वायु प्रदूषण से देश और दुनिया हलकान है लेकिन देश की राजधानी दिल्ली के लिए मौजूद शोध आंकड़े एक भयावह तस्वीर सामने लेकर आते हैं। दिल्ली में सिर्फ सर्दियों के पांच महीने ही जिंदगी को छोटा बनाते चले जाते हैं। दिल्ली में सर्दियों के 5 महीनों वायु प्रदूषण का एक्सपोजर 9,000 सिगरेट पीने के बराबर अनुमानित है। इससे जीवनकाल में 129 दिन या लगभग 4.3 महीने की कमी आती है, यानी 30 साल दिल्ली में रहने पर कुल 11 साल का जीवन खोना पड़ सकता है।
यह बात बाल रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ संजीव बागई ने 27 फरवरी, 2026 को राजस्थान के अलवर जिले में निमली गांव स्थित अनिल अग्रवाल एनवायरमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में अनिल अग्रवाल डॉयलाग 2026 के दौरान एक सत्र में कही। उन्होंने बताया कि वायु प्रदूषण से होने वाली मौतें दुनिया भर में अब भी आधिकारिक आंकड़ों से बहुत कम दर्ज होती हैं। उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर हर वर्ष 50 लाख से 81 लाख मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी हैं। स्टेट ग्लोबल हेल्थ रिपोर्ट 2020 का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि भारत में ही वायु प्रदूषण के कारण 20 से 30 लाख मौतें प्रतिवर्ष दर्ज की गई हैं।
उन्होंने कहा कि कोविड 19 के दौरान चार वर्षों में भारत में छह लाख मौतें दर्ज की गईं थी लेकिन वायु प्रदूषण के कारण हर वर्ष मौतों का आंकड़ा कोविड 19 के दौरान प्रति वर्ष होने वाली मौतों से 16 गुना ज्यादा है। इसके बावजूद भारतीय अस्पतालों के आईपीडी या ओपीडी में वायु प्रदूषण का कोई डायग्नोसिस कोडिंग नहीं है।
डॉ बागई के मुताबिक लैंसेट 2021 और आईसीएमआर 2019 के अनुसार सभी तरह की मौतों में 18 से 25 फीसदी मौतों की हिस्सेदारी वायु प्रदूषण से जुड़ा है। डॉ बागई ने यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के हवाले से कहा कि वायु प्रदूषण के कारण प्रति व्यक्ति व्यस्क जीवन के 8 से 10 वर्ष कम हो जाते हैं। वहीं, लंग फाउंडेशन ऑफ इंडिया का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि दिल्ली में 30 फईसदी बच्चों में अपरिवर्तनीय फेफड़ों की क्षति पाई गई है।
डॉ बागई ने सत्र के दौरान कहा, "क्या किसी को पता है कि भारत का स्वास्थ्य बजट कितना है? यह थोड़ा सा एक लाख करोड़ से अधिक है। क्या आपको पता है कि वायु प्रदूषण के कारण भारत उत्पादकता में हर वर्ष कितना नुकसान उठाता है? लगभग 24 लाख करोड़ जो कि जीडीपी का आठ फीसदी है। क्या वायु प्रदूषण को नजरअंदाज करने के बजाय उससे निपटना अधिक समझदारीपूर्ण, अधिक लागत-प्रभावी और अधिक मानवीय नहीं है? यह नुकसान हर वर्ष कुल स्वास्थ्य बजट का लगभग 24 गुना है।
उन्होंने कहा, "कई क्षेत्रों में ना तो उचित अस्पताल प्रणाली है, ना आईटी प्रणाली, और ना ही सही दस्तावेजीकरण। हम डेटा कैसे एकत्र करेंगे? हम बस “ रेसपिरेटरी फेल्योर” लिख देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि भारत में 20 से 30 लाख मौतों का जो कुल आंकड़ा है, वह दोगुना और तिगुना नहीं है तो हो जाएगा। जब हम अस्थमा और कैंसर जैसे कारणों का सही दस्तावेजीकरण शुरू करेंगे, जो वास्तव में वायु प्रदूषण के कारण होते हैं।"
वहीं वायु प्रदूषण के संपर्क से पड़ने वाले प्रभावों को लेकर उन्होंने कहा, सापेक्ष आर्द्रता बढ़ने पर प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है, विशेषकर सुबह के समय जब बच्चे स्कूल जाते हैं। उन्होंने एक सर्वे का हवाला देते हुए कहा इस कारण से कई बच्चे या तो स्कूल जाने से बचते हैं या फिर दिल्ली छोड़ देना चाहते हैं।
