, “यह हिमाचल को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक कदम है। 1,000 और ई-बसें लाने पर चर्चा चल रही है और इस साल टेंडर जारी कर दिया जाएगा। हम 100 हाइड्रोजन बसों पर भी विचार कर रहे हैं, ताकि हम हिमाचल के पर्यावरण और जलवायु को बचा सकें।”
हिमाचल प्रदेश की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी यात्रा औपचारिक रूप से 20 जनवरी 2022 को अधिसूचित उसकी इलेक्ट्रिक वाहन नीति, 2022 के साथ शुरू हुई।
इस नीति में 2025 तक सभी नए वाहन पंजीकरणों में 15 प्रतिशत इलेक्ट्रिक वाहनों का लक्ष्य रखा गया था। तीन साल बाद भी राज्य इस लक्ष्य के आसपास नहीं पहुंच पाया है। वाहन के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में नए पंजीकृत वाहनों में इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड कारों की हिस्सेदारी 1.5 प्रतिशत से भी कम थी।
भारत के अन्य हिस्सों में जहां इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने का जोर मुख्य तौर पर प्रोत्साहन, सब्सिडी और कर छूट के जरिए निजी वाहनों और व्यक्तिगत उपभोक्ताओं पर रहा है, वहीं हिमाचल प्रदेश में इलेक्ट्रिक बदलाव को सबसे अधिक गति सार्वजनिक परिवहन, खासकर राज्य के अपने बस बेड़े में मिली है।
अनुमान है कि पूरे हिमाचल प्रदेश में रोजाना पांच से छह लाख यात्री राज्य की बसों से सफर करते हैं, जिससे ये राज्य में सार्वजनिक परिवहन का सबसे बड़ा एकल माध्यम हैं।
हिमाचल सड़क परिवहन निगम के मंडलीय प्रबंधक (तकनीकी) पवन कुमार शर्मा ने डाउन टू अर्थ को बताया कि 297 नई बसें 318 रूटों पर चलेंगी और इनका कुल विस्तार हिमाचल प्रदेश के अनुमानित 75 प्रतिशत हिस्से तक होगा।
केवल शिमला के 40 किलोमीटर के दायरे में ही इनमें से 55 बसें तैनात की गई हैं। इनके अलावा राजधानी और उसके आसपास पहले से करीब 70 इलेक्ट्रिक बसें चल रही हैं। आईसीएलईआई साउथ एशिया के वरिष्ठ प्रबंधक विजय सैनी के अनुसार, निजी वाहनों के बजाय बसों से शुरुआत करना सोच-समझकर लिया गया फैसला था। आईसीएलईआई साउथ एशिया इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के क्षेत्र में राज्य के परिवहन विभाग के साथ काम करने वाला टिकाऊ विकास संगठन है। उन्होंने कहा कि लक्ष्य सड़कों पर इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या बढ़ाना भर नहीं, बल्कि इलेक्ट्रिक ऊर्जा से तय किए जाने वाले यात्री-किलोमीटर को प्राथमिकता देना था।
उन्होंने कहा, “हमने आकलन किया कि एक निजी वाहन को डीजल या पेट्रोल से इलेक्ट्रिक में बदलने से छह किलोमीटर के बराबर लाभ होगा, जबकि एक बस को इलेक्ट्रिक करने का मतलब 50 से 60 निजी वाहनों को इलेक्ट्रिक में बदलने के बराबर है।”
हिमाचल प्रदेश परिवहन विभाग के निदेशक नीरज कुमार ने कहा कि वाहनों से होने वाला प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन राज्य की वायु गुणवत्ता संबंधी चिंताओं के प्रमुख कारणों में हैं। डीजल बसों का बेड़ा ऐसा क्षेत्र है, जिस पर सरकार व्यक्तिगत खरीदारों की प्रतीक्षा किए बिना सीधे कार्रवाई कर सकती है।
