एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2032 तक जैविक कपास का वैश्विक बाजार 25,890 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच जाएगा, जिसमें वस्त्र उद्योग की भूमिका सबसे अहम होगी। भारत दुनिया में जैविक कपास का सबसे बड़ा उत्पादक है और इसके कुल वैश्विक उत्पादन का एक-तिहाई हिस्सा यहां पैदा होता है। लेकिन बढ़ती मांग के बावजूद भारत के कुल कपास उत्पादन का केवल एक छोटा हिस्सा ही प्रमाणित रूप से जैविक है। लक्षित नीतियों और जैविक कपास की खेती से मिलने वाले व्यापक लाभों के बावजूद, भारत में किसानों के लिए जैविक खेती को पूरी तरह अपनाना आज भी एक चुनौती बना हुआ है।
वर्ष 2016 से 2022 के बीच कैटलिस्ट मैनेजमेंट सर्विसेज ने एक जैविक कपास प्रशिक्षण और प्रमाणन सहायता कार्यक्रम का प्रभाव मूल्यांकन (इम्पैक्ट इवैल्यूएशन) किया, ताकि यह समझा जा सके कि क्या कपास किसानों के लिए जैविक उत्पादन की ओर बढ़ना व्यापार की दृष्टि से उचित है। हमने भारत के चार कपास उत्पादक राज्यों—गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र—के किसानों से बातचीत की। बातचीत के दौरान हमने पाया कि कुछ किसान पूरी तरह जैविक पद्धतियों का पालन करने की जगह केवल प्रमाणन मानदंडों की औपचारिकता निभा रहे थे।
इसी के साथ-साथ, किसानों ने जैविक खेती के सकारात्मक प्रभावों का भी वर्णन किया। उदाहरण के लिए, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार, रासायनिक उत्पादन सामग्री न इस्तेमाल होने से उसी जमीन पर खाद्य फसलों की खेती की संभावना, और बीमारियों के मामलों में गिरावट। लगभग सभी किसानों को जैविक बीज, उर्वरक और कीटनाशक प्रशिक्षण कार्यक्रम के जमीनी क्रियान्वयन साझेदारों द्वारा उपलब्ध कराए गए थे। इससे गैर-जैविक खेती की तुलना में शुरुआती लागत कम हुई।
लेकिन इन स्पष्ट लाभों के बावजूद, कपास की जैविक खेती को अपनाने के प्रति किसानों की हिचकिचाहट इसकी व्यवहार्यता और उनकी विशिष्ट चुनौतियों से जुड़े कई सवाल खड़े करती है।
हमारे फील्डवर्क के दौरान अधिकांश किसानों ने हमें बताया कि वे गैर-जैविक उत्पादन सामग्री का भी उपयोग करते हैं। कभी जैविक उत्पादन सामग्री की अपर्याप्त आपूर्ति के कारण और कभी उनकी प्रभावशीलता को लेकर अनिश्चितता के कारण, उन्होंने कीटों से फसलों को बचाने के लिए जैविक खेती के तौर-तरीकों में कुछ बदलाव भी किए हैं।
गौरतलब है कि जैविक खेती से जुड़े अधिकांश जोखिम असंगत रूप से किसानों को ही उठाने पड़ते हैं।
किसी खेत को जैविक प्रमाणन प्राप्त करने के लिए किसानों को जैविक किस्म (जो मिश्रित या बीटी न हो) के कपास बीज, और रासायनिक की जगह जैविक खाद व कीटनाशकों का उपयोग करना होता है। वर्तमान में, जैविक बीज और उत्पादन सामग्री जमीनी क्रियान्वयन संगठनों द्वारा तकनीकी और वित्तीय सहायता के तहत प्रदान किए जाते हैं।
एक प्रमाणन एजेंसी (सरकारी या निजी) आमतौर पर बुवाई के समय और फसल बढ़ने के दौरान खेत का दौरा कर मिट्टी और पौधों के नमूने लेती है। इन नमूनों को गैर-जैविक बीज या रासायनिक उत्पादन सामग्री के उपयोग के लिए जांचा जाता है। यह पूरी प्रक्रिया तीन वर्षों में पूरी होती है।
