इलस्ट्रेशन: योगेन्द्र आनंद / सीएसई
कृषि

खेती का दुष्चक्र: बंपर पैदावार, झूठा समर्थन मूल्य और बढ़ती किसान आत्महत्याओं का अंतहीन संकट

भारत का कृषि क्षेत्र अब लाभकारी नहीं रहा है और इस स्थिति को बदलने हेतु सरकार कोई प्रयास भी नहीं कर रही

DTE Staff

यह एक चक्रीय अभिशाप है। सबसे पहले बंपर पैदावार की खबरें आती हैं, जो इस बात का स्पष्ट संकेत होती हैं कि देश में रोजगार का सबसे बड़ा साधन किसानों की आर्थिक आय में वृद्धि करेगा। इसके बाद सरकार कुछ चुनिंदा फसलों के लिए समर्थन मूल्य बढ़ाती है और फिर खरीद के वादे करती है। लेकिन समर्थन मूल्य वास्तविक बाजार व्यापार को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं। उदाहरण के लिए इस अप्रैल में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत ‘‘क्रॉप वेदर वॉच ग्रुप’’ ने कहा कि 12 फसलों के थोक मूल्य उनके न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम थे। इसके बाद मंदी आती है। किसानों द्वारा अपने खेतों के पास सड़कों पर या बाजारों में अपनी उपज को फेंकने की तस्वीरें डरावनी रूप से आम हो जाती हैं। कई किसानों को तब भी अपनी उपज फेंकने के लिए मजबूर होना पड़ता है जब उनकी बंपर फसलें बेमौसम चरम मौसम (एक्सट्रीम वेदर) की घटनाओं के कारण बड़े पैमाने पर नष्ट हो जाती हैं, जो कि बदलते जलवायु में एक सामान्य बात बन चुकी है। भारत के किसानों के लिए जो दुनिया के सबसे छोटे भूमिधारक हैं और जिन पर सबसे बड़े उपभोक्ता वर्ग को उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने का बोझ है, अंतिम परिणाम जीविका नहीं बल्कि केवल जीवित रहने मात्र का संघर्ष है।

इस समय सरकार किसानों की आत्महत्या से संबंधित आंकड़े जारी करती है जो पहले की तरह बार-बार लौटने वाले इस अभिशाप की भांति अब लोगों की संवेदनाओं को झकझोरने की क्षमता खो चुके हैं। वे अधिकतर एक घिसे-पिटे और नीरस आंकड़े भर बनकर रह गए हैं। फिर भी किसी किसान की आत्महत्या अपने पीछे व्यवस्था द्वारा किए जा रहे निरंतर दमन और घुटन की एक अनलिखी कहानी छोड़ जाती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा मई में जारी “भारत में आकस्मिक मृत्यु एवं आत्महत्या रिपोर्ट, 2024” के अनुसार वर्ष 2024 में कृषि क्षेत्र से जुड़े कम से कम 10,546 व्यक्तियों ने आत्महत्या कर ली। अर्थात देश में आत्महत्या करने वाला प्रत्येक 15वां व्यक्ति खेती-किसानी से जुड़ा था। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रत्येक घंटे एक किसान अथवा एक कृषि मजदूर आत्महत्या कर रहा था।

आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि कृषि क्षेत्र गहरे संकट से गुजर रहा है। यह अब लाभकारी नहीं रह गया है और इसे लाभकारी बनाने के लिए सरकार की ओर से पर्याप्त सहायता भी उपलब्ध नहीं है। हाल के वर्षों में किसान वस्तुतः एक मजदूर में परिवर्तित हो गया है। कृषि परिवार की मासिक आय का लगभग एक-तिहाई हिस्सा खेती से प्राप्त होता है जबकि शेष दो-तिहाई आय सरकारी या निजी सेवाओं, मजदूरी तथा “अन्य उद्यमों” से आती है। दूसरी ओर पहले से ही दबाव झेल रहे कृषि क्षेत्र में अधिक लोगों के शामिल होने के स्पष्ट संकेत दिखाई दे रहे हैं जिनमें अधिकांश के कृषि मजदूर के रूप में जुड़ने की संभावना है। भूमि जोत का आकार घटने के साथ खेती से होने वाली आय में तीव्र गिरावट आती है, जिससे परिवारों को गैर-कृषि गतिविधियों पर अधिक निर्भर होना पड़ता है। वर्ष 2024 में कृषि क्षेत्र से संबंधित आत्महत्याओं में कम से कम 56 प्रतिशत कृषि मजदूरों की थीं जो वर्ष 2021 से देखी जा रही प्रवृत्ति की निरंतरता को दर्शाता है। साथ ही वर्ष 2024 का यह अनुपात पिछले पांच वर्षों में दूसरा सर्वाधिक रहा।

वर्ष 2024 में नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट द्वारा किए गए एक विश्लेषण में बताया गया कि उससे पूर्व के पांच वर्षों के दौरान 30 प्रतिशत कृषि परिवारों ने अनियमित वर्षा, कीट-प्रकोप, चक्रवातों तथा सूखे के कारण फसल खराब होने की सूचना दी थी। इसके अतिरिक्त 12 प्रतिशत परिवारों को मूल्य के उतार-चढ़ाव के कारण आर्थिक हानि का सामना करना पड़ा। इन प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटने के लिए अनेक परिवारों को अपनी बचत का उपयोग करना पड़ा या अनौपचारिक स्रोतों से ऋण लेना पड़ा। इसके अलावा एक कृषि परिवार की औसत शुद्ध आय मात्र 1,951रुपए थी। इसके परिणामस्वरूप ऋण का दुष्चक्र शुरू हुआ। औसतन एक कृषि परिवार पर 91,231 रुपए का ऋण था, जबकि गैर-कृषि परिवारों पर औसतन 89,074 रुपए का ऋण था। उसी वर्ष संसद की स्टैंडिंग कमेटी ऑन एग्रीकल्चर, एनिमल हजबेंड्री एंड फूड प्रोसेसिंग ने कहा, “वर्तमान स्थिति में सावधानीपूर्वक निगरानी तथा लक्षित हस्तक्षेपों की आवश्यकता है ताकि किसान अपने ऋणों का सतत रूप से प्रबंधन कर सकें और साथ ही अपनी कृषि गतिविधियों में निवेश जारी रख सकें। विभाग को यह सुनिश्चित करने के लिए हरसंभव प्रयास करना चाहिए कि किसान असहनीय ऋणों के दुष्चक्र में न फंसें तथा किसानों के कल्याण के लिए संचालित योजनाओं का वास्तविक और ठोस प्रभाव धरातल पर दिखाई दे।”

यह फसल चक्र भविष्य में और अधिक अनिश्चित होने वाला है। एक सुपर अल नीनो की स्थिति बनने वाली है, जिससे माॅनसून चक्र के प्रभावित होने की आशंका है जो किसान नए फसल चक्र में पहले से ही घाटे और ऋण के बोझ के साथ प्रवेश कर रहे हैं, उनमें इस चुनौती का सामना करने की पर्याप्त क्षमता नहीं है। बदलती जलवायु व्यवस्था के इस नए दौर में किसानों के लिए एक नई और समुचित नीति व्यवस्था उपलब्ध कराना न्यूनतम अपेक्षा होनी चाहिए।

यह संपादकीय टिप्पणी डाउन टू अर्थ, हिंदी पत्रिका के जुलाई 2026 के अंक में प्रकाशित हुई है।