कृषि

“जोखिम भरा है बीहड़ों का समतलीकरण”

चंबल के बीहड़ों पर तीन दशक से अधिक समय से शोध कर रहीं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर पद्मिनी पाणी ने डाउन टू अर्थ से बात की। पेश हैं बातचीत के अंश

Bhagirath

बीहड़ों को बड़े पैमाने पर समतल कर खेती योग्य बनाया जा रहा है। यह चलन कब शुरू हुआ और किस हद तक बढ़ चुका है?

चंबल के बीहड़ों को समतल कर खेती करने के प्रयास नए नहीं हैं। किसी भी घनी आबादी वाले और कृषि-निर्भर क्षेत्र या देश में ऐसी कोशिशें आम हैं। स्थानीय स्तर पर ऐसे प्रयास 19वीं शताब्दी की शुरुआत से मिलते हैं। ऐतिहासिक अभिलेखों और हमारे अध्ययन बताते हैं कि लोग समय-समय पर छोटे या उथले गली-नालों को भरकर तथा उनके टीले हटाकर खेती लायक बनाने की कोशिश करते रहे। कुछ छोटे क्षेत्र समतल कर खेती भी की गई, लेकिन कई शुरुआती प्रयास असफल रहे, क्योंकि हर वर्ष विशेषकर मॉनसून के दौरान उनकी देखभाल में अत्यधिक श्रम लगता था। हालांकि 1970 के दशक के शुरुआती वर्षों से इस परियोजना ने बड़े क्षेत्रों में विकास का लक्ष्य रखा और इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया। लेकिन 2010 के बाद से इस प्रक्रिया की गति तेजी से बढ़ी है, जो पारिस्थितिकी के दृष्टिकोण से चिंता का विषय है।

बीहड़ों में होने वाली खेती को आप कैसे देखती हैं? इसके क्या लाभ और नुकसान हैं?

पहली नजर में यह लग सकता है कि इससे अधिक भूमि खेती में आ जाती है, ऐसी भूमि जो “वेस्टलैंड” मानी जाती थी उसे उत्पादक कृषि भूमि में बदला जा सकता है, जिससे फसल उत्पादन का क्षेत्र बढ़ता है। ऐसे कदम आजीविका में सुधार लाते हैं, भूमि-विहीन या सीमांत किसानों को खेती योग्य भूमि उपलब्ध कराते हैं और उनकी आय तथा खाद्य सुरक्षा बढ़ा सकते हैं। हालांकि, यदि मिट्टी एवं जल संरक्षण उपायों को साथ में अपनाया जाए तो बीहड़ों में खेती अल्पावधि में आजीविका और भूमि-उपयोग के कुछ लाभ दे सकती है, लेकिन केवल खेती का क्षेत्र बढ़ाने के उद्देश्य से बगैर पारिस्थितिक सुरक्षा के ऐसा करना जोखिमभरा और प्रायः अस्थिर साबित होता है।

बीहड़ों को “वेस्टलैंड” की श्रेणी में रखा गया है। क्या आप भी बीहड़ों को वेस्टलैंड मानती हैं? यदि नहीं, तो क्यों?

नहीं, बिल्कुल नहीं। बीहड़ कम से कम पूरी तरह वेस्टलैंड नहीं हैं। यद्यपि भूमि उपयोग सर्वेक्षणों में बीहड़ों को प्रायः वेस्टलैंड माना गया है क्योंकि वे खेती के लिए कठिन और अत्यधिक मृदा अपरदन वाले क्षेत्र हैं, लेकिन पारिस्थितिक और जलविज्ञान के दृष्टिकोण से वे किसी भी प्रकार “बेकार” भूमि नहीं हैं। बीहड़ क्षतिग्रस्त अवश्य हैं, परंतु वे जीवित पारिस्थितिकी तंत्र हैं इसलिए इन्हें असली वेस्टलैंड मानना उचित नहीं है। पूरी तरह समतलीकरण की बजाय इन्हें प्रबंधन, पुनर्स्थापना तथा सतत उपयोग के माध्यम से विकसित किया जाना चाहिए। इसमें कृषि-वनीकरण, सिल्वोपाश्चर, मिट्टी संरक्षण और पारिस्थितिक पुनरुद्धार जैसे उपाय कारगर हैं ताकि उनकी पारिस्थितिक भूमिका भी बनी रहे और स्थानीय आजीविका भी।

शुष्क और अर्ध–शुष्क क्षेत्रों में प्रोसोपिस सिनेरेरिया (खेजड़ी) का पारंपरिक उपयोग इसका प्रमुख उदाहरण है। बीहड़ या बैडलैंड्स एक अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र हैं, विशिष्ट जैवविविधता को सहारा देते हैं और कार्बन भंडारण के रूप में भी महत्वपूर्ण हैं। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि कई समुदाय बीहड़ों का उपयोग चराई, ईंधन लकड़ी, लघु वन उत्पादों और औषधीय पौधों के लिए करते हैं अर्थात यह भूमि “अप्रयुक्त” नहीं है। बीहड़ों के समतलीकरण का सबसे बड़ा पारिस्थितिक जोखिम भी यही है। अल्पावधि में कृषि भूमि बढ़ सकती है, लेकिन दीर्घावधि में इससे मिट्टी का ह्रास, जैवविविधता की क्षति, अपरदन और नदी तंत्र में गाद जमाव की गंभीर समस्याएं बढ़ती हैं।

विश्व के 80 प्रतिशत घड़ियाल चंबल में पाए जाते हैं और नदी पारिस्थितिकी में बदलाव उन्हें प्रभावित कर रहे हैं। वे कैसे प्रभावित हो रहे हैं या भविष्य में कैसे हो सकते हैं? क्या आपने घड़ियालों के घोंसले बनाने पर मिट्टी कटाव या अनियंत्रित खेती का प्रभाव देखा है?

नदी के किनारों और भीतर स्थित रेतीले टापू तथा बालुई तट घड़ियालों के अंडे देने और धूप सेंकने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। ऐसे स्थान मिट्टी कटाव, नदी किनारे खेती और अवैध रेत खनन के कारण तेजी से नष्ट हो रहे हैं या बदल रहे हैं।