गैर-जैविक से जैविक खेती के सफर के शुरुआती चरण में उत्पादकता कम रहती है, क्योंकि उस समय मिट्टी विषाक्त तत्वों से मुक्त होकर जैविक जीवन को पुनः विकसित कर रही होती है। यह जैविक खेती की एक सामान्य समस्या है। दूसरे और तीसरे वर्ष में उत्पादकता धीरे-धीरे बढ़ती है और चौथे वर्ष में (जब मिट्टी की सेहत बेहतर हो जाती है) यह अपने वास्तविक स्तर पर पहुंचती है। इसी वजह से, भले ही यह जमीन और किसान दोनों के लिए लंबे समय में लाभकारी हो, लेकिन शुरुआती उत्पादकता में गिरावट छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका के लिए एक गंभीर चुनौती बन जाती है।
इसके अलावा, छोटे और सीमांत किसानों को प्रमाणन प्रक्रिया लंबी और चुनौतीपूर्ण लग सकती है। व्यक्तिगत रूप से प्रमाणन कराना महंगा है और घरेलू बाजारों में यह केवल पी.जी.एस-इंडिया प्रमाणन के तहत अंतरिम अवधि के लिए ही संभव है। इस प्रकार से, किसान उत्पादक संगठन (एफ.पी.ओ), सहकारी समितियां या स्वयं सहायता समूह (एस.एच.जी) संघ समूह प्रमाणन के लिए आवेदन करते हैं। योग्यता सुनिश्चित करने के लिए किसान समूहों के भीतर एक आंतरिक नियंत्रण प्रणाली (आई.सी.एस) बनाई जाती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि विविध नियामक ढांचो के तहत बनाए गए जैविक उत्पादन के मानकों का पालन हो। आई.सी.एस में व्यक्तिगत किसान छोटे और सीमांत किसानों की श्रेणी में आते हैं, और अमूमन इनके पास 4 हेक्टेयर से कम जमीन होती है।
किसान समूहों में यह लागत आई.सी.एस द्वारा वहन की जाती है। कुछ परिस्थितियों में परिधान कंपनियां सीधे या अपनी अनुबंधित एजेंसी के माध्यम से इसे अनुदान के रूप में वहन करती हैं। यह लागत हर आई.सी.एस के तहत जमीन के विस्तार और सदस्यों की संख्या के कारण अलग-अलग हो सकती है। आमतौर पर यह लागत 1,000 हेक्टेयर के लिए प्रति वर्ष लगभग 1 लाख रुपये होती है।
वर्तमान में, किसानों के लिए प्रमाणन की लागत कोई अन्य व्यक्ति या समूह ही वहन करता है। उच्च लागत और जटिल प्रक्रियाओं के कारण जैविक खेती करने वाले सक्रिय छोटे या मध्यम स्तर के किसान स्वयं प्रमाणन प्राप्त नहीं कर सकते। जैविक उत्पादन की सरकारी योजनाएं एफ.पी.ओ को समर्थन तो देती हैं, लेकिन हमारे शोध की परिधि में आने वाले राज्यों में वे काफी हद तक निष्क्रिय पायी गयी। जिन जगहों पर संस्थाओं ने किसानों को जुटाने का प्रयास किया, वहां भी एफ.पी.ओ की सदस्यता और जिम्मेदारी के बारे में जानकारी के अभाव के कारण वे इसका लाभ नहीं उठा पाते।
इन चारों राज्यों के किसानों ने बताया कि जैविक बीज, मिश्रित बीजों की तुलना में कम उत्पादक और कीटों के प्रति कम प्रतिरोधी हैं। महाराष्ट्र में जैविक खेती करने वाले एक किसान ने कहा, “चाहे हम कितनी भी जैविक खाद डालें, हमें रसायन फिर भी डालने पड़ते हैं। रसायनों से कीड़े आसानी से मर जाते हैं। अगर हम निंबोली (नीम के पेड़ का फल) का इस्तेमाल करते हैं, तो वह उतनी प्रभावी नहीं होती और इससे कीड़े नहीं मरते।”
