फोटो: विकास चौधरी 
कृषि

यूरिया की मात्रा में कटौती से किसानों पर बढ़ा आर्थिक बोझ, कृषि उत्पादन पर संकट

मौजूदा 270 रुपए प्रति बैग यूरिया की दर से देखें तो किसान को अब प्रति हेक्टेयर 1755 रुपए के बजाय लगभग 2835 रुपए खर्च करने होंगे

Virender Singh Lather

केंद्र सरकार ने कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आदेश के तहत 23 जनवरी 2026 से किसान-विरोधी आंकड़ेबाजी करते हुए यूरिया के बैग का वजन 50 किलोग्राम से घटाकर 40 किलोग्राम कर दिया है। इसके साथ ही यूरिया में नाइट्रोजन की मात्रा भी 46 प्रतिशत से घटाकर 36 प्रतिशत कर दी गई है।

इसके परिणामस्वरूप, पहले जहां प्रति बैग यूरिया में लगभग 23 किलोग्राम नाइट्रोजन मिलती थी, अब यह घटकर मात्र 14.4 किलोग्राम रह गई है। यानी किसान को प्रति किलोग्राम नाइट्रोजन उर्वरक खरीदने के लिए पहले की तुलना में लगभग 37 प्रतिशत अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी।

मौजूदा 270 रुपए प्रति बैग यूरिया की दर से देखें तो किसान को अब प्रति हेक्टेयर 1755 रुपए के बजाय लगभग 2835 रुपए खर्च करने होंगे।

उल्लेखनीय है कि देश में कुल लगभग 16 मिलियन हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है और सालाना 40 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक यूरिया की खपत होती है, यानी औसतन 2.5 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर। वहीं देश की लगभग 65 प्रतिशत वर्षा-आधारित कृषि भूमि पर दलहन, तिलहन और बागवानी जैसी फसलें उगाई जाती हैं, जहां यूरिया की खपत एक टन प्रति हेक्टेयर से भी कम रहती है।

इसके अलावा शेष लगभग 5 मिलियन हेक्टेयर सिंचित कृषि भूमि पर गेहूं-धान जैसी उच्च उत्पादकता वाली फसलें ली जाती हैं। मौजूदा कृषि सिफारिशों के अनुसार इन फसलों के लिए प्रति हेक्टेयर सालाना लगभग 300 किलोग्राम नाइट्रोजन, यानी 46 प्रतिशत नाइट्रोजन वाले करीब 620 किलोग्राम यूरिया की आवश्यकता होती है। इस हिसाब से इन क्षेत्रों के लिए लगभग 32 मिलियन मीट्रिक टन यूरिया उर्वरक की जरूरत पड़ती है।

लेकिन दुर्भाग्य से देश में फैले व्यापक भ्रष्ट तंत्र के कारण सब्सिडी वाले कुल 40 मिलियन मीट्रिक टन यूरिया में से एक-तिहाई, यानी 10 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक यूरिया का अवैध उपयोग उद्योगपतियों की फैक्ट्रियों में हो रहा है।

केंद्रीय बजट 2022-23 में सरकार ने यूरिया उर्वरक सब्सिडी के लिए 1 लाख 32 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया था। इसी सब्सिडी बोझ को कम करने के प्रयास में सरकार यूरिया बैग के वजन और उसमें नाइट्रोजन की मात्रा घटाने जैसे अव्यावहारिक कदम उठा रही है, जिससे किसानों को लगातार परेशान किया जा रहा है।

इसका सीधा खामियाजा किसान और कृषि दोनों को भुगतना पड़ रहा है। किसानों को अधिक कीमत चुकाने के बावजूद घंटों लंबी कतारों में खड़े रहने पर भी यूरिया की पूरी और समय पर आपूर्ति नहीं मिल पा रही है, जिसका फसल उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

निस्संदेह, फसल विज्ञान के सिद्धांतों के अनुसार नाइट्रोजन की कमी से उच्च उत्पादकता वाली अनाज फसलों की पैदावार में 30 से 50 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की जाती है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की सिफारिशों के अनुसार गेहूं, धान या मक्का जैसी उच्च उत्पादकता वाली फसलों की पूरी पैदावार के लिए प्रति हेक्टेयर 120 से 150 किलोग्राम नाइट्रोजन आवश्यक होती है।

पहले किसान को 150 किलोग्राम नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए 50 किलोग्राम वाले यूरिया के लगभग 7 बैग डालने पड़ते थे, जबकि अब वही मात्रा प्राप्त करने के लिए लगभग 10.5 बैग यूरिया की आवश्यकता होगी।

दुर्भाग्य से सरकार नाइट्रोजन उर्वरकों के खिलाफ अव्यावहारिक नीतियां अपनाकर किसानों को लगातार संकट में डाल रही है। इसके दुष्परिणामस्वरूप भविष्य में अनाज उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका है।

सरकार को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पिछले तीन वर्षों में, गेहूं के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध और रिकॉर्ड उत्पादन के दावों के बावजूद सरकारी खरीद लक्ष्य से काफी कम रही है। यह स्पष्ट संकेत देता है कि देश में गेहूं का उत्पादन और खपत लगभग बराबर स्तर पर है।

ऐसी स्थिति में यूरिया को लेकर अपनाई जा रही अव्यावहारिक सरकारी नीति देश की खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकती है।