यह पुलवामा के बोनेरा स्थित काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिव मेडिसिन (सीएसआईआर-आईआईआईएम) का फील्ड स्टेशन है। यहां बैंगनी फूलों से लदे लैवेंडर के खेत हैं, जहां मजदूर कंधों तक ऊंचे पौधों की कटाई कर रहे हैं।
कुछ ही घंटों बाद इन फूलों को पास की डिस्टिलेशन (फूल से तेल निकालने वाली मशीन) यूनिट में ले जाया जाएगा, जहां भाप की मदद से इनसे एसेंशियल ऑयल निकाला जाएगा। इस तेल का इस्तेमाल परफ्यूम, कॉस्मेटिक्स और दवाओं में किया जाता है।
बोनेरा फील्ड स्टेशन के प्रभारी वैज्ञानिक शाहिद रसूल ने बताया, "यह एक तरह से जीवित प्रयोगशाला है।"
उन्होंने कहा कि यहां मौजूद रिसर्च प्लॉट ऐसे स्थान हैं, जहां खेती की नई तकनीकों का परीक्षण किया जाता है और बाद में उन्हें पूरे जम्मू-कश्मीर के किसानों तक पहुंचाया जाता है।
सीएसआईआर-आईआईआईएम के निदेशक जबीर अहमद ने डाउन टू अर्थ से कहा कि संस्थान का उद्देश्य कभी भी लैवेंडर को केवल रिसर्च फार्म तक सीमित रखना नहीं था। उनका कहना है कि असली मकसद विज्ञान को किसानों के खेतों तक पहुंचाना था।
उनके मुताबिक, पर्पल रिवोल्यूशन (लैवेंडर क्रांति) इस बात का उदाहरण है कि वैज्ञानिक तरीके किस तरह किसानों को जलवायु परिवर्तन के अनुरूप ढलने में मदद कर सकते हैं और साथ ही आजीविका के नए अवसर भी पैदा कर सकते हैं।
साल 1970 में वैज्ञानिक अख्तर हुसैन बुल्गारिया से लैवेंडर लेकर आए थे। शुरुआत में इसकी खेती केवल पुलवामा के बोनेरा और गांदरबल के मानसबल स्थित रिसर्च प्लॉट्स तक सीमित थी।
उस समय वैज्ञानिकों को यह भरोसा नहीं था कि भूमध्यसागरीय (मेडिटेरेनियन) क्षेत्र की यह सुगंधित जड़ी-बूटी (हर्ब) कश्मीर की हल्की जलवायु और सूखे जाड़े में टिक भी पाएगी, लेकिन पांच दशक से अधिक समय बाद यही प्रयोग जम्मू-कश्मीर में खेती के विविधीकरण का एक सफल उदाहरण बन चुका है।
सीएसआईआर-आईआईआईएम के अनुसार, अब पूरे प्रदेश में 1,200 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में लैवेंडर की खेती हो रही है। इसके साथ ही प्रोसेसिंग नेटवर्क भी बढ़ रहा है। जिसमें डोडा जिले का भद्रवाह इसका प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है, जो अब भारत की "लैवेंडर राजधानी" भी कहा जाता है।
जलवायु में बदलाव के साथ-साथ लैवेंडर की खेती का दायरा भी बढ़ा है। पहले किसान मुख्य रूप से मक्का और धान जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर थे। लेकिन सूखी सर्दियों, कम बर्फबारी और बारिश पर अत्यधिक निर्भर खेती के कारण लैवेंडर एक बेहतर विकल्प बनकर सामने आया है।
इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि जम्मू-कश्मीर की लगभग 60 प्रतिशत कृषि भूमि अब भी वर्षा आधारित है। वैज्ञानिकों के अध्ययन भी पूरे कश्मीर में तापमान बढ़ने की पुष्टि करते हैं।
शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी की एक स्टडी में पाया गया कि 1980 से 2016 के बीच औसत वार्षिक तापमान में 0.8 डिग्री सेल्सियस की बढ़ौतरी हुई। वहीं 2022 में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन के अनुसार, 1980 से 2020 के बीच तापमान में लगभग 2 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
इस वर्ष गांदरबल में आयोजित लैवेंडर फेस्टिवल में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी कहा कि अब बारिश का पैटर्न काफी अनियमित हो गया है। कभी बहुत अधिक बारिश होती है तो कभी बिल्कुल नहीं। ऐसे में बारिश आधारित खेती पहले की तुलना में अधिक जोखिम भरी होती जा रही है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु की बदलती परिस्थितियों में लैवेंडर कई पारंपरिक फसलों की तुलना में अधिक उपयुक्त साबित हो रहा है। यह बहुवर्षीय झाड़ी ढलान वाली भूमि पर भी अच्छी तरह उग जाती है, इसकी खेती के दौरान केवल एक या दो बार सिंचाई की आवश्यकता होती है, यह स्वाभाविक रूप से कई कीटों के प्रति प्रतिरोधी है और एक बार रोपने के बाद लगभग दो दशकों तक लगातार फूल देती रह सकती है।