एक अन्य किसान ने बताया, “कभी-कभी ज्यादा खरपतवार और कीड़ों के कारण हम जैविक कपास की खेती में गैर-जैविक कीटनाशक का छिड़काव करते हैं।” किसानों ने यह भी बताया कि अगर पड़ोस के खेतों में रासायनिक कीटनाशक का उपयोग होता है, तो कीट जैविक खेतों की ओर आ जाते हैं। किसानों के पास अक्सर जैविक खाद की कमी होती है, सिवाय उन किसानों के जिनके पास पशु होते हैं और वे उनके गोबर का उपयोग इसके लिए कर सकते हैं।
जैविक बीजों की अपर्याप्त उपलब्धता भी एक बड़ी बाधा है। किसानों ने यह भी बताया कि जैविक बीज बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल नहीं हैं।
भारत के कृषि क्षेत्र में लंबे समय से कठिन श्रम का अधिकांश बोझ महिलाओं ने ही उठाया है। कपास की खेती में निराई, कपास के फूल तोड़ना और बीज से रेशा अलग करने जैसे काम भी इस श्रेणी में शामिल हैं। यह काम जैविक खेती में और अधिक कठिन हो जाता है। उदाहरण के लिए, पारंपरिक खेती में निराई एक बार होती है, जबकि जैविक खेती में किसानों को यह प्रक्रिया तीन से चार बार पूरी करनी पड़ती है। इसी स्तर का गहन श्रम कपास के फूल तोड़ने में भी लगता है, क्योंकि जैविक खेती में फूल ज्यादा तेजी से पनपते हैं। इससे घर और खेत पर काम की दोहरी मार झेल रही महिलाओं पर दबाव और बढ़ जाता है।
कटाई के बाद कपास को ओटाई मिलों में भेजा जाता है जहां इसे विक्रय के लिए तैयार किया जाता है। हमारे अध्ययन में यह पाया गया कि जैविक कपास के लिए अलग से भंडारण और ओटाई की सुविधाएं लगभग न के बराबर थी। नतीजतन, किसान जब जैविक कपास को इन मिलों में ले जाते हैं, तो उन्हें गैर-जैविक कपास के साथ मिला दिया जाता है। अंततः यह मिश्रित उत्पाद बाजार में नियमित या गैर-जैविक दामों पर ही बिकता है, जिसके कारण किसान को जैविक उत्पाद के लिए निर्धारित बेहतर दाम नहीं मिल पाते।
जैविक कपास को उचित मूल्य पर बेचने की जिम्मेदारी किसानों की ही होती है। परिधान कंपनियां आमतौर पर अपनी जरूरतों के अनुसार जमीन के एक हिस्से को अपनाकर या एक निश्चित संख्या के किसानों से कपास सीधे खरीदती हैं। लेकिन ये व्यवस्था केवल मौजूदा वर्ष के लिए होती है। इसलिए जैविक कपास की मूल्य शृंखला बुनियादी स्तर पर खरीददार की जरूरत पर टिकी है। अगर कोई खरीददार रुचि रखता है और मूल्य ऋंखला स्थापित करता है, तो वह सिर्फ तब तक ही चलती है जब तक तय लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता। इस व्यवस्था के बाहर यह मूल्य शृंखला कमजोर और लगभग नदारद है। एक किसान ने बताया, “हमें किसी भी तरह बेहतर कीमत नहीं मिल पाती।”
इन चुनौतियों को पृष्ठभूमि में रखते हुए अलग-अलग ब्रांड के परिधानों की तुलना करने पर पाया गया कि जैविक कपास से बने परिधान गैर-जैविक परिधानों की तुलना में कम से कम 10 प्रतिशत महंगे बिकते हैं। मौजूदा समय में सततता (सस्टेनिबिलिटी) पर बढ़ते जोर को देखते हुए परिधान कंपनियां तेजी से जैविक कपड़ों की ओर रूख कर रही हैं।
