भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की 13 मई 2026 को प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) के माध्यम से जारी विज्ञप्ति के अनुसार, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विपणन सीजन 2026-27 के लिए खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को मंजूरी दी है।
इसके अनुसार, पिछले वर्ष की तुलना में खरीफ 2026-27 सीजन के लिए मुख्य फसल धान के मूल्य में मात्र 3 प्रतिशत की वृद्धि की गई है। इसके अतिरिक्त मूंग के दाम में 0.15 प्रतिशत, मक्का में 0.4 प्रतिशत, मूंगफली में 3.4 प्रतिशत, बाजरा में 4.5 प्रतिशत, तिल में 5 प्रतिशत, उड़द में 5.1 प्रतिशत, नाइजरसीड में 5.4 प्रतिशत, तूर/अरहर में 5.6 प्रतिशत तथा सोयाबीन के दाम में 5.7 प्रतिशत की मामूली वृद्धि को मंजूरी दी गई है।
गौरतलब है कि घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य में की गई यह वृद्धि, सरकार द्वारा इसी अवधि में अपने कर्मचारियों, अधिकारियों और पेंशनरों के महंगाई भत्ते में की गई 6 प्रतिशत वृद्धि से भी कम है, जो सरकार की पक्षपातपूर्ण नीति को दर्शाती है।
उल्लेखनीय है कि उपरोक्त विज्ञप्ति में यह दावा किया गया है कि घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य में सभी भुगतान की गई लागतें शामिल हैं, जैसे कि किराए पर लिए गए मानव श्रम, बैल श्रम/मशीन श्रम, बीज, उर्वरक, खाद जैसे कच्चे माल के उपयोग पर होने वाले खर्च, सिंचाई शुल्क, औजारों और कृषि भवनों पर मूल्यह्रास, कार्यशील पूंजी पर ब्याज, पंपसेट के संचालन के लिए डीजल/बिजली, विविध खर्च तथा पारिवारिक श्रम का अनुमानित मूल्य आदि। साथ ही, पट्टे पर ली गई भूमि के लिए भुगतान किया गया किराया भी शामिल बताया गया है।
जबकि तथ्य यह है कि पट्टे पर ली गई भूमि के लिए भुगतान किया गया किराया सी-2 कुल लागत की गणना में शामिल किया जाता है। सरकार अंतरराष्ट्रीय कृषि विपणन मानकों के विपरीत पिछले छह दशकों से ए-2+एफएल लागत के आधार पर समर्थन मूल्य घोषित कर रही है। परिणामस्वरूप गेहूं-धान की सरकारी खरीद के माध्यम से हरियाणा और पंजाब के किसानों को प्रतिवर्ष 30,000 करोड़ रुपए से अधिक का आर्थिक नुकसान हो रहा है।
सरकार की इस नीति के कारण सी-2 लागत के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित नहीं किया जाता। इसका दुष्प्रभाव यह है कि गेहूं-धान फसल चक्र में विश्व स्तरीय उत्पादकता प्राप्त करने और समर्थन मूल्य पर उपज बेचने के बावजूद हरियाणा और पंजाब के किसानों को औसतन 40,000 रुपए प्रति एकड़ वार्षिक का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसी कारण किसान कर्ज के जाल में फंसकर आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं।
पश्चिम एशियाई संकट और अल नीनो के संभावित प्रभावों के कारण खुदरा कीमतों में जनवरी 2025 के बाद सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई है। सूचकांक में 4.06 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिससे मई 2026 में महंगाई दर 16 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। पेट्रोल और डीजल की मुद्रास्फीति मई 2026 में बढ़कर 6 प्रतिशत हो गई, जबकि अप्रैल 2026 में यह 2.8 प्रतिशत और मार्च 2026 में मात्र 0.5 प्रतिशत थी। इससे ईंधन लागत के बढ़ते प्रभाव का स्पष्ट संकेत मिलता है।
इसके अतिरिक्त, अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण लागत हस्तांतरण का असर जून 2026 में खुदरा कीमतों पर दिखाई देगा। वार्षिक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति 5 से 5.5 प्रतिशत के बीच रहने की संभावना है। पश्चिम एशिया से लागत हस्तांतरण के अलावा, विश्लेषक अल नीनो के कारण सामान्य से कम मानसून की आशंका पर भी नजर बनाए हुए हैं।
इन सभी कारणों के चलते विभिन्न खरीफ फसलों की कृषि लागत में 10 से 20 प्रतिशत तक अप्रत्याशित वृद्धि होने की संभावना है। ऐसे में किसानों पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करने तथा पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों और महंगाई दर में संभावित वृद्धि के कारण अप्रासंगिक हो चुके घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य को वास्तव में लाभकारी बनाने के लिए सरकार को घोषित एमएसपी में कम से कम 10 प्रतिशत अतिरिक्त वृद्धि की घोषणा करनी चाहिए।
लेखक डा. वीरेन्द्र सिह लाठर भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के सेवानिवृत प्रधान वैज्ञानिक हैं। लेख में व्यक्त उनके निजी विचार हैं