हिमाचल प्रदेश में बिजली का एक बड़ा हिस्सा जलविद्युत से आता है, जिससे उन राज्यों की तुलना में चार्जिंग का कार्बन फुटप्रिंट कम होता है जो थर्मल पावर पर अधिक निर्भर हैं। नई बसें एक बार चार्ज करने पर 180 किलोमीटर चल सकती हैं। अगले चरण में 250 से 300 किलोमीटर की रेंज वाली बसें आने की उम्मीद है, जो एक बार चार्ज करने पर पूरे दिन का रूट पूरा करने के लिए पर्याप्त होगी।
कुमार ने कहा, “पर्वतीय क्षेत्रों में इतने बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक बसें चलाने वाला हम अग्रणी राज्य हैं। हमने सबसे पहले रूट की परिस्थितियों और चार्जिंग स्टेशनों की उपलब्धता के आधार पर बसों का परीक्षण किया। हमने देखा कि राज्य के भीतर चलने वाली पारंपरिक बसें औसतन 200 किलोमीटर से कम चलती हैं। इसी आधार पर हमने 180 किलोमीटर की रेंज वाली बसें शुरू कीं।”
इसके बावजूद एचआरटीसी का बेड़ा अभी भी मुख्य रूप से डीजल से चलता है। निगम पूरे राज्य में 2,806 डीजल बसें चलाता है, जिनमें से 142 को इस साल नई इलेक्ट्रिक बसों के लिए जगह बनाने के लिए सेवा से हटाया जा रहा है। शर्मा ने कहा, “हम इनकी संख्या कम करने पर काम कर रहे हैं। एक डीजल बस एक किलोमीटर में 1.3 किलोग्राम कार्बन उत्सर्जित करती है। हम एक हरित राज्य हैं, यहां इतनी वनस्पति है और हम इसे तभी बचा सकते हैं जब व्यवस्था बदलें।”
बसों के बेड़े के लिए चार्जिंग ढांचा अभी विकास की प्रक्रिया में है। एचआरटीसी ने पूरे राज्य में 80 चार्जिंग स्थानों के लिए 122 करोड़ रुपये की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की है। इनमें से 35 फिलहाल चालू हैं और 50 चार्जर लगाए जा चुके हैं। प्रत्येक चार्जर को एक बस को पूरी तरह चार्ज करने में 70 से 80 मिनट लगते हैं।
स्टेयरिंग के पीछे बैठे ड्राइवरों के लिए यह बदलाव नई तकनीक अपनाने जितना ही ड्राइविंग के नए तरीके को अपनाने से भी जुड़ा है।
शिमला में पिछले पांच-छह महीनों से इलेक्ट्रिक बस चला रहे एचआरटीसी के चालक भीम चंद ने कहा, “इसमें न क्लच है, न गियर. सिर्फ एक्सेलरेटर और ब्रेक हैं। इसे चलाना और मोड़ना काफी आसान है। पिछले साल मेरी किडनी से जुड़ी सर्जरी हुई थी और पारंपरिक बस की तुलना में मुझे यह बस चलाना ज्यादा आरामदायक लगता है।” उन्होंने बताया कि वह आम तौर पर अपनी शिफ्ट के दौरान करीब एक घंटे तक बस चार्ज करते हैं और फिर दिन के बाकी रूट पूरे करते हैं।
डाउन टू अर्थ से बात करने वाले अन्य ड्राइवरों ने बताया कि बैटरी प्रबंधन सबसे बड़े बदलावों में से एक है। बैटरी करीब 30 से 40 प्रतिशत तक गिरने के बाद बसों को दोबारा चार्ज करना पड़ता है और कुछ खड़ी चढ़ाइयों पर खासकर जब बस में यात्रियों की संख्या अधिक हो, बैटरी अनुमान से कहीं तेजी से खत्म हो सकती है।
शिमला के एसी पार्किंग स्थित एचआरटीसी के चार्जिंग स्टेशन पर करीब 70 इलेक्ट्रिक बसें चार्जिंग के लिए आती हैं। यहां चार्जिंग संचालन की निगरानी करने वाले ओम प्रकाश ने बताया कि करीब पांच साल से चल रही पुरानी बसों में अब अधिक बार खराबियां आने लगी हैं। उन्होंने कहा कि कभी-कभी चार्जिंग रुक जाने पर चार्जर को कई बार डिस्कनेक्ट करके फिर से कनेक्ट करना पड़ता है, तभी चार्जिंग दोबारा शुरू होती है।