किसानों और वैज्ञानिकों ने अब लैवेंडर की खेती के साथ मधुमक्खी पालन को भी जोड़ना शुरू कर दिया है। लगभग 200 किसानों ने इस मॉडल को अपनाया है और अपने लैवेंडर के खेतों के पास मधुमक्खियों के छत्ते लगाए हैं।
रसूल ने कहा, "लैवेंडर के फूल ऐसे समय में भरपूर परागरस (नेक्टर) उपलब्ध कराते हैं, जब अन्य फूलों के स्रोत बहुत कम होते हैं। इससे किसान प्रीमियम गुणवत्ता वाले लैवेंडर शहद से अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं, वहीं नियंत्रित परागण (मैनेज्ड पॉलिनेशन) के कारण आसपास के फलों के बागों में फल बनने की दर भी बढ़ रही है।"
इस मॉडल से किसानों को लैवेंडर के आवश्यक (एसेंशियल) तेल और शहद—दोनों से आय होती है, साथ ही आसपास के बागानों में परागण को भी बढ़ावा मिलता है।
अहमद ने कहा कि इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें खेती को मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) के साथ जोड़ा गया है।
उन्होंने कहा, "अरोमा मिशन के माध्यम से हमने उच्च गुणवत्ता वाली रोपण सामग्री, खेतों में प्रदर्शन (फील्ड डेमोंस्ट्रेशन), वैज्ञानिक प्रशिक्षण और प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) तकनीकों को एक साथ जोड़ा है, ताकि किसान अपनी उपज से अधिक मूल्य प्राप्त कर सकें।"
हाल के वर्षों में कश्मीर में लैवेंडर की खेती तेजी से बढ़ी है। कृषि विभाग के पुष्प विशेषज्ञ (फ्लोरीकल्चरिस्ट) अब्दुल हमीद शाह के अनुसार, वर्ष 2023-24 में विभाग ने किसानों को 1.5 लाख लैवेंडर के पौधे वितरित किए थे। अगले वर्ष यह संख्या बढ़कर 2.75 लाख हो गई और 2025-26 में किसानों को चार लाख पौधे उपलब्ध कराए गए।
शाह ने कहा, "जब लोग कश्मीर के बारे में सोचते हैं, तो सबसे पहले उनके मन में सेब का नाम आता है। हम प्रयास कर रहे हैं कि आने वाले वर्षों में लैवेंडर भी इस क्षेत्र की पहचान बन जाए।"
सीएसआईआर-भारतीय समेकित औषधि संस्थान (सीएसआईआर-आईआईआईएम) के अनुसार, 'पर्पल रिवोल्यूशन' कई चरणों में आगे बढ़ा है। शुरुआती चरण में वैज्ञानिकों ने किसानों को पर्याप्त रोपण सामग्री उपलब्ध कराने पर ध्यान केंद्रित किया। नर्सरी कार्यक्रमों के माध्यम से लगभग 50 लाख जड़युक्त लैवेंडर कलमें (रूटेड कटिंग्स) तैयार की गईं।
इसके बाद लैवेंडर की खेती का विस्तार होकर लगभग 910 हेक्टेयर क्षेत्र तक पहुंच गया, जिसमें 2,500 से अधिक किसान शामिल हुए। इस दौरान 3,000 किलोग्राम से अधिक आवश्यक (एसेंशियल) तेल का उत्पादन हुआ और किसानों की कुल आय लगभग 8.09 करोड़ रुपए तक पहुंच गई।
अगले चरण में 552 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि को लैवेंडर की खेती के दायरे में लाया गया और 1,500 से अधिक नए किसान इस कार्यक्रम से जुड़े। इस अवधि में लैवेंडर से होने वाली आय 10 करोड़ रुपये से अधिक हो गई। यह दर्शाता है कि यह पहल केवल खेती तक सीमित नहीं रही, बल्कि प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग), नर्सरी विकास और मूल्य संवर्धित (वैल्यू-ऐडेड) उत्पादों पर आधारित एक व्यापक ग्रामीण अर्थव्यवस्था का रूप ले चुकी है।
विस्तार को समर्थन देने के लिए सीएसआईआर-भारतीय समेकित औषधि संस्थान ने लैवेंडर उत्पादन वाले क्षेत्रों में 55 आसवन (डिस्टिलेशन) इकाइयां स्थापित कीं और 120 से अधिक प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए। प्रसंस्करण की विकेंद्रीकृत व्यवस्था के कारण किसान अपने खेतों के पास ही फूलों से तेल निकाल सकते हैं, जिससे कटाई के बाद होने वाले नुकसान में कमी आई और उन्हें बेहतर कीमत मिलने लगी।