डॉ बागई ने लैंसेट की नवंबर, 2022 रिपोर्ट के आधार पर कहा, एक्सपोजर की अवधि भी बेहद निर्णायक है। 15 मिनट से अधिक खराब हवा में संपर्क श्वसन संकट पैदा कर सकता है। 1 से 2 दिन लगातार एक्सपोजर मायोकार्डियल इनफैरक्शन (एमआई) यानी हृदयाघात और स्ट्रोक का कारण बन सकता है, जबकि 3 से 5 दिन लगातार संपर्क अचानक कार्डियक अरेस्ट तक ले जा सकता है।
डॉ बागई ने कहा, नगर निगम अब भी सड़कों की सफाई के पुराने तरीकों का पालन करते हैं। पहले धूल को बैठाया जाता है और फिर उसे झाड़कर हवा में उड़ा दिया जाता है। इसका क्या परिणाम होता है? वह घंटों तक हवा में निलंबित रहती है और सबको प्रभावित करती है।
उन्होंने बताया कि वायु प्रदूषण में अहम पार्टिकुलेट मैटर 2.5 जो कि बाल के आकार के एक-चौथाई होते हैं। यह अत्यंत छोटे और खतरनाक होते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि लगभग 20 फीसदी कम रिपोर्टिंग होती है। उन्होंने कहा, पीएम 2.5 के असर से जुड़े आंकड़े बेहद गंभीर हैं और इसका मृत्युदर से सीधा संबंध है।
डॉ बागई के मुताबिक, हवा में मौजूद पीएम 2.5 के सूक्ष्म कणों की मात्रा में हर 10 फीसदी बढ़ोतरी से मृत्यु दर 2 गुना तक बढ़ जाती है। इससे कार्डियो रेसपिरेटरी मेटाबॉलिक रिस्क बढ़ जाता है। यदि पीएम 2.5 की सांद्रता में पांच माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर (यानी एक घन मीटर हवा में 5 माइक्रोग्राम अतिरिक्त कण) की वृद्धि होती है तो मृत्यु दर 4 फीसदी बढ़ती है। 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर बढ़ने पर मृत्यु दर 8 फीसदी और 35 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर बढ़ने पर 24 फीसदी तक तक बढ़ जाती है।
डॉ बागई ने नेचर जर्नल के एक रिसर्च के हवाले से बताया कि पीएम 2.5 में हर 1 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर वृद्धि से प्रतिवर्ष 12,000 अतिरिक्त मौतें होती हैं। जबकि, कार्बन मोनोऑक्साइड (सीओ), नाइट्रोजन ऑक्साइड (एनओएक्स) और सल्फर ऑक्साइड (एसओएक्स) की मात्रा में हर 1 फीसदी वृद्धि से हार्ट अटैक (एमआई) और स्ट्रोक का खतरा 2 गुना हो जाता है
वहीं, प्रदूषण के संपर्क की अवधि मृत्यु दर में 0.003 फीसदी से 0.08 फीसदी तक वृद्धि से जुड़ी है और प्रदूषण में 1 यूनिट की वृद्धि 1200–1600 मौतों के बराबर आंकी गई है।
पीएम 2.5 में 1 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि मृत्यु दर में 0.073 फीसदी बढ़ोतरी से जुड़ी है। वहीं, पेड़ों की संख्या बढ़ने से ब्लैक कार्बन में 48 से 57 फीसदी–57 तक कमी दर्ज की गई है। प्रदूषण 10.65 गुना अधिक बीमारियों से जुड़ा पाया गया है। पीएम 2.5 में एक यूनिट वृद्धि से 8.4 फीसदी अधिक बीमारियां दर्ज होती हैं।
डॉ बागई ने कहा, "वायु प्रदूषण को केवल फेफड़ों से ना जोड़ें। यह प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित करता है, संक्रमण बढ़ाता है और लगभग हर अंग प्रणाली पर असर डालता है। यह एनीमिया, अनिद्रा और बच्चों में अधिक संवेदनशीलता का कारण बनता है। बच्चों की प्रतिरक्षा क्षमता सीमित होती है और वे अपने शरीर के वजन के अनुपात में अधिक प्रदूषक सांस के साथ अंदर लेते हैं।"
उन्होंने, आईआईटी दिल्ली के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा यह चिंताजनक स्तर दिखाते हैं। पीएम 2.5 हृदय में सूजन पैदा करता है, प्लेटलेट्स को सक्रिय करता है और थ्रॉम्बोसिस और अनियमित हृदय गति का कारण बनता है। यह फेफड़ों को प्रभावित करता है, अस्थमा पैदा करता है, बच्चों की श्वसन प्रणाली को प्रभावित करता है और अल्जाइमर, डिमेंशिया, अवसाद, मूड स्विंग, संज्ञानात्मक कमी, बच्चों में ऑटिज्म, स्ट्रोक, पार्किंसनिज्म और मस्तिष्क क्षय में योगदान देता है।