एक चालक ने बताया कि जब कोई बस किसी बेहद खड़ी चढ़ाई पर संघर्ष करती है तो कभी-कभी यात्रियों को थोड़ी देर के लिए उतरना पड़ता है, जिसके बाद बस फिर चढ़ाई शुरू कर पाती है। अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में यह चुनौतियां और बढ़ जाती हैं। एचआरटीसी अधिकारियों ने बताया कि फिलहाल इलेक्ट्रिक बसों को कठिन भूभाग, बर्फ से ढके रूटों या विशेष रूप से फिसलन वाले हिस्सों पर नहीं चलाया जा रहा है।
वहीं, अधिकारियों ने कहा, पारंपरिक डीजल बसों के विपरीत, जिनमें चालक कभी-कभी क्लच का इस्तेमाल करके वाहन को नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ा सकते हैं, इलेक्ट्रिक बस का पहियों की पकड़ खो देना अधिक मुश्किल स्थिति पैदा करता है।
इसके अलावा ठंडे और ऊंचाई वाले इलाकों में बैटरी का प्रदर्शन तेजी से गिर सकता है। अधिकारियों ने ऐसे उदाहरण बताए, जहां शून्य से नीचे तापमान में कुछ ही मिनटों में रेंज 30 प्रतिशत से घटकर 10 प्रतिशत रह गई। रोहतांग दर्रे जैसे रूटों पर अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है और कई बार डीजल बसों को बैकअप के रूप में तैयार रखना पड़ता है।
अधिकारियों और ड्राइवरों ने बताया कि रूटों का चयन ढलान, मौसम और चार्जिंग ढांचे को ध्यान में रखकर सावधानी से किया जाता है। शिमला-सोलन रूट, जिसमें नालदेहरा जैसे अंदरूनी इलाके भी शामिल हैं वहां, बस चालक पदम सिंह ठाकुर ने बताया कि सरकार चार्जिंग पॉइंट की उपलब्धता के आधार पर रूट तय करती है। उन्होंने कहा कि उनके रूट पर उन्हें कोई बड़ी समस्या नहीं आई है।
रूटों का यह सावधानीपूर्वक चयन राज्य के इलेक्ट्रिक बदलाव की एक सीमा को भी रेखांकित करता है। अधिकारियों और विशेषज्ञों ने कहा कि हिमाचल के बाकी पहाड़ी सड़क नेटवर्क में बेड़े का विस्तार करने के लिए खास तौर पर हिमालयी परिस्थितियों के लिए डिजाइन की गई बसों की जरूरत होगी। असली अड़चन यहीं है।
शुरुआती चुनौती यह थी कि निर्माता छोटे हिमालयी बाजार के लिए अलग डिजाइन तैयार करने में निवेश करने से हिचक रहे थे। इसलिए राज्य को ऐसे रूटों की पहचान करनी पड़ी, जहां मौजूदा इलेक्ट्रिक बस मॉडल बिना बड़े संरचनात्मक बदलाव के चल सकें।
सैनी ने बताया कि निर्माता आम तौर पर दिल्ली, मुंबई या चेन्नई जैसे बड़े और समतल भूभाग वाले बाजारों के लिए बसें डिजाइन करते हैं, जहां शहरों की जरूरतें काफी हद तक समान होती हैं और अलग-अलग ऑर्डर के बीच केवल बैटरी का आकार या बस की फर्श की ऊंचाई बदलने की जरूरत पड़ सकती है।
हिमाचल की खड़ी ढलानों और तीखे मोड़ों के लिए कुछ अलग चाहिए, जिसमें बस का छोटा “ओवरहैंग” भी शामिल है। यह वाहन का वह हिस्सा है जो आगे के पहियों से आगे निकलता है और पहाड़ी मोड़ों पर चालक को बेहतर दृश्यता और वाहन को बेहतर तरीके से मोड़ने में मदद करता है। सैनी ने कहा, “यहां चुनौती यह है कि केवल हिमाचल के लिए बसों में बदलाव करने पर निर्माताओं को अतिरिक्त निवेश करना पड़ेगा और यह बहुत बड़ा बाजार नहीं है।”