अहमद ने कहा, "हमारा उद्देश्य केवल किसानों को लैवेंडर उगाने के लिए प्रेरित करना नहीं था, बल्कि उन्हें इसकी पूरी मूल्य श्रृंखला (वैल्यू चेन) का हिस्सा बनाना था।"
सीएसआईआर-आईआईआईएम के आकलन के अनुसार, जो किसान पहले मक्का जैसी पारंपरिक फसलों से प्रति हेक्टेयर 40,000 से 60,000 रुपये तक कमाते थे, वे लैवेंडर की खेती अपनाने और प्रसंस्करण तथा नर्सरी विकास से जुड़ने के बाद प्रति हेक्टेयर 3.5 लाख से 5 लाख रुपये तक की आय अर्जित कर सकते हैं।
उद्योग के अनुमान के अनुसार, भारत में हर वर्ष 30,000 से 40,000 किलोग्राम लैवेंडर तेल की मांग है। यह मांग मुख्य रूप से सौंदर्य प्रसाधन, दवा, सुगंध (फ्रेगरेंस) और वेलनेस उद्योगों से आती है।
लैवेंडर की खेती ने जम्मू-कश्मीर के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के लिए भी नए अवसर पैदा किए हैं। नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पास स्थित उरी में जम्मू-कश्मीर ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) की महिलाएं अब लैवेंडर से साबुन, मोमबत्तियां, रूम फ्रेशनर और आवश्यक (एसेंशियल) तेल जैसे उत्पाद तैयार कर रही हैं। इन उत्पादों की पैकेजिंग स्थानीय स्तर पर की जाती है और इन्हें प्रदर्शनियों तथा ऑनलाइन मंचों के माध्यम से बेचा जाता है।
अहमद ने कहा कि 'पर्पल रिवोल्यूशन' अब उद्यमिता का एक मंच बन चुका है। युवा आवश्यक तेल, वेलनेस उत्पाद, सौंदर्य प्रसाधन और ग्रामीण पर्यटन से जुड़े स्टार्ट-अप स्थापित कर रहे हैं।
डोडा जिले के भद्रवाह में इस बदलाव का सबसे स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। वर्ष 2009 में व्यवहार्यता अध्ययन (फीजिबिलिटी स्टडी) के बाद सीएसआईआर-भारतीय समेकित औषधि संस्थान के वैज्ञानिकों ने पाया कि यहां की ठंडी जलवायु, वर्षा पर निर्भर ढलान वाली भूमि और अनुपयोगी जमीन लैवेंडर की खेती के लिए उपयुक्त है।
लैवेंडर अपनाने वाले शुरुआती किसानों में तौकीर अहमद बागबान भी शामिल थे, जिन्हें आज पूरे क्षेत्र में "लैवेंडर मैन" के नाम से जाना जाता है। उन्होंने बताया कि अनियमित वर्षा, सिंचाई के घटते स्रोतों और जंगली बंदरों द्वारा फसलों को नुकसान पहुंचाने के कारण मक्के की खेती पहले जैसी लाभदायक नहीं रह गई थी।
बागबान ने कहा, "हमें समझ में आ गया कि केवल एक ही उत्पाद पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। यदि बाजार में तेल की मांग होती है तो हम आवश्यक तेल निकालते हैं और यदि सूखे फूलों की मांग होती है तो हम सूखे फूल बेचते हैं।"
ताजा लैवेंडर के फूलों से आसवन (डिस्टिलेशन) के जरिए आवश्यक तेल निकाला जाता है, जबकि सूखे फूलों का उपयोग गुलदस्ते, अगरबत्ती, मोमबत्तियां, साबुन, रूम फ्रेशनर और सजावटी उत्पाद बनाने में किया जाता है।
लैवेंडर की खेती ने मौसमी पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा दिया है। हर वर्ष गर्मियों में भद्रवाह के खिले हुए लैवेंडर के खेत बड़ी संख्या में पर्यटकों, फोटोग्राफरों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करते हैं। इससे होटल, होमस्टे, रेस्तरां, परिवहन सेवाओं और स्थानीय हस्तशिल्प से जुड़े लोगों की आय में भी वृद्धि हो रही है।
इसी तरह का मॉडल अब कश्मीर में भी विकसित हो रहा है। गांदरबल जिले के नुनर स्थित मॉडल फ्लोरीकल्चर सेंटर के लैवेंडर के खेत सोनमर्ग जाने वाले पर्यटकों और अमरनाथ गुफा के दर्शन के लिए जाने वाले श्रद्धालुओं के बीच एक लोकप्रिय पड़ाव बन गए हैं।
अधिकारियों का मानना है कि ऐसे मौसमी आकर्षणों को आगे चलकर सुगंधित फसलों पर आधारित व्यापक ग्रामीण पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित किया जा सकता है। इससे जलवायु-अनुकूल खेती को स्थानीय उद्यमिता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने में मदद मिलेगी।