किसानों के लिए जैविक खेती का मतलब मिट्टी की सेहत व उर्वरता में सुधार, और हानिकारक कीटनाशक और रासायनिक खाद से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों में कमी है। जिन किसानों से हमने बात की, वे एक ही वर्ष में उसी खेत में मिर्ची, जीरा और सोयाबीन का उत्पादन कर रहे थे, और उनकी सिंचाई का खर्चा भी कम हो गया था।
तो फिर समस्या कहां है? किसानों के लिए प्रमाणन की लागत, जैविक इनपुट की अपर्याप्त और कई बार अप्रभावी उपलब्धता, तथा शुरुआती वर्षों में घटती उत्पादकता-इनकी भरपाई उन्हें अंत में मिलने वाले दामों से नहीं हो पाती। नतीजतन, जैविक खेती को व्यवहार्य बनाने के लिए कई स्तरों पर सहायक अवसंरचना विकसित करना अनिवार्य हो जाता है।
वर्तमान में, पूरी तरह जैविक या पूरी तरह गैर-जैविक प्रमाणन के कारण बहुत से ऐसे किसान, जो जैविक उत्पादन में आना चाहते हैं पर पूरी तरह से जैविक उत्पादन सामग्री का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे है, इस बदलाव का हिस्सा बनने से वंचित रह जाते हैं। इसके व्यावहारिक समाधान का एक उदाहरण चाय उद्योग में मिलता है, जहां विभिन्न स्तर के उत्पादों को श्रेणीबद्ध समूहों में बांटकर उनका मूल्य तय किया जाता है।
कपास की खेती में कुछ मध्यवर्ती श्रेणियां अपनाई जा सकती हैं, उदाहरण के लिए, मिश्रित बीजों से उगाया गया कपास जिसमें रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग न हो, या जैविक बीजों से उगाया गया कपास जिसमें केवल शुरुआती चरण में एक बार रासायनिक खाद दी गई हो। ऐसी श्रेणियां किसानों को उत्पादन सामग्री की लागत और उत्पाद के मूल्य निर्धारण—दोनों में अधिक लचीलापन प्रदान कर सकती हैं। इससे जैविक तरीकों को अपनाते समय होने वाली शुरुआती उत्पादकता में गिरावट के दौरान किसानों को सहारा भी मिल सकता है।
कॉटन एडवाइजरी बोर्ड और कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया जैसी संस्थाएं ऐसे श्रेणीकरण मानदंड स्थापित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर की योजना तैयार करने में सहायता कर सकती हैं, और विभिन्न किस्म के कपास उत्पादों को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बढ़ावा दे सकती हैं।
कीट प्रकोप और बदलती जलवायु परिस्थितियों जैसे जोखिमों का सामना कर सकने वाले जैविक आदानों के अनुसंधान और विकास में अधिक निवेश की आवश्यकता है। जैविक बीजों और जैविक उत्पादन सामग्री की व्यवहार्यता परखने तथा फसल-विफलता के जोखिम को कम करने के लिए उनकी मानकीकृत प्रभावशीलता जांच की व्यवस्था की जानी चाहिए। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइ.सी.ए.आर) तथा अन्य सार्वजनिक शोध संस्थान, निजी क्षेत्र के शोध केंद्रों और फाउंडेशनों के सहयोग से, जैविक उत्पादन सामग्री के शोध और विकास का नेतृत्व कर सकते हैं।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जैसी वर्तमान किसान संरक्षण योजनाएं जैविक कपास अपनाने के दौरान उत्पादकता में कमी से जुड़े जोखिमों को कम करने में बहुत कम सहायक हैं। यदि मौसम की प्रतिकूलता या जैविक उत्पादन सामग्री के कारण फसल को आंशिक या पूर्ण क्षति हो, या उपज की गुणवत्ता घटे, तो वित्तीय नुकसान की भरपाई के लिए एक प्रभावी तंत्र होना चाहिए। यहां तक कि जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को वित्तीय सहायता देने वाली परंपरागत कृषि विकास योजना (पी.के.वी.वाई) भी शुरुआती वर्षों की कम उत्पादकता और जैविक उत्पादन सामग्री से जुड़े जोखिमों को संबोधित नहीं करती।
