कृषि

नए सिरे से हो वन्यजीवों के आवासों का वर्गीकरण

लोगों की कीमत पर वन्यजीवों का संरक्षण न तो मुमकिन है और न ही सही

H S Pabla

प्राकृतिक संसाधनों की तरह ही वन्यजीवों का भी प्रबंधन किया जाना चाहिए, ताकि उनका इस्तेमाल इंसानों की बेहतरी के लिए हो सके। संरक्षण नीति का मुख्य आधार स्थानीय लोगों, उनकी फसलों, मवेशियों और संपत्ति की सुरक्षा होना चाहिए। अगर जानवरों के जरिए लोगों को कोई आर्थिक फायदा मिलने लगे, तो वे उनके किए नुकसान को भी आसानी से बर्दाश्त कर लेंगे। इसके लिए हमें उनके रहने वाले इलाकों को तीन श्रेणियों में बांटना होगा। पहली श्रेणी पूरी तरह सुरक्षित क्षेत्रों की होगी, जहां जानवरों को पूरा संरक्षण मिलेगा और इंसानों का कोई दखल नहीं होगा। दूसरी श्रेणी बफर जोन और अन्य जंगलों की होगी, जहां पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए सीमित शिकार की अनुमति दी जाएगी और उससे होने वाली कमाई को जरूरतमंद समुदायों में बांटा जाएगा। तीसरी श्रेणी इंसानी बस्तियों और खेतों की होगी, जहां बड़े जंगली जानवरों का आना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और उन्हें हटाने के लिए जो भी तरीका सबसे तेज और असरदार होगा, उससे उन्हें वहां से बाहर किया जाएगा। पूरी दुनिया में वन्यजीवों को इसी तरह संभाला जाता है। सीधे शब्दों में कहें तो हमें सिर्फ जानवरों को सुरक्षित रखने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि संरक्षण के तरीके को अपनाना चाहिए, जिसमें उनका सीमित इस्तेमाल भी शामिल हो। हमारे वन्यजीव कानून की संशोधित प्रस्तावना में अब यही व्यवस्था की गई है। इस प्रस्तावना में कंजर्वेशन शब्द के जुड़ने से भारत में वन्यजीवों को संभालने की भविष्य की दिशा पहले ही तय हो चुकी है। अब हमें बस इस नए बदलाव को खुलकर अपनाने की जरूरत है।

साथ ही कानून व इससे जुड़ी दूसरी सभी नीतियों को भी इस प्रस्तावना के हिसाब से ढालने की जरूरत है। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत सिर्फ एक अधिकारी मुख्य वन्यजीव वार्डन के पास यह अधिकार है। वही इंसानी जान या संपत्ति के लिए खतरनाक बन चुके जंगली जानवरों को मारने या पकड़ने की इजाजत दे सकता है और कानून में इन दोनों ही कदमों को शिकार की श्रेणी में रखा गया है। कानून की अनुसूची-II में आने वाले जीवों के मामले में सरकार यह अधिकार जिसे चाहे, सौंप सकती है। बिहार और केरल ने कुछ हद तक ऐसा किया भी है। उन्होंने पंचायतों को यह छूट दी है कि वे खेतों में रहने वाले जंगली सूअरों और नीलगायों को मारने के लिए शिकारियों की मदद ले सकें। यहां एक विडंबना भी है। वे मारे गए जानवरों के टन भर मांस को जमीन में दफना देते हैं, जबकि यह उन गरीब पीड़ित किसानों को दिया जा सकता है, जिनकी आजीविका उजड़ी है।

अगर हम इस समस्या को सच में हल करना चाहते हैं, तो हम और भी नए और बेहतर तरीके ढूंढ सकते हैं। स्थानीय लोगों को शामिल करने के नाम पर हर किसी को खुली छूट नहीं दी जा सकती। ऐसे नियम बनाए जा सकते हैं, जहां स्थानीय समुदाय मुख्य भूमिका में हों और उनकी देखरेख में नियंत्रित शिकार की इजाजत हो। हमारा कानून मुख्य वन्यजीव वार्डन पर इस टकराव को रोकने की कोई कानूनी जिम्मेदारी नहीं डालता। यह उन्हें सिर्फ ऐसा करने का अधिकार देता है यानी यह पूरी तरह उनकी मर्जी पर है कि वे कदम उठाएं या न उठाएं। हमें कानून में ऐसा बदलाव करना चाहिए, जिससे अनिवार्य हो जाए कि वे वन्यजीवों से होने वाले खतरों का पहले से अंदाजा लगाएं।

जंगली जानवरों को दूसरे स्थानों पर छोड़ना समस्या का हल नहीं है। ऐसा सिर्फ बहुत छोटे स्तर पर या कुछ खास हालातों में ही किया जा सकता है। यह तरीका बेहद महंगा है और तकनीकी रूप से इसे करना मुश्किल है। ये जानवर अक्सर वापस अपने पुराने ठिकाने की तरफ भागते हैं और रास्ते में भारी तबाही मचाते हैं। हम सुरक्षित जंगलों का दायरा एक हद तक ही बढ़ा सकते हैं। फिर भी स्थानीय लोगों के हितों को नुकसान पहुंचाए बिना ऐसा करने की हर मुमकिन कोशिश होनी चाहिए। वैसे अब इन सुरक्षित क्षेत्रों को और बड़ा करने की गुंजाइश बहुत कम बची है। हमारे लगभग 25 फीसदी प्राकृतिक जंगल पहले से ही इसके दायरे में आ चुके हैं और बाकी बचे जंगल वहां के लोगों के गुजारे के लिए बेहद जरूरी हैं। इसके साथ ही वनाधिकार अधिनियम, 2006 भी हमें इस मामले में ज्यादा छूट नहीं देता।

हमारा सुरक्षित जंगलों का दायरा शायद काफी न हो, लेकिन हमारा देश इससे ज्यादा का बोझ नहीं उठा सकता। भारत में जमीन की भारी कमी है। अगर प्रति व्यक्ति के हिसाब से देखें, तो हमारे पास दुनिया की कुल वन भूमि का केवल 10 प्रतिशत हिस्सा ही उपलब्ध है। इसलिए हमारे लिए सबसे समझदारी भरा और पर्यावरण के अनुकूल रास्ता यही है कि हम जमीन के इस्तेमाल के लिए एक चरणबद्ध नीति अपनाएं। इसका सीधा मतलब है कि हम सुरक्षित जंगलों के लिए जितनी जमीन तय कर सकते हैं, उतनी करें। इसके साथ ही इन जंगलों के बाहर वन्यजीवों के संसाधनों का इस तरह इस्तेमाल हो जिससे उन प्रभावित लोगों को फायदा मिल सके, जो इन जानवरों का नुकसान झेलते हैं। जमीन की कमी के कारण इंसानों और जानवरों को बहुत सीमित जगह में एक साथ रहना पड़ रहा है। लोगों की सुरक्षा के लिए यह बहुत जरूरी है कि सुरक्षित क्षेत्रों से बाहर जानवरों की संख्या को एक तय और बर्दाश्त करने लायक सीमा में रखा जाए। जंगली जानवरों से होने वाला फायदा उनके खतरों और नुकसान से ज्यादा होगा, तो स्थानीय लोग भी अपने आसपास वन्यजीवों का स्वागत करेंगे। आखिर लोगों की कीमत पर वन्यजीवों का संरक्षण न मुमकिन है और न ही सही।

(एचएस पाबला मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य वन्यजीव वार्डन हैं)