सत्र के दौरान उन्होंने दो फेफड़ों के चित्र प्रदर्शित करते हुए कहा प्रदूषित फेफड़ों में एल्वियोली क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। प्रतिक्रियाशील साइटोकाइन्स निकलते हैं, जिससे सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस होता है। फेफड़े इसकी भरपाई करने की कोशिश करते हैं, लेकिन अंततः हृदय, गुर्दे, मस्तिष्क और चयापचय प्रणाली प्रभावित हो जाते हैं।
दिल्ली के आंकड़े सबसे खराब में से हैं। जुलाई 2024 में लैंसेट रिपोर्ट के हवाले से उन्होंने कहा,"दिल्ली में कुल मौतों का 11 फीसदी पीएम 2.5 के कारण है। पीएम 2.5 में प्रति 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर वृद्धि पर मृत्यु दर लगभग 3.6 फीसदी बढ़ जाती है।
उन्होंने कहा वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों और बीमारियों का भरपूर डाटा उपलब्ध है।
दिल्ली में सर्दियों के पांच महीने मतलब 9000 सिगरेट
कुछ अध्ययनों में एक्यूआई में निश्चित वृद्धि को सिगरेट के धुएं के बराबर माना गया है। दिल्ली में सर्दियों के महीनों में संचयी संपर्क अत्यंत अधिक होता है। डॉक्टर बागई ने बर्कले अर्थ के एक शोध के आधार पर बताया कि पीएम 2.5 के हर 22 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर का पूरे दिन का एक्सपोजर एक सिगरेट पीने के बराबर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है। उदाहरण के लिए, पीएम 2.5 के आठ घंटे 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के स्तर का एक्सपोजर एक सिगरेट के बराबर बताया गया है, जबकि 511 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर स्तर पर यह 8 सिगरेट तक पहुंच जाता है। चीन के बीजिंग में औसतन 120 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर स्तर पर 8 घंटे एक्सपोजर 4-5 सिगरेट के समान होता है और उच्च स्तरों पर यह 25 से 60 सिगरेट तक जा सकता है। कनाडियन एयर क्वालिटी हेल्थ इंडेक्स (एक्यूएचआई) के अनुसार विभिन्न स्तरों पर पीएम 2.5 को सिगरेट में बदलकर देखा गया है। स्तर 1 (10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) पर 24 घंटे में 0.5 सिगरेट, स्तर 6 (60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) पर 2.7, और स्तर 10 (100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) पर 23.2 सिगरेट तक का अनुमान है।
गर्भ से ही बढ़ जाता है खतरा
डॉ बागई ने कहा वायु प्रदूषण गर्भावस्था को भी प्रभावित करता है। यह भ्रूण के अंगों को नुकसान पहुंचाता है। समयपूर्व प्रसव, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार, बांझपन, मातृ उच्च रक्तचाप, प्लेसेंटा संबंधी समस्याएं और समयपूर्व मृत्यु दर में वृद्धि का कारण बनता है। जन्म के बाद भी बच्चों के फेफड़ों का विकास वर्षों तक प्रभावित रहता है।
वायु प्रदूषण के संपर्क से जन्मजात हृदय रोग का जोखिम भी बढ़ता है। मृतजन्म लगभग 14 फीसदी बढ़ जाते हैं। संरचनात्मक असामान्यताएं जैसे कटे होंठ, कानों का न होना, सूक्ष्म सिर या बड़ा सिर, रीढ़ की विकृति, एक ही गुर्दा या मूत्राशय का अभाव देखने को मिलता है।
यदि कोई महिला गर्भधारण से 12 महीने पहले प्रदूषकों के संपर्क में रही है तो आनुवंशिक परिवर्तन पहले ही शुरू हो चुके हो सकते हैं। गर्भावस्था के दौरान स्वच्छ हवा में जाने से पूर्व संपर्क का प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के कारण वायु प्रदूषण न्यूरोटॉक्सिक है। यह मोटर न्यूरॉन रोग, डिमेंशिया और स्मृति हानि के जोखिम को बढ़ाता है। यह हृदय, रक्तचाप, टाइप 2 मधुमेह के जोखिम, गुर्दों (क्रॉनिक किडनी डिजीज और डायलिसिस के बढ़े जोखिम सहित) और अस्थि घनत्व को प्रभावित करता है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस और फ्रैक्चर होते हैं।
