देश के 300 प्राथमिकता वाले कृषि विज्ञान केंद्रों को मार्च 2027 तक आधुनिक बनाने की तैयारी के बीच केंद्र सरकार ने राज्यों से समय पर धन जारी करने और खाली पदों पर भर्ती करने को कहा है। कृषि विज्ञान केंद्रों में कर्मचारियों के राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली में अंशदान और सेवानिवृत्ति लाभों में राज्यों की भूमिका पर भी जोर दिया गया है।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में 7 सितंबर को हुई समीक्षा बैठक में कृषि विज्ञान केंद्रों के बुनियादी ढांचे और रसद व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ उनके लिए नियमित वित्तीय सहायता और पर्याप्त मानव संसाधन सुनिश्चित करने पर चर्चा हुई। सरकार ने बताया कि कुछ राज्यों में धन के प्रवाह की योजना बनाने और धन जारी करने में देरी के मुद्दे भी सामने आए हैं।
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ‘कृषि विज्ञान केंद्रों के प्रबंधन पर उच्च शक्ति समिति’ ने करीब 13 साल पहले भी कृषि विज्ञान केंद्रों में मानव संसाधन और वित्तीय प्रबंधन को मजबूत करने की जरूरत बताई थी।
13 साल पहले भी खाली पदों पर चिंता
आईसीएआर की उच्च शक्ति समिति की रिपोर्ट में कृषि विज्ञान केंद्रों के कर्मचारियों की भर्ती को लेकर स्पष्ट सिफारिशें की गई थीं। समिति ने कहा था कि कृषि विज्ञान केंद्रों के मेजबान संस्थानों को सभी स्वीकृत पदों पर भर्ती सुनिश्चित करनी चाहिए। रिपोर्ट में यहां तक सिफारिश की गई थी कि जब तक संबंधित राज्य सरकार सभी स्वीकृत पदों को भरने के लिए सहमत न हो, तब तक कृषि विज्ञान केंद्र को मंजूरी या वार्षिक अनुदान नहीं दिया जाना चाहिए।
समिति ने कृषि विज्ञान केंद्रों में नियुक्त कर्मचारियों को कम से कम पांच साल तक स्थानांतरित नहीं करने की भी सिफारिश की थी।
कर्मचारियों की पदोन्नति और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभों को लेकर भी समिति ने व्यवस्था मजबूत करने की बात कही थी। रिपोर्ट में उपदान और अंशदायी भविष्य निधि जैसे लाभों की सिफारिश की गई थी।
यानी 2013 में आईसीएआर की समिति जिन संस्थागत समस्याओं की ओर इशारा कर रही थी, उनमें से रिक्त पद और कर्मचारियों से जुड़े वित्तीय लाभ का मुद्दा 2026 की समीक्षा बैठक में फिर सामने आया है।
731 केंद्र, 638 ग्रामीण जिले
आईसीएआर के अनुसार इस समय देश में 731 कृषि विज्ञान केंद्र हैं, जो 638 ग्रामीण जिलों को कवर करते हैं। कृषि विज्ञान केंद्रों को किसानों के प्रशिक्षण, खेतों में नई कृषि तकनीकों के प्रदर्शन और कृषि वैज्ञानिकों तथा किसानों के बीच तकनीकी जानकारी के प्रसार की प्रमुख कड़ी माना जाता है।
सरकार के पुराने प्रभाव आकलन में भी कृषि विज्ञान केंद्रों की पहुंच और उपयोगिता के आंकड़े सामने आए हैं। आईसीएआर द्वारा उपलब्ध कराए गए राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान के मूल्यांकन के अनुसार एक कृषि विज्ञान केंद्र औसतन 43 गांवों और करीब 4,300 किसानों तक पहुंचता था।
इस मूल्यांकन में कृषि विज्ञान केंद्रों से अपनाई गई तकनीकों में 42 प्रतिशत मामलों में उत्पादकता बढ़ने और 33 प्रतिशत मामलों में फसल से होने वाली आय बढ़ने की बात दर्ज की गई थी। करीब 20 प्रतिशत मामलों में खेती से जुड़े श्रम या मेहनत में कमी की भी सूचना थी।
इन आंकड़ों को पूरे देश के किसानों की आय में वृद्धि के रूप में नहीं देखा जा सकता। ये उन तकनीकों से जुड़े परिणाम हैं जिन्हें कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किसानों ने अपनाया था।
प्रदर्शन में भी असमानता
सरकार के एक मूल्यांकन में कृषि विज्ञान केंद्रों को उनके प्रदर्शन के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया था। इसमें 43 प्रतिशत केंद्रों को ‘ए’, 48 प्रतिशत को ‘बी’, 8 प्रतिशत को ‘सी’ और 1 प्रतिशत को ‘डी’ श्रेणी में रखा गया था।
इस सरकारी आकलन में ‘सी’ और ‘डी’ श्रेणी के केंद्रों के संदर्भ में रिक्त कर्मचारी पदों और नए या पूरी तरह विकसित नहीं हुए बुनियादी ढांचे जैसी समस्याओं का उल्लेख किया गया था।