इससे निपटने के लिए राज्य ने निर्माताओं के साथ काम किया और नवीनतम चरण में शामिल की गई बसों में कुछ बदलाव सुनिश्चित किए। नए बेड़े का परीक्षण किया गया और हिमाचल की परिस्थितियों के अनुसार इसमें बदलाव किए गए, जिनमें अप्रोच और डिपार्चर एंगल, ग्राउंड क्लीयरेंस और ऊंचाई में परिवर्तन शामिल हैं।
शर्मा ने बताया कि इस साल शामिल की गई बसों का अप्रोच एंगल करीब 11 से 12 डिग्री है, जबकि पहले के इलेक्ट्रिक बेड़े में यह 9 से 10 डिग्री था। इससे बसें अधिक खड़ी चढ़ाइयों पर सुरक्षित तरीके से चल सकती हैं। निगम ने इन बसों को सेवा में उतारने से पहले जनवरी से जून तक पांच महीनों के दौरान राज्य के अलग-अलग भूभागों में इनका परीक्षण किया।
हालांकि, सैनी ने कहा कि ये बदलाव अभी पूरी तरह समाधान नहीं हैं। उन्होंने कहा, “तकनीक की तैयारी अभी भी एक चुनौती है। विस्तार के अगले चरण के लिए केवल हिमाचल ही नहीं, बल्कि अन्य हिमालयी राज्यों के लिए भी डिजाइन में विशेष बदलाव जरूरी होंगे। अगर हमें आगे बढ़ना है, तो निर्माताओं को पहाड़ी परिस्थितियों के अनुरूप डिजाइन में बदलाव करने की इच्छा दिखानी होगी।”
जहां इलेक्ट्रिक बसें परिचालन खर्च कम करती हैं, वहीं शुरुआती लागत अब भी एक बड़ी बाधा है। एचआरटीसी के आंकड़ों के अनुसार, हाल में शामिल की गई प्रत्येक इलेक्ट्रिक बस की कीमत करीब 1.26 करोड़ रुपये है, जबकि एक पारंपरिक डीजल बस की कीमत करीब 35 से 36 लाख रुपये है।
परिचालन सहायता सुनिश्चित करने के लिए निगम ने खरीद मॉडल के तहत निर्माताओं के साथ 12 से 15 साल के दीर्घकालिक रखरखाव अनुबंध किए हैं। चार्जिंग स्टेशन विकसित करना भी एक बड़ा खर्च है और प्रत्येक साइट की अनुमानित लागत 70 से 80 लाख रुपये है।
बचत परिचालन के दौरान होती है। बसों की शुरुआत के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए मुख्यमंत्री सुक्खू ने अनुमान लगाया कि कर्मचारियों से जुड़े खर्चों समेत एक इलेक्ट्रिक बस को चलाने की लागत करीब 36 से 38 रुपये प्रति किलोमीटर है, जबकि डीजल बस के लिए यह 74 से 86 रुपये प्रति किलोमीटर है।
बिजली की खपत के लिहाज से एक इलेक्ट्रिक बस करीब एक यूनिट बिजली प्रति किलोमीटर खर्च करती है। हिमाचल प्रदेश में वाणिज्यिक बिजली की दर करीब सात रुपये प्रति यूनिट है, लेकिन कर और अन्य शुल्क जोड़ने के बाद एचआरटीसी की प्रभावी बिजली लागत करीब 14 रुपये प्रति किलोमीटर हो जाती है।
इसके मुकाबले, शर्मा ने बताया कि केवल ईंधन पर ही एक डीजल बस चलाने की लागत निगम को करीब 25 रुपये प्रति किलोमीटर पड़ती है। उन्होंने कहा, “पूंजीगत खर्च अधिक है और हमें इसे आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना होगा। लेकिन पर्यावरणीय फायदे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।”
यह विस्तार हिमाचल प्रदेश के स्वच्छ परिवहन अभियान में एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन राज्य की सड़कों पर अब भी हावी डीजल बसों और वाहनों को बदलना इस बात पर निर्भर करेगा कि राज्य चार्जिंग ढांचे का कितना विस्तार कर पाता है, पहाड़ी परिस्थितियों के अनुकूल तकनीक हासिल कर पाता है और इस बदलाव को आर्थिक रूप से कितना व्यावहारिक बना पाता है।