हजारों सालों से इंसान एक ऐसे मिले-जुले प्राकृतिक माहौल में रहता आया है, जहां कृषि क्षेत्र जंगलों, घास के मैदान और नदी-झरनों से घिरे हुए हैं। यह मिलाजुला ताना-बाना तरह-तरह के वन्यजीवों को पनाह देता है, जैवविविधता को बढ़ाता है। आज भी कई आदिवासी और किसान समुदाय ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां जंगली सूअर, बंदर, और तेंदुए जैसे जानवर गांवों, बगीचों और खेतों में आजादी से घूमते हैं। इनमें से कई जानवरों की कई पीढ़ियों ने कभी कोई ऐसा घना या शांत जंगल देखा ही नहीं है जहां इंसानों का दखल न हो। उन्होंने पूरी तरह से इस इंसानी माहौल के हिसाब से खुद को ढाल लिया है। लेकिन अब, तेजी से बढ़ते शहरीकरण, खेती के विस्तार और जमीन के व्यावसायिक इस्तेमाल ने बिल्कुल नए तरह के परिदृश्यों को जन्म दे दिया है।
इसके साथ ही, वन्यजीव अभ्यारण्यों के निर्माण ने कुछ खास इलाकों को प्राकृतिक घोषित करके उन्हें बाकी हिस्सों से अलग कर दिया है। इसने एक ऐसे पारिस्थितिक अलगाव को बढ़ावा दिया है, जो इतिहास में कभी था ही नहीं। लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल है। इंसान और वन्यजीव आज भी एक-दूसरे से जुड़े हुए साझा माहौल में साथ रह रहे हैं। कोई भी असरदार नीति बनाने के लिए इस मिले-जुले ताने-बाने को समझना बेहद जरूरी है। अब ऐसे सबूत लगातार सामने आ रहे हैं, जो बताते हैं कि इस बढ़ते टकराव की मुख्य वजह सिर्फ पर्यावरण या जंगलों की कमी नहीं, बल्कि जानवरों के व्यवहार में आया बदलाव है। कई वन्यजीव प्रजातियां इंसानों को लेकर अपना वह स्वाभाविक डर खो चुकी हैं। हमारे विकासवादी इतिहास के एक बहुत बड़े हिस्से में इंसान हमेशा से एक शीर्ष शिकारी रहा है। इसी डर की वजह से जंगली जानवरों ने पीढ़ियों से इंसानों से दूर रहना सीखा था।
यह व्यवहारिक विशेषता एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करती थी। इसके चलते साझा इलाकों में साथ रहने के बावजूद जानवर इंसानों से एक निश्चित दूरी बनाकर रखते थे और उनके बीच सीधे टकराव बहुत कम होते थे। साल 1972 में जब वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम लागू किया गया, तब भारत के वन्यजीव वाकई अंधाधुंध शिकार और तस्करी (पोचिंग) के गंभीर संकट से जूझ रहे थे। उस दौर यानी 1970 के दशक में तैयार की गई यह वन्यजीव नीति असल में एक आपदा प्रबंधन रणनीति जैसी थी। लेकिन वक्त के साथ संकट से निपटने का यह तात्कालिक तरीका ही हमारी स्थायी दीर्घकालिक नीति बन गया। इस नीति ने कई प्रजातियों की आबादी को दोबारा बढ़ाने में बड़ी कामयाबी जरूर हासिल की, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी सामने आया। आज जानवरों की जो दो-तीन पीढ़ियां मौजूद हैं, उनके लिए इंसान अब किसी खतरे की तरह नहीं रह गए हैं। रही-सही कसर पर्यटन ने पूरी कर दी, जिसने जानवरों के इस बदलते व्यवहार को और ज्यादा बढ़ावा दिया। इसके बावजूद हमारा यह कानून आज के समय की व्यावहारिक और पारिस्थितिक जटिलताओं के हिसाब से नहीं ढल पाया है।
