इलेस्ट्रेशन: योगेंद्र आनंद 
वायु

प्रदूषण पर लगाम लगाएं, जनजीवन पर नहीं

ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक आपातकालीन उपाय था, वायु प्रदूषण कम करने के लिए ठोस कार्रवाई का विकल्प नहीं। लेकिन आज इसका इस्तेमाल कार्रवाई न करने के बहाने के रूप में किया जा रहा है

Sunita Narain

सर्दियों की दस्तक के साथ ही दिल्ली में निराशा का मौसम शुरू हो जाता है। कुछ ही दिनों में जहरीले तत्व जमीन के करीब जमा होने लगेंगे और हमारा दम घोंटने लगेंगे। यह स्थिति उन दिनों में और भी भयावह हो जाती है जब हवा कम चलती है और पड़ोसी खेतों से पराली जलने का धुआं लाती हैं।

हर साल की तरह यह सवाल है कि इस मौसम को कम नुकसानदायक बनाने के लिए हमने क्या किया। अच्छी खबर यह है कि दिल्ली सरकार ने सर्दियों के प्रदूषण से निपटने के लिए कदम उठाने की घोषणा की है।

लेकिन बुरी खबर यह है कि ये उपाय आधे-अधूरे हैं। इससे भी बदतर बात यह है कि ये प्रदूषण को नियंत्रित करने की दिशा में पूरी तरह से हार मान लेने का संकेत देते हैं। सरकार का यह एक्शन प्लान केवल शहर को बंद कर देने तक सीमित है, जिसमें रोजमर्रा की गतिविधियों को रोकने का पूरा दारोमदार  सीधे जनता पर डाल दिया गया है।

मैं इस बात से पूरी तरह वाकिफ हूं कि काम पर जाने के लिए हमारे वाहन चलाने जैसी गतिविधियां प्रदूषण को बढ़ाती हैं, निजी कारों और दोपहिया वाहनों की भारी संख्या वायु प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है।

लेकिन कोई भी योजना तभी कारगर होती है जब आम यात्रियों के पास व्यावहारिक विकल्प मौजूद हो, जैसे पर्याप्त एवं बेहतर सार्वजनिक परिवहन और ऐसी सुरक्षित सड़कें जहां लोग साइकिल चला सकें या पैदल चल सकें।

इन विकल्पों के बिना ही, हमें आने वाले तीन महीनों (नवंबर से जनवरी तक) के लिए 50 प्रतिशत क्षमता पर काम करने का निर्देश दे देना बेमानी है।

सरकार ने “ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान” (ग्रैप) के दिशा-निर्देशों की नकल तो कर ली है लेकिन उसे इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं है कि असल में इसके मायने क्या हैं।

मुझे इसे स्पष्ट करने दें, क्योंकि मैं उन लोगों में शामिल थी जिन्होंने ग्रैप के विचार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखा था। यह 2016 की बात है जब मैं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के तत्कालीन पर्यावरण प्रदूषण रोकथाम एवं नियंत्रण प्राधिकरण (ईपीसीए ) की सदस्य थी और सीधे सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट करती थी।

हमने ग्रैप को स्मॉग (धुएं और कोहरे का मिश्रण ) से बचाव के एक आपातकालीन उपाय के रूप में प्रस्तावित किया था न कि जमीनी स्तर पर होने वाली ठोस कार्रवाई के विकल्प के तौर पर। इसे चरणबद्ध इसलिए कहा गया था क्योंकि इसके तहत वायु प्रदूषण की गंभीरता के आधार पर ही पाबंदियां लागू की जानी थीं।

ईपीसीए ने दिल्ली से होकर गुजरने वाले ट्रकों और अन्य भारी वाणिज्यिक वाहनों का मामला भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठाया था। ये वाहन प्रदूषण बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाते थे। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने इन वाहनों के प्रवेश पर प्रदूषण टैक्स लगाया था और केंद्र सरकार पर वैकल्पिक बाईपास एक्सप्रेस-वे के निर्माण कार्य में तेजी लाने का दबाव बनाया था।

इसके बाद के दो वर्षों में कई निर्णायक और सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए गए, जिनमें भारत चरण-6 (बीएस-VI) ईंधन और वाहन प्रौद्योगिकी को तेजी से अपनाना भी शामिल था

2016 में जब सुप्रीम कोर्ट ने ग्रैप को हरी झंडी दी थी तब वह इससे होने वाले व्यवधानों से भली-भांति अवगत था। उदाहरण के लिए स्कूलों को बंद करने की कीमत बच्चों की शिक्षा के नुकसान के रूप में चुकानी पड़ती।

