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कृषि

जीन-संपादित फसलों की नई क्रांति: क्या यूरोप कृषि के भविष्य की ओर बढ़ रहा है?

यूरोपीय संसद का फैसला जीन संपादित फसलों के लिए रास्ता खोल रहा है, जिससे जलवायु अनुकूल, रोग प्रतिरोधी और अधिक पोषणयुक्त किस्मों के विकास को नई गति मिल सकती है

Ramanuj Pathak

कृषि मानव सभ्यता की आधारशिला रही है। लेकिन बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन, घटते प्राकृतिक संसाधन और खाद्य सुरक्षा की चुनौतियों ने वैज्ञानिकों को ऐसी तकनीकों की खोज के लिए प्रेरित किया है, जो कम संसाधनों में अधिक और बेहतर उत्पादन सुनिश्चित कर सकें। इसी दिशा में जीन संपादन को कृषि विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जा रहा है।

हाल ही में यूरोपीय संसद ने एक विधेयक पारित किया है, जिसके तहत कुछ जीन संपादित फसलों की स्वीकृति प्रक्रिया को सरल बनाने का रास्ता साफ हुआ है। वैज्ञानिकों और बीज उद्योग का मानना है कि इससे यूरोप में कृषि नवाचार को गति मिलेगी और रोग प्रतिरोधी, जलवायु अनुकूल तथा अधिक पोषणयुक्त फसलों के विकास में तेजी आएगी।

यह फैसला केवल यूरोप तक सीमित नहीं है। इसके प्रभाव वैश्विक कृषि नीति, खाद्य सुरक्षा और जैव प्रौद्योगिकी के भविष्य पर भी पड़ सकते हैं।

जीन संपादन एक आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी तकनीक है, जिसके माध्यम से किसी जीव के डीएनए में अत्यंत सटीक और लक्षित परिवर्तन किए जा सकते हैं।

यह पारंपरिक आनुवंशिक रूपांतरण से अलग है। जीएम तकनीक में अक्सर किसी दूसरे जीव का जीन पौधे में डाला जाता है, जबकि जीन संपादन में पौधे के अपने जीनों में ही छोटे और नियंत्रित बदलाव किए जाते हैं।

इस तकनीक का सबसे चर्चित उपकरण सीआरआईएसपीआर कैस 9 है, जिसे जैविक कैंची भी कहा जाता है। इसकी मदद से वैज्ञानिक डीएनए के किसी विशेष हिस्से को काट, हटाकर या संशोधित कर सकते हैं।

हजारों वर्षों से किसान और वैज्ञानिक चयनात्मक प्रजनन के माध्यम से बेहतर किस्में विकसित करते रहे हैं। लेकिन यह प्रक्रिया धीमी होती है और कई बार इच्छित गुण प्राप्त करने में दशकों लग जाते हैं।

जीन संपादन इस प्रक्रिया को कहीं अधिक तेज और सटीक बना देता है। उदाहरण के लिए यदि किसी पौधे में रोग प्रतिरोधकता से जुड़ा जीन पहचान लिया जाए, तो उसी जीन में बदलाव कर कम समय में नई किस्म विकसित की जा सकती है।

यूरोप लंबे समय से आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों के प्रति सतर्क रहा है और वहां उनकी स्वीकृति प्रक्रिया काफी कठोर रही है।

नए प्रस्ताव के अनुसार उन जीन संपादित फसलों के लिए नियम सरल किए जाएंगे, जिनमें किए गए परिवर्तन प्राकृतिक उत्परिवर्तन या पारंपरिक प्रजनन से भी संभव हैं। इससे अनुसंधान और व्यावसायिक उपयोग दोनों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

आज कृषि जलवायु परिवर्तन के सबसे गंभीर प्रभावों का सामना कर रही है। बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, बार बार पड़ने वाले सूखे और बाढ़ तथा नए कीट और रोगों के कारण पारंपरिक किस्मों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है।

