इलस्ट्रेशन: योगेन्द्र आनंद / सीएसई
कृषि

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के जीई चावल दावों पर उठे सवाल

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने फसल परीक्षण नियमों का उल्लंघन क्यों किया है और जीन-संपादित चावल की किस्मों को बढ़ावा देने के लिए आंकड़ों से संबंधित खतरे की घंटियों को क्यों नजरअंदाज किया

Latha Jishnu

आलोचना के प्रति किसी संस्थान की प्रतिक्रिया उसकी नैतिकता और व्यावसायिकता का एक अच्छा संकेतक है। भारत में हम किसी भी गड़बड़ी के आरोपों को टालने, नकारने और सिरे से खारिज करने के आदी हैं।

राजनीतिक संगठन और सत्ता में बैठे व्यक्ति, भ्रष्टाचार के आरोपों को अक्सर नकारने के लिए इन हथकंडों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन जब कोई शीर्ष स्तरीय वैज्ञानिक संगठन ऐसा करता है तो यह भारतीय विज्ञान की अखंडता पर नकारात्मक प्रभाव तो डालता ही है और संस्थान के सिद्धांतों पर प्रश्नचिह्न भी लगाता है।

हम यहां आईसीएआर (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) द्वारा की गई उस घोषणा के अप्रिय परिणामों पर चर्चा कर रहे हैं जिसमें उसने जीनोम एडिटिंग या जीई के माध्यम से उच्च उपज देने वाली जलवायु प्रतिरोधी और लवणीय जल सहनशील चावल की दो किस्में विकसित की हैं। संस्थान के अपने परीक्षण आंकड़ों के आधार पर इन दावों पर तीखे सवाल उठाए गए हैं।

इनका जवाब देने के बजाय आईसीएआर ऐसी आलोचनाओं को विकास-विरोधी बताकर खारिज करने की अपनी सामान्य प्रतिक्रिया अपना रहा है।

यह एक साधारण खंडन है और यह स्वीकार्य नहीं है। एक सार्वजनिक क्षेत्र के अनुसंधान संगठन के रूप में आईसीएआर को बिंदुवार खंडन प्रस्तुत करना होगा क्योंकि हमारे लाखों चावल किसानों के हित और देश की खाद्य सुरक्षा दांव पर है। जानकारी में बहुत बड़े अंतर पाए गए जो इसकी दो जीई चावल किस्मों, पूसा डीएसटी-1 और डीआरआर धान 100 (कमला) के लिए किए गए दावे को संदिग्ध बनाता है।

पहली आलोचना आईसीएआर के भीतर से आई और यह प्रतिक्रिया तत्काल और नाटकीय थी। संस्था के शासी निकाय और किसानों का प्रतिनिधित्व करने वाली आम सभा के सदस्य वेणुगोपाल बदरावदा को बिना किसी स्पस्ष्टीकरण के निष्कासित कर दिया गया जब उन्होंने कहा था कि दो जीई चावल किस्मों के लिए बताए गए लाभ अच्छी तरह से स्थापित नहीं थे। उन्होंने कहा था, “सूखे, लवणता या गर्मी के तनाव के प्रति लचीलापन केवल कम से कम पांच से सात वर्षों के कठोर अखिल भारतीय परीक्षण के बाद ही प्रमाणित किया जा सकता है। इस प्रक्रिया को न अपनाना वैज्ञानिक रूप से गैरजिम्मेदाराना है।”

आईसीएआर ने उन्हें सरकार और आईसीएआर के विभिन्न अधिकारियों के खिलाफ “तुच्छ, निराधार और भौतिक रूप से अप्रमाणित आरोपों” के लिए अपने निर्णय लेने वाले और शासी निकायों से हटा दिया। हालांकि निष्कासन आदेश में आईसीएआर में पिछले कई महीनों से चल रहे भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की उनकी शिकायतों का जिक्र था, लेकिन बदरावदा को जीई चावल पर उनकी टिप्पणी के एक दिन बाद ही हटा दिया गया। यह साफ था कि उन्होंने एक नाजुक मुद्दा उठाने की गलती की थी।

अगर आईसीएआर को यह लगता था कि उसने एक ऐसे आलोचक को चुप करा दिया है जो संगठन के कामकाज पर अपने विचार सार्वजनिक करने को तैयार रहता था, तो जाहिर है कि वह अखिल भारतीय समन्वित चावल अनुसंधान परियोजना (एआईसीआरपीआर) की वार्षिक रिपोर्टों में शामिल अपने परीक्षण आंकड़ों की गहन जांच के लिए तैयार नहीं था।

इस कड़ी मेहनत का नतीजा जीएम-मुक्त भारत गठबंधन द्वारा जारी एक विस्तृत डोजियर था, जिसमें परीक्षण में गंभीर खामियों, अपर्याप्त आंकड़ों और आईसीएआर द्वारा प्रस्तुत विश्लेषण में वैसी अशुद्धियों को सूचीबद्ध किया गया था ताकि बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली जीई चावल किस्मों के विकास का दावा किया जा सके। डोजियर इतना विस्तृत था कि उसने कई सवाल उठाये और उनका स्पष्ट जवाब भी मांगा। हालांकि ऐसा नहीं हुआ।