प्लास्टिक की दुनिया में पनपता हमारा जीवन
वायु प्रदूषण के साथ ही माइक्रो प्लास्टिक का संकट भी तेजी से उभर रहा है। हार्ट की धमनियों में इसका जमाव हो रहा है। उन्होंने, टॉक्सिकोलॉजी साइंस, 2024 के हवाले से कहा कि माइक्रो प्लास्टिक मस्तिष्क, यकृत, प्लेसेंटा, किडनी और कोरोनरी आर्टरी तक पहुंच चुके हैं। 40–60 फीसदी लोगों में माइक्रोप्लास्टिक पाया गया है। अगले तीन वर्षों में कैंसर और हार्टअटैक के मामलों में 2.1 गुना वृद्धि का संकेत है। साथ ही 2016 से 2024 के बीच शरीर में माइक्रो प्लास्टिक की मात्रा में 20 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई है।
2019 में वैश्विक स्तर पर 6 अरब टन प्रति वर्ष माइक्रो प्लास्टिक का उत्पादन हुआ। इन्हें पूरी तरह टूटने या घुलने में लगभग 500 वर्ष तक लग सकते हैं। अध्ययन के अनुसार 84 फीसदी कण कचरा डंप से आते हैं। हवा में प्रति घन मीटर (एक घन मीटर हवा) में 1–5 माइक्रोमीटर मोटाई के फिलामेंट फाइबर पाए गए हैं, जिनका आकार 25–5000 माइक्रोग्राम के दायरे में दर्ज किया गया है। एक मनुष्य प्रति वर्ष लगभग 75,000 से 1.2 लाख माइक्रो प्लास्टिक फाइबर सांस के जरिए शरीर में लेता है। ये कण निगलने, सांस लेने और त्वचा के संपर्क से शरीर में प्रवेश करते हैं और पीढ़ियों तक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं।
डॉक्टर बागई ने कहा, "जो प्लास्टिक कचरा हम हवा में छोड़ते हैं वह पहले मिट्टी में जाता है फिर अंततः पानी में और यह दुष्चक्र चलता रहता है।" उन्होंने कहा, हम एक प्लास्टिक की दुनिया में रह रहे हैं। दशकों में माइक्रो और नैनो प्लास्टिक में अत्यधिक वृद्धि हुई है। इन्हें सांस के साथ अंदर लिया जा सकता है, निगला जा सकता है या संपर्क से अवशोषित किया जा सकता है। ये जैव-अवक्रमणीय नहीं हैं और दशकों तक शरीर में रह सकते हैं।
प्लास्टिक कचरा सैकड़ों वर्षों तक पर्यावरण में बना रहता है और कई वर्षों तक धमनियों में भी रह सकता है। अध्ययनों में हृदयाघात के मरीजों में माइक्रोप्लास्टिक पाए गए हैं। ये कण उच्च रक्तचाप और अन्य हृदय संबंधी समस्याओं से जुड़े हैं। प्लास्टिक की बोतलें, विशेषकर गर्मी और धूप के संपर्क में आने पर तरल पदार्थों में माइक्रोप्लास्टिक छोड़ती हैं। घर के अंदर की हवा में भी माइक्रो और नैनो प्लास्टिक होते हैं। उन्होंने कहा कि भारी धातुएं माइक्रोप्लास्टिक से जुड़कर धनावेशित कण बनाती हैं, जो ऋणावेशित कोशिका झिल्लियों के साथ संपर्क कर शरीर में लंबे समय तक बने रहते हैं।
प्लास्टिक से जुड़े सामान्य रसायनों में बिस्फेनोल ए (बीपीए) और फ्थेलेट्स शामिल हैं। बीपीए शरीर में एस्ट्रोजन रिसेप्टर्स से जुड़कर एस्ट्रोजन की नकल करता है। यह यौगिक गर्भपात, मृतजन्म और नवजात शिशुओं में संरचनात्मक असामान्यताओं से जुड़े हैं।
उन्होंने बताया कि प्लास्टिक का संपर्क आंत की परत को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे उसकी पारगम्यता बढ़ जाती है। आंत, जिसे अक्सर “दूसरा मस्तिष्क” कहा जाता है, गंभीर रूप से प्रभावित होती है। मोटी प्लास्टिक की बोतलें और लंबे समय तक भंडारण से रसायनों का रिसाव बढ़ जाता है। बिक्री से पहले कई बोतलें गर्मी के संपर्क में रहती हैं, जिससे प्रदूषण बढ़ता है।
डॉक्टर बागई ने कहा कि बच्चे गंभीर असामान्यताओं के साथ जन्म ले रहे हैं, जिनमें हाइड्रोसेफेलस और अन्य जन्मजात विकृतियां शामिल हैं। इन स्थितियों में कई सर्जरी और आजीवन देखभाल की आवश्यकता होती है। आने वाले वर्षों के अनुमान चिंताजनक हैं। जब प्रदूषण स्तर तेज़ी से बढ़े तब नीतिगत उपाय आवश्यक हैं। मजबूत कार्रवाई, स्पष्ट सार्वजनिक एजेंडा और वित्तीय प्रतिबद्धता अनिवार्य है।