राजस्थान के नांगलहेड़ी गांव में मुकेश कुमार गुर्जर ने जैविक खेती की शपथ ली, लेकिन कुछ किसान अभी भी रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कर रहे हैं।
एनजीओ कोफेड ने किसानों को जैविक खेती के लाभ समझाए और जैविक उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया।
सरपंच गणेश चौधरी का मानना है कि एक साल में जैविक खेती का असर दिखेगा।
मुकेश का मानना है कि जैविक खेती से लागत कम होगी और उत्पादन में सुधार होगा।
मुकेश कुमार गुर्जर के लिए 2 जनवरी 2026 का दिन खास था। इस दिन उन्होंने अपनी ग्राम पंचायत के करीब 800 लोगों के साथ शपथ ली कि वे भविष्य में यूरिया और डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों को इस्तेमाल नहीं करेंगे। इस वक्त उनके 2 एकड़ के खेतों में गेहूं का फसल खड़ी है और उन्होंने पहली बार इसमें रासायनिक उर्वरकों को इस्तेमाल नहीं किया है। वह मानते हैं कि उर्वरकों का इस्तेमाल न करने पर इस साल गेहूं की फसल कमजोर है, फिर भी उन्हें अपने निर्णय पर पछवाता नहीं है। उन्हें पक्का यकीन है कि आने वाले दो वर्षों में उत्पादन सामान्य हो जाएगा।
मुकेश कुमार गुर्जर राजस्थान के कोटपुतली-बहरोड़ जिले में करीब 1,000 की आबादी वाले नांगलहेड़ी गांव में रहते हैं। पूरे गांव की अर्थव्यवस्था कृषि और पशुपालन पर टिकी है। गुर्जर बहुल इस गांव में खेती की रकबा करीब 110 हेक्टेयर है और 5,000-6,000 भैंसें हैं। मुकेश कुमार का अनुमान है कि गांव के हर घर में कम से कम 5 और अधिकतम 50 भैंसें तक है। इन पशुओं से प्राप्त होने वाला गोबर आसानी से रासायनिक उर्वरकों की भरपाई कर सकता है।
रासायनिक उर्वरकों को तिलांजलि देने के पीछे मुकेश तर्क देते हैं कि यूरिया, डीएपी और कीटनाशकों से मिट्टी खराब हो रही है। साथ ही रसायन युक्त इन फसलों से बीमारियों का बोझ भी बढ़ रहा है। इन्हीं तथ्यों को देखते हुए मुकेश सहित गांव के अधिकांश लोगों का झुकाव जैविक कृषि की ओर हुआ है।
मुकेश का मानना है कि इससे निश्चित रूप से कृषि की लागत में कमी आएगी। उनका अनुमान है कि उनके 8 बीघा यानी दो हेक्टेयर खेतों में 16 कट्टे यूरिया, 8 कट्टे डीएपी और 8 कट्टे जिंक की खपत होती थी। यदि इस पूरे खर्चे जो जोड़ा जाए तो लगभग 11,500 रुपए की बचत होगी। मुकेश कुमार के अनुसार, एक स्थानीय एनजीओ कोफेड ने उन्हें जैविक उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने की पूरी गारंटी दी है और किसानों को लगातार जैविक खेती का महत्व बताकर प्रशिक्षित भी किया है। इससे भी किसानों का रुझान जैविक खेती की तरफ गया है।
मुकेश का गांव नांगलहेड़ी बामनवास कांकड़ ग्राम पंचायत में शामिल है। बामनवास गांव में ही एनजीओ द्वारा किए गए एक कार्यक्रम में लोगों ने जैविक खेती की शपथ ली थी। एनजीओ का दावा है कि बामनवास कांकड़ के सभी किसानों ने भी खेतों में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग न करने की शपथ ली थी।
रसायन का इस्तेमाल जारी
हालांकि जमीनी पड़ताल में यह दावा पूरी तरह सच नहीं मिला। इस गांव में रहने वाले किसान अशोक कुमार न बताया कि न तो उन्हें किसी शपथ ग्रहण कार्यक्रम की जानकारी है और न ही गांव के जैविक बनने के दावे की। उन्होंने कहा कि गांव के सभी किसान खेतों में यूरिया और डीएपी का इस्तेमाल कर रहे हैं। डाउन टू अर्थ ने भी गांव में किसानों को रासायनिक उर्वरकों के साथ देखा। अशोक कुमार स्वीकार करते हैं कि रासायनिक उर्वरकों से खेतों को नुकसान होता है लेकिन अगर इसे न डालें तो पैदावार ही नहीं होगी।
इसी तरह ग्राम पंचायत में शामिल भड़ाना की बाल गांव में रहने वाले लाटुराम गुर्जर कहते हैं कि उनके गांव के लोगों ने भी रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल न करने की शपथ ली थी लेकिन फिर भी कुछ लोग रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि उनके ही गांव में रहने वाले सुरेश गुर्जर कहते हैं कि उन्होंने अपने 2.5 बीघा के खेतों में रासायनिक खाद की जगह जीवामृत का इस्तेमाल किया है।
“एक साल में दिखेगा असर”
बामनवास कांकड़ के सरपंच गणेश चौधरी ने डाउन टू अर्थ को बताया कि किसी भी नई चीज को अपनाने में समय लगता है। भले ही उनका गांव अभी जैविक नहीं हुआ लेकिन एक साल में किसान जैविक खेती का महत्व समझकर रसायन डालना बंद कर देंगे। उनका कहना है कि पूरी ग्राम पंचायत में 2,000 परिवार हैं और 30,000 हेक्टेयर खेती का रकबा है। जैविक खेती अपनाने से किसानों को ही फायदा होगा क्योंकि उनकी उपज ऊंचे दाम पर बिकेगी।
कोफेड एनजीओ से जुड़े करणी सिंह के अनुसार, हम पिछले एक साल से किसानों को घर-घर जाकर जैविक खेती का महत्व समझा रहे हैं और यह भी बता रहे हैं कि जैविक उत्पादों की ऊंची कीमत मिलेगी और दूध भी प्रीमियम दाम पर बिकेगा। यह बात किसानों को समझ में आई और उन्होंने रसायनमुक्त खेती की शपथ ली है। करणी सिंह के अनुसार, हम ऐसे किसानों का पार्टिसिपेटिंग गारंटी सिस्टम (पीजीएस) में पंजीकरण कर रहे हैं।