इसके बजाय, आईसीएआर ने यह टालमटोल वाला जवाब देना चुना कि ये निराधार आरोप हैं जो “एक ऐसे विकास-विरोधी एजेंडे से प्रेरित हैं जो भारतीय वैज्ञानिकों की उपलब्धियों को कमजोर करता है।” गंभीर आरोपों के उत्तर देने का यह सबसे विश्वसनीय तरीका नहीं था।

क्या देश के शीर्ष कृषि वैज्ञानिकों के बोलने के बाद गठबंधन द्वारा लगाए गए आरोपों को गंभीरता से लेना चाहिए? आखिरकार, यह देश भर के संगठनों और व्यक्तियों का एक अनौपचारिक नेटवर्क ही है जो जीएमओ (आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों) के पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर चिंतित है और अधिक टिकाऊ कृषि विधियों के लिए अभियान चला रहा है। लेकिन याद रखें, जीएम मुक्त भारत गठबंधन जीएम कपास, जीएम बैंगन और जीएम सरसों के खिलाफ हुए संघर्षों का एक अनुभवी और ऊर्जावान समूह है। इसमें अदम्य ऊर्जा है और विज्ञान को बहस के केंद्र में रखने की क्षमता है। भारत और विकसित देशों, दोनों जगह वैज्ञानिकों के साथ मिलकर काम करके इसने आंकड़ों की विसंगतियों और चूकों को पहचानने की गहरी समझ और निराधार दावों को उजागर करने की प्रवृत्ति विकसित की है।

यहां एक स्पष्टीकरण आवश्यक है। जहां जीएम फसलें किसी अन्य जीव के जीन मिश्रित कर बनाई जाती हैं, वहीं जीई फसलें क्रिस्पर (क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिंड्रोमिक रिपीट्स) नामक परिष्कृत तकनीक का उपयोग करके पौधे के अपने गुणों में परिवर्तन करके विकसित की जाती हैं। कुछ वैज्ञानिक बाद वाले को अधिक सुरक्षित या कम जोखिम वाला मानते हैं, हालांकि जीएम विरोधी लॉबी इससे सहमत नहीं है।

30 अक्टूबर को जारी अपने प्रारंभिक विश्लेषण के बाद गठबंधन की सह-संयोजक कविता कुरुगंती ने केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान को एक और पत्र भेजा, जिसमें कमला किस्म को जारी करने की सिफारिश के औचित्य पर सवाल उठाया गया, खासकर तब जबकि आईसीएआर ने अपने ही प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया था।

अपने नवीनतम पत्र में कुरुगंती का कहना है कि प्रत्येक क्षेत्र में परीक्षण स्थलों की संख्या आईसीएआर द्वारा निर्धारित मानदंडों से कम है। उन्होंने यह भी बताया कि आईसीएआर दिशानिर्देशों में परीक्षण के लिए न्यूनतम तीन वर्षों की अवधि निर्धारित की गई है, एक ऐसा नियम जिसकी इसलिए अनदेखी की गई है ताकि दोनों जीई किस्मों को प्रारंभिक किस्म संबंधी विशेषता परीक्षण से गुजरे बिना ही उन्नत परीक्षण में डाल दिया जाए। इससे भी बुरी बात यह है कि गठबंधन के अनुसार, कमला का प्रदर्शन कमजोर है, क्योंकि उनका कहना है कि “चेक प्रजातियां” (ये तुलना के लिए इस्तेमाल की जाने वाली किस्में हैं) कुछ मामलों को छोड़कर लगातार जीई चावल से बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। गठबंधन का निष्कर्ष है कि या तो आंकड़े तैयार नहीं किए गए हैं, या उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया है या इन किस्मों को “रिलीज के लिए सिफारिश” श्रेणी में डालने के लिए उनमें हेरफेर किया गया है।

यह समझ से परे है कि आईसीएआर ने स्वयं को इस तरह के विवादों की जद में आने के लिए क्यों खुला छोड़ दिया है। जिस तकनीक को देश में गहरे अविश्वास की नजर से देखा जाता है, उसे स्वीकार्यता दिलाने के लिए जल्दबाजी में किया गया शोध कोई कारगर तरीका नहीं है।

यह समझना और भी मुश्किल है कि वे ऐसी तकनीक के साथ क्यों खिलवाड़ कर रहे हैं जिसकी उन्हें कोई समझ ही नहीं है। चौहान ने जीई चावल के विकास को एक “असाधारण उपलब्धि” बताया, जबकि उन्हें इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि इसे उधार लिए गए क्रिस्पर कैस9 उपकरण का इस्तेमाल करके विकसित किया गया था। भारत इन चावलों में से किसी भी किस्म को उस कंपनी के साथ महंगे लाइसेंसिंग अनुबंध किए बिना जारी नहीं कर सकता जिसके पास उस खास किस्म का पेटेंट है।

इससे अविचलित मंत्रालय ने अगले छह वर्षों में दालों की 15 जीई किस्में विकसित करके दालों में आत्मनिर्भरता हासिल करने की योजना की रूपरेखा तैयार की है। क्या विदेशी तकनीक का उपयोग करके आत्मनिर्भरता संभव है?