कृषि बीमा कंपनी ऑफ इंडिया, जो बड़े पैमाने की कृषि बीमा योजनाओं की क्रियान्वयन एजेंसी है, जैविक खेती के शुरुआती वर्षों की कम उत्पादकता के दौरान किसानों को सहारा देने वाली बीमा योजनाएं तैयार करने के लिए एक उपयुक्त संस्था है। जोखिमों और शमन तंत्रों का सावधानी से आकलन किए बिना जैविक उत्पादन की ओर बढ़ने के गंभीर आर्थिक परिणाम हो सकते हैं, जिसका हालिया उदाहरण श्रीलंका का खाद्य संकट है। यह इस बात को रेखांकित करता है कि खेती की पद्धतियों में बदलाव की योजना को सूझबूझ के साथ बनाना कितना आवश्यक है।
चूंकि वर्तमान में जैविक कपास की अधिकांश मूल्य शृंखला खरीददार-प्रेरित है, इसलिए किसान उत्पादक संगठनों (एफ.पी.ओ) जैसे किसान और उत्पादक संगठनों को मजबूत करने की आवश्यकता है। ये संगठन न केवल उत्पादन सामग्री की खरीद में किसानों का समर्थन कर सकते हैं, बल्कि सामूहिक बिक्री और मोलभाव को भी प्रभावी बना सकते हैं।
जहां एफ.पी.ओ कमजोर या निष्क्रिय हैं, वहां क्लस्टर-आधारित व्यावसायिक संगठनों को आगे आकर सहयोग देना चाहिए। पंजीकृत सदस्यों को सक्रिय करने और उद्यम के कामकाज को पुनर्जीवित करने के लिए लक्षित अभियान चलाए जाने चाहिए।
सुरक्षित खरीद मूल्य शृंखला, प्रशिक्षण और कार्यान्वयन सहायता, तथा बाजार में उतार-चढ़ाव से किसानों की रक्षा करने वाली सरकारी योजनाएं ऐसे आवश्यक कदम हैं, जिनसे जैविक कपास को अपनाना न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि किसानों की आजीविका के लिए भी सतत विकल्प बनेगा।
एक किसान ने हमें बताया, “अगर हम केवल जैविक खेती करें, तो हमें भारी नुकसान होता है। जैविक खेती के लिए कोई फंड नहीं मिलता। यही एकमात्र समस्या है। अन्यथा हमें पता है कि जैविक खेती हमारे स्वास्थ्य और जमीन दोनों के लिए बहुत अच्छी है। लेकिन यह हमारे लिए व्यावहारिक नहीं है। मध्यम स्तर के किसान जिनके पास अतिरिक्त पूंजी नहीं है, वे इस तरह के काम नहीं कर सकते।”
सतत परिधानों की बढ़ती प्रवृत्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह उन किसानों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील रहें, जो इस परिवर्तन को संभव बना रहे हैं। वैश्विक जैविक कपास मूल्य शृंखला में भारत का सबसे बड़ा उत्पादक होना तभी सार्थक होगा, जब किसानों को जैविक पद्धतियां अपनाते समय उचित मुआवजा और पर्याप्त समर्थन मिलेगा। यह खासकर ऐसे समय में और जरूरी है, जब बढ़ती जलवायु अनिश्चितता, कम कीमतें और सुरक्षा के अभाव जैसी चुनौतियां भारतीय कृषि क्षेत्र को घेरे हुए हैं।
यह लेख इंडिया डेवलपमेंट रिव्यू (आईडीआर, हिंदी) से लिया गया है, जो एक स्वतंत्र मीडिया प्लेटफार्म है। ऑरीजनल लेख यहां क्लिक करके पढ़ें।