इसे सुधारने के लिए हमारे पास दो बड़े बदलावों के लिए हैं। पहला, सबसे जरूरी बात यह है कि मुआवजा देने की पूरी प्रक्रिया को बहुत आसान, व्यावहारिक और किसानों के अनुकूल बनाया जाए। इसके साथ ही तुरंत राहत देने के लिए कुछ खास इलाकों में चुनिंदा प्रजातियों के सीमित शिकार की अनुमति देना जरूरी हो गया है। आगे चलकर इसकी जगह एक नई लंबी अवधि की नीति ले लेगी। दूसरा बदलाव ज्यादा चुनौतीपूर्ण और विवादित है। इसमें कुछ तय इलाकों में नियंत्रित और वैज्ञानिक तरीके से शिकार को दोबारा शुरू करना शामिल है। यहां मकसद जानवरों की संख्या को कम करना बिल्कुल नहीं है। बल्कि व्यवहार विज्ञान के शोध बताते हैं कि शिकार का यह डर शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह के जानवरों में इंसानों से दूर रहने की आदत को बनाए रखता है। दुनिया के कई देश इस तरीके का इस्तेमाल करते हैं, ताकि वन्यजीव इंसानी बस्तियों से एक सुरक्षित दूरी बनाकर रखें। भारत में भी कड़ी निगरानी, पर्यावरण के नियमों और स्थानीय लोगों की भागीदारी के साथ ऐसा ही एक सटीक सिस्टम बनाया जा सकता है। इससे इंसानों और वन्यजीवों के बीच बर्ताव का एक सुरक्षित दायरा फिर से कायम हो सकेगा। वक्त के साथ जब जानवरों में इंसानों से बचने का यह स्वभाव वापस आ जाएगा, तब दोनों का साथ रहना कहीं ज्यादा आसान और मुमकिन हो जाएगा।
यह बहस पर्यावरण संरक्षण बनाम लोगों की रोजी-रोटी की नहीं है। भारत इस तरह के दोतरफा बंटवारे को बिल्कुल नहीं झेल सकता। यहां आर्थिक सच्चाई और पर्यावरण की जरूरतें एक-दूसरे की मददगार होनी चाहिए। खासकर हमारे देश में, जहां जंगल और इंसानी जीवन आपस में पूरी तरह घुले-मिले हैं। आज हमारे पास आधुनिक विज्ञान के कई नए साधन हैं। जैसे कि पर्यावरण का अध्ययन, जानवरों के बर्ताव पर रिसर्च और लोगों की आर्थिक स्थिति से जुड़े आंकड़े। ये सभी चीजें हमें अगले 50 सालों के लिए वन्यजीवों से जुड़ी नीतियां बिल्कुल नए सिरे से बनाने में मदद कर सकती हैं। आगे बढ़ने के लिए हमारी नीतियों को केवल भावनाओं और प्रतीकों से ऊपर उठना होगा। उन्हें इस हकीकत को स्वीकार करना होगा कि जानवर असल में कैसा बर्ताव कर रहे हैं, लोग जमीन पर कैसे जी रहे हैं और हमारे इलाके किस तरह बदल रहे हैं। एक ऐसा भविष्य बिल्कुल मुमकिन है जहां वन्यजीव और इंसानी बस्तियां दोनों साथ-साथ फल-फूल सकें। लेकिन इसके लिए हमें कुछ असहज करने वाले कड़वे सवालों का सामना करना होगा। हमें वैज्ञानिक सबूतों को अपनाना होगा और पूरी संवेदनशीलता व साफ सोच के साथ अपनी नीतियों को दोबारा लिखना होगा। सही मायने में सिर्फ तभी वन्यजीव संरक्षण पूरी नैतिकता के साथ और लंबे समय के लिए कामयाब हो सकता है।
(मिलिंद वाटवे एक स्वतंत्र शोधकर्ता हैं। गुरुदास नुलकर पुणे स्थित गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स एंड इकोनॉमिक्स के सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट के निदेशक हैं)