इससे यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि कृषि विज्ञान केंद्रों का विस्तार होने के साथ क्या उनके पास बढ़ती जिम्मेदारियों के अनुरूप पर्याप्त कर्मचारी और संसाधन भी उपलब्ध हैं।
पैसा समय पर पहुंचाना चुनौती
ताजा समीक्षा बैठक में सरकार ने मार्च 2027 तक 300 प्राथमिकता वाले कृषि विज्ञान केंद्रों के बुनियादी ढांचे और रसद व्यवस्था के उन्नयन का लक्ष्य रखा है। महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा और छत्तीसगढ़ से विस्तृत परियोजना रिपोर्ट प्राप्त होने की जानकारी दी गई है। अन्य राज्य तैयारी और कार्यान्वयन के अलग-अलग चरणों में हैं।
लेकिन इसी बैठक में राज्यों से कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थानों और कृषि विज्ञान केंद्रों तक धन का सुचारू और समय पर प्रवाह सुनिश्चित करने को कहा गया है।
यह खास तौर पर मौसमी कृषि कार्यक्रमों के लिए महत्वपूर्ण है। अगर खेतों में प्रदर्शन या नई तकनीक का प्रशिक्षण कृषि मौसम निकल जाने के बाद होता है तो उसका व्यावहारिक लाभ सीमित हो सकता है।
दलहन और तिलहन कार्यक्रम में इसकी बड़ी तस्वीर सामने आती है। वर्ष 2026-27 में 24 राज्यों के 353 कृषि विज्ञान केंद्रों और जिलों के माध्यम से 12,349 हेक्टेयर क्षेत्र में कार्यक्रम चलाने का लक्ष्य है। सरकार के अनुसार 9,750 हेक्टेयर क्षेत्र में काम पूरा हो चुका है। कुछ राज्यों में धन जारी करने में देरी के मुद्दे भी बैठक में उठे।
कृषि उद्यमिता के केंद्र बनाने की योजना
सरकार दिसंबर 2028 तक सभी कृषि विज्ञान केंद्रों में उद्यमिता और कौशल विकास केंद्र स्थापित करने की योजना पर भी काम कर रही है। इन केंद्रों को कृषि आधारित उद्यमों, तकनीकी संस्थानों और जिले की कृषि संभावनाओं से जोड़ने की बात कही गई है।
कृषि विज्ञान केंद्रों को प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना के तहत जिला-विशिष्ट गतिविधियों में भी भूमिका दी जा रही है। इसके लिए राज्यों से पर्याप्त वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने को कहा गया है। इसका मतलब है कि कृषि विज्ञान केंद्रों पर आने वाले वर्षों में किसानों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ कृषि उद्यमिता, कौशल विकास और जिला-विशिष्ट योजनाओं को लागू करने की जिम्मेदारी भी बढ़ने वाली है।
असली चुनौती भवन से ज्यादा व्यवस्था की
सरकार की मौजूदा योजना कृषि विज्ञान केंद्रों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर जोर देती है, लेकिन 2026 की समीक्षा में उठाए गए मुद्दे बताते हैं कि चुनौती सिर्फ भवन, उपकरण और रसद तक सीमित नहीं है। 2013 में आईसीएआर की ‘कृषि विज्ञान केंद्रों के प्रबंधन पर उच्च शक्ति समिति’ ने भी भर्ती, कर्मचारियों की स्थिरता, सेवानिवृत्ति लाभ और वित्तीय प्रबंधन को कृषि विज्ञान केंद्रों के प्रभावी संचालन के लिए महत्वपूर्ण माना था।
तेरह साल बाद केंद्र सरकार को फिर राज्यों से रिक्त पद भरने, कर्मचारियों के सेवानिवृत्ति लाभों में भूमिका निभाने और कृषि विज्ञान केंद्रों तक समय पर धन पहुंचाने का आग्रह करना पड़ रहा है।
इसलिए 300 कृषि विज्ञान केंद्रों के आधुनिकीकरण की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होगा कि कितने भवन या उपकरण उन्नत किए गए। महत्वपूर्ण यह भी होगा कि क्या इन केंद्रों में पर्याप्त कर्मचारी हैं, क्या पैसा कृषि मौसम के अनुरूप समय पर पहुंचता है और क्या राज्यों तथा केंद्र के बीच वित्तीय और प्रशासनिक जिम्मेदारियां स्पष्ट हैं।
कृषि विज्ञान केंद्रों की संख्या और जिम्मेदारियां लगातार बढ़ी हैं। ऐसे में उनके बुनियादी ढांचे के साथ मानव संसाधन और वित्तीय व्यवस्था को मजबूत करना ही यह तय करेगा कि ये केंद्र किसानों तक नई कृषि तकनीक, वैज्ञानिक जानकारी और कौशल कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचा पाते हैं।