नागालैंड के लगभग हर जिले में अनानास की खेती की जाती है और यह अपने खास स्वाद, मिठास, कम फाइबर के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। अनानास की खेती के आर्थिक पहलुओं और इसकी भरपूर आजीविका क्षमता होने के बावजूद इसकी खेती करने वाले किसानों को उत्पादन, मार्केटिंग, कटाई के बाद के प्रबंधन और लंबे समय तक संसाधनों के टिकाऊपन से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
इसी बात को ध्यान में रखते हुए नागालैंड विश्व विद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन किया और बताया कि अनानास की खेती के लिए उपयुक्त खेतों का चयन करना सबसे महत्पूर्ण कारक होता है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने एक नई रणनीति बनाने पर जोर दिया। शोधकर्ताओं ने अनानास उगाने वालों किसानों के बीच टिकाऊ (सतत) तरीकों को अपनाने पर जोर दिया और इसके मुख्य कारकों की पहचान की और साथ ही इसके लिए बेहतर संसाधनों के संरक्षण और विशेष जिलों की पहचान की है।
यह शोध राज्य में जिला स्तर पर अपनाने के तरीके, संसाधनों के उपायों की प्रभावशीलता और नागालैंड की अनानास उगाने की प्रणालियों के अनुकूल व्यावहारिक टिकाऊपन विकसित करने के लिए एक आधार का काम करेगा है।
अध्ययन के प्रमुख परिणामों के बारे में बताते हुए नागालैंड विश्व विद्यालय के स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज के कृषि विस्तार शिक्षा विभाग के प्रो. कौशल कुमार झा ने कहा, ‘‘यह अध्ययन अनानास की खेती में स्थिरता प्रदान करता है जो उत्पादन, अर्थशास्त्र, मार्केटिंग और कटाई के बाद के प्रबंधन पर पारंपरिक फोकस से कहीं आगे जाता है। उत्पादन प्रणाली के कई चरणों में टिकाऊ तौर-तरीकों की जांच करके और जिलों के बीच अंतर का विश्लेषण कर हम इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि किसानों द्वारा तौर-तरीकों को अपनाने का स्तर और चुनौतियां स्थानीय परिस्थितियों से तय होती हैं। यह नागालैंड में टिकाऊ और लचीली अनानास की खेती को बढ़ावा देने के लिए एक समान दृष्टिकोण के बजाय विशेष रूप से तैयार की गई कृषि विस्तार रणनीतियों की आवश्यकता को बताता है।"
इसके अलावा नागालैंड विश्व विद्यालय के स्कूल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज के कृषि अर्थशास्त्र विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शगोलसेम हेरोजित सिंह ने कहा, "हमारे विश्लेषण ने टिकाऊ कृषि के तौर-तरीकों को अपनाने पर असर डालने वाले तीन व्यापक आयामों की पहचान की है और ये हैं, भूमि उपयोग, आय से संबंधित कारक और विस्तार सेवाओं तक पहुंच। वह कहते हैं कि शोध के परिणाम बताते हैं कृषि की स्थिरता जैसे कार्यक्रम तैयार करते समय न केवल तकनीकों की उपलब्धता पर बल्कि किसानों की आर्थिक परिस्थितियों, जागरूकता और संस्थागत मार्गदर्शन तक पहुंच पर भी विचार करना महत्वपूर्ण होता है।"
शोधकर्ताओं ने पाया कि इंटरक्रॉपिंग (दो फसलें एक साथ उगाना), मिक्स्ड क्रॉपिंग (मिली-जुली खेती), जैविक पोषक तत्व प्रबंधन, मिट्टी और जल संरक्षण, उचित प्रबंधन और फसल अवशेष प्रबंधन जैसे अहम तरीकों से मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने, संसाधनों के उपयोग की दक्षता में सुधार करने और अनानास आधारित खेती प्रणालियों की दीर्घकालिक मजबूती को बढ़ाने में योगदान दे सकते हैं। साथ ही शोध में यह भी कहा गया है कि लंबे समय में होने वाले पर्यावरण और आर्थिक असर के बारे में जागरूकता बढ़ाने की भी जरूरत हैं।
इस अध्ययन में चार प्रमुख क्षेत्रों में अनानास उगाने वालों के बीच टिकाऊ कृषि तरीकों को अपनाने का आकलन किया गया है, पहला कृषि संबंधी तरीके, दूसरा संसाधन प्रबंधन, तीसरा कीट और रोग प्रबंधन और चौथा कटाई के बाद का प्रबंधन। इसमें जिलों के बीच इसे अपनाने के तरीकों में अंतर की भी जांच की गई और किसानों के अपनाने के व्यवहार पर असर डालने वाले व्यापक कारकों की पहचान की गई है। इस संबंध में नागालैंड विश्व विद्यालय के वाइस चांसलर जगदीश के. पटनायक ने कहा, ‘‘यह अध्ययन नागालैंड में टिकाऊ अनानास खेती के तरीकों को अपनाने पर असर डालने वाले कारकों के बारे में बहुमूल्य जानकारी देता है। यह अध्ययन ‘‘इंडियन जर्नल ऑफ एक्सटेंशन एजुकेशन’’ में प्रकाशित हुआ है। इस शोध कार्य में नागालैंड विश्व विद्यालय के कृषि विस्तार शिक्षा विभाग की सेंटीबेनला पोंगनेर, प्रो. कौशल कुमार झा और डॉ. शगोलसेम हेरोजित सिंह शामिल थे।