जीन संपादन की मदद से ऐसी फसलें विकसित की जा सकती हैं जो अधिक तापमान सहन कर सकें, कम पानी में बेहतर उत्पादन दें, रोगों और कीटों के प्रति अधिक प्रतिरोधी हों तथा लवणीय मिट्टी जैसी कठिन परिस्थितियों में भी उग सकें।

हर वर्ष पौधों के रोगों के कारण वैश्विक स्तर पर अरबों डॉलर की कृषि हानि होती है। यदि फसलों की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाई जा सके, तो रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।

इससे उत्पादन लागत घटेगी, पर्यावरणीय प्रदूषण कम होगा और मानव स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

विश्व में करोड़ों लोग आज भी सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से जूझ रहे हैं। वैज्ञानिक ऐसी फसलें विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं जिनमें अधिक विटामिन, प्रोटीन, खनिज और बेहतर पोषण गुणवत्ता हो।

जीन संपादन इस दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भविष्य की फसलें केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य का आधार भी बन सकती हैं।

जीन संपादन के अनेक लाभ हैं, लेकिन इसके साथ कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी जुड़े हैं।

सबसे बड़ा सवाल इसके दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों का है। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक को व्यापक स्तर पर अपनाने से पहले इसके पारिस्थितिक प्रभावों का गहन मूल्यांकन होना चाहिए।

एक अन्य चिंता जैव विविधता को लेकर है। यदि कुछ चुनिंदा जीन संपादित किस्में अत्यधिक लोकप्रिय हो जाएं, तो स्थानीय और पारंपरिक किस्मों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।

इसके अलावा पेटेंट और बौद्धिक संपदा अधिकारों को लेकर भी बहस जारी है। विशेषज्ञों को आशंका है कि कहीं बीज बाजार पर कुछ बड़ी कंपनियों का नियंत्रण और अधिक मजबूत न हो जाए।

अमेरिका, चीन, जापान, अर्जेंटीना और ब्राजील जैसे देश पहले ही जीन संपादित फसलों के अनुसंधान और उपयोग को बढ़ावा दे रहे हैं। यूरोपीय संसद का हालिया निर्णय इस वैश्विक प्रवृत्ति को और मजबूत कर सकता है।

भारत कृषि प्रधान देश है और जलवायु परिवर्तन की मार सीधे झेल रहा है। खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा और किसानों की आय बढ़ाने के लिए नई तकनीकों की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही है।

देश में जीन संपादन को लेकर नीतिगत चर्चा जारी है। यूरोप का यह निर्णय भारतीय वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं के बीच इस बहस को नई दिशा दे सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में सूखा सहिष्णु धान, रोग प्रतिरोधी गेहूं, अधिक पोषणयुक्त दलहन और जलवायु अनुकूल तिलहन जैसी फसलों के विकास में यह तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

आने वाले वर्षों में कृषि का लक्ष्य केवल अधिक उत्पादन नहीं होगा, बल्कि टिकाऊ खेती, कम पर्यावरणीय प्रभाव, बेहतर पोषण, जलवायु अनुकूलन और संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग होगा।

जीन संपादन इन सभी लक्ष्यों को हासिल करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।

यूरोपीय संसद का हालिया निर्णय इस बात का संकेत है कि दुनिया अब ऐसी जैव प्रौद्योगिकियों को स्वीकार करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, जो खाद्य सुरक्षा और जलवायु संकट जैसी बड़ी चुनौतियों का समाधान देने की क्षमता रखती हैं।

हालांकि इसके साथ वैज्ञानिक प्रगति और जैविक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक होगा। पारदर्शी नियमन, स्वतंत्र अनुसंधान और जन जागरूकता के माध्यम से ही इस तकनीक के लाभ समाज तक सुरक्षित रूप से पहुंचाए जा सकते हैं।

संभव है कि आने वाले दशकों में खेतों में उगने वाली अनेक फसलें जीन संपादन तकनीक की देन हों और इतिहास इसे कृषि की दूसरी हरित क्रांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में याद करे।