यह कोई ऐसा कदम नहीं था जिसे हल्के में लिया जा सके। केंद्र सरकार द्वारा 2017 में अधिसूचित मूल ग्रैप में स्कूलों को केवल उन्हीं दिनों में बंद करने का प्रावधान था जब वायु गुणवत्ता का स्तर गिरकर “गंभीर” श्रेणी में पहुंच जाए।

सरकारें शहर में भारी वाहनों के प्रवेश और निजी वाहनों के संचालन पर प्रतिबंध लगा सकती थी। इसका मुख्य उद्देश्य इन पाबंदियों को केवल उन्हीं दिनों तक सीमित रखना था जब इनकी नितांत आवश्यकता हो और इस बीच ऐसे ठोस कदम उठाते रहना था ताकि भविष्य में इन आपातकालीन उपायों की नौबत ही न आए।

आम जनजीवन में होने वाली इस असुविधा का मकसद सरकारों पर साल भर सख्त कार्रवाई करने के लिए दबाव बनाना था। शहर को बंद कर देना कोई स्थायी नीति नहीं थी।

सरकार यह दलील दे सकती है कि उसकी योजना यही है। यह योजना देखने-सुनने में बहुत शानदार भी लग सकती है। लेकिन सच कहूं तो इसमें कोई दम नहीं है। प्रदूषण नियंत्रण के ये उपाय आधे-अधूरे हैं या फिर उनमें उस दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव दिखता है जो दिल्ली-एनसीआर की हवा को साफ करने के लिए नितांत जरूरी है।

मैं ऐसा क्यों कह रही हूं? मेरी दो बातों से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। पहला मुद्दा है दिल्ली की सड़कों पर दौड़ने वाले वाहनों की भारी संख्या। इससे निपटने का एकमात्र व्यावहारिक रास्ता यही है कि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए एक समयबद्ध योजना बनाई जाए और यह केवल दिल्ली तक सीमित न रहे बल्कि पूरे एनसीआर में लागू हो।

साथ ही हमें स्वच्छ ऊर्जा वाले वाहनों की ओर भी रुख करने की जरूरत है। इलेक्ट्रिक बसें, टैक्सियां और तिपहिया वाहन विद्युतीकृत मेट्रो नेटवर्क के मजबूत पूरक बनने चाहिए। ईपीसीए की सिफारिशों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 2019 तक इसकी नींव रख दी थी।

कोर्ट ने शहर में कम से कम 10,000 छोटी-बड़ी बसों की आवश्यकता पर जोर देते हुए निर्देश दिए थे। इसके अलावा कोर्ट ने दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन के नेटवर्क विस्तार और पहले हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर (दिल्ली-मेरठ) के निर्माण का रास्ता भी साफ कर दिया था।

जाहिर है अभी इस दिशा में बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। विशेष रूप से पूरे एनसीआर को एक-दूसरे से जोड़ने की जरूरत है। साथ ही परिवहन के विभिन्न साधनों को आपस में जोड़ने की भी आवश्यकता है ताकि हम किफायती और सुविधाजनक तरीके से यात्रा कर सकें। लेकिन हम जो भी कर रहे हैं, वह नाकाफी और देर से उठाया गया कदम है।

आज दिल्ली में 10,000 के बजाय केवल 6,840 बसें ही हैं। एनसीआर के अन्य शहरों में तो आपसी कनेक्टिविटी के नाम पर व्यावहारिक रूप से कुछ भी नहीं है। अपने बस बेड़े का विद्युतीकरण करने की दिल्ली सरकार की योजना उल्लेखनीय जरूर है, साथ ही हमें सार्वजनिक परिवहन में यात्रियों की संख्या बढ़ाने और लोगों को एक ऐसा व्यावहारिक विकल्प देने की भी योजना चाहिए, जिससे प्रेरित होकर वे अपनी निजी कारें छोड़ सकें।

दूसरा मुद्दा शहर और उसके आसपास के अनाधिकृत इलाकों में चल रही फैक्ट्रियों से होने वाले औद्योगिक प्रदूषण का है। इन्हें कोयले का इस्तेमाल बंद करने का निर्देश तो दे दिया गया है लेकिन इसे लागू करने का प्रयास न के बराबर हुए हैं।

उनके पास इसके व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध हों, चाहे वह सस्ती बिजली हो या प्राकृतिक गैस। मैं ऐसी और भी कई बातें गिना सकती हूं लेकिन मेरी मुख्य शिकायत यही है कि हम प्रदूषण के ग्राफ को नीचे लाने के लिए न तो व्यापक पैमाने पर काम कर रहे हैं और न ही कोई सख्त व समयबद्ध कार्रवाई कर रहे हैं।