फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमन्स, एडम जोन्स
कृषि

दोषपूर्ण आयात नीति से कैसे बाधित हो रहा है दलहन आत्मनिर्भरता का लक्ष्य

सर्वोच्च न्यायालय ने रामपाल जाट की याचिका पर सुनवाई करते हुए दलहन खेती को बढ़ावा देने के लिए नीतिगत उपाय सुझाने के निर्देश दिए

Virender Singh Lather

  • भारत में दलहन आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को दोषपूर्ण आयात नीति बाधित कर रही है।

  • सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को दलहन की खेती को बढ़ावा देने के लिए नीतिगत उपाय सुझाने का निर्देश दिया है।

  • आयातित पीली मटर की कम कीमतें घरेलू उत्पादकों को नुकसान पहुंचा रही हैं, जिससे किसानों को आर्थिक घाटा हो रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 13 मार्च 2026 को किसान महापंचायत के राष्ट्रीय प्रधान रामपाल जाट द्वारा दायर याचिका संख्या 911/2025 पर अंतरिम आदेश पारित करते हुए सभी हितधारकों को भारत में दलहन की खेती को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक नीतिगत उपाय सुझाने के निर्देश दिए हैं।

भारत के मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि किसानों को गेहूं और धान जैसी पारंपरिक फसलों से दलहन की खेती की ओर विविधता लाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।

न्यायालय ने कहा कि एक प्रभावी नीतिगत ढांचा लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), समय पर खरीद तथा आयातित पीली मटर के मूल्य निर्धारण और आयात के उचित विनियमन को सुनिश्चित करे, ताकि घरेलू स्तर पर उत्पादित दलहन पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

न्यायालय ने यह भी कहा कि विचार-विमर्श में कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों को ध्यान में रखा जा सकता है। केंद्र सरकार को संबंधित हितधारकों की बैठक बुलाकर मौजूदा नीतिगत ढांचे की समीक्षा करने और विचार-विमर्श के नतीजों को रिकॉर्ड में दर्ज करने का निर्देश दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 8 मई 2026 को होगी।

उल्लेखनीय है कि सदियों से मुख्यतः शाकाहारी होने के कारण भारतीयों के भोजन में दालों का प्रमुख योगदान रहा है। लेकिन देश में दालों की मांग और आपूर्ति के बीच भारी अंतर है, जिसके कारण प्रति वर्ष लगभग 25–30 लाख टन (2–3 मिलियन टन) दालों का आयात करना पड़ता है।

भारत में वर्तमान में 250 लाख टन से अधिक दालों का उत्पादन होता है, जबकि कुल मांग लगभग 280 लाख टन के आसपास है। भविष्य के अनुमानों के अनुसार वर्ष 2030 तक दालों का उत्पादन लगभग 30.59 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जबकि मांग 35.23 मिलियन टन तक पहुंचने की संभावना है।

देश में 1966–67 से हरित क्रांति के दौरान उच्च उत्पादन तकनीक वाली बौनी उन्नत किस्मों, रासायनिक उर्वरकों, उन्नत सिंचाई और राष्ट्रीय खाद्य सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद की नीति अपनाई गई। इसके परिणामस्वरूप गेहूं और धान के कुल क्षेत्रफल तथा उत्पादन में आशातीत वृद्धि हुई। इसी कारण भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बना और अब गेहूं-चावल का निर्यात भी कर रहा है।

लेकिन पिछले 75 वर्षों में दलहन फसलों के कुल क्षेत्रफल और उत्पादन में कोई उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज नहीं हुई है।

1950-51 में, जब देश की आबादी लगभग 40 करोड़ थी, तब दालों का उत्पादन लगभग 8 मिलियन मीट्रिक टन था, जबकि गेहूं का उत्पादन मात्र 6 मिलियन मीट्रिक टन था। लेकिन सरकारी प्रोत्साहन और हरित क्रांति तकनीक अपनाने से वर्ष 2025 तक गेहूं का उत्पादन लगभग 20 गुना बढ़कर 117 मिलियन मीट्रिक टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इसके विपरीत, इसी अवधि में दलहन फसलों का उत्पादन मात्र तीन गुना बढ़कर लगभग 25 मिलियन मीट्रिक टन ही हो पाया।

निस्संदेह, पिछले सात दशकों में दलहन फसलों की उत्पादन तकनीक में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। लेकिन सरकार के सौतेले व्यवहार के कारण उच्च उत्पादकता वाले राज्यों हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने दलहन फसलों का क्षेत्रफल घटाकर गेहूं-धान-गन्ना फसल चक्र को प्राथमिकता दी।

इसका मुख्य कारण यह है कि दलहन फसलों की सरकारी खरीद के अभाव में किसानों को अपने उत्पाद लगभग 30 प्रतिशत तक समर्थन मूल्य से कम दाम पर बिचौलियों और साहूकारों को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

इसके परिणामस्वरूप, टिकाऊ और कम लागत वाली खेती होने के बावजूद किसानों के लिए दलहन उत्पादन गेहूं-धान फसल चक्र की तुलना में आर्थिक रूप से घाटे का सौदा साबित हो रहा है। यही कारण है कि देश में दलहन उत्पादन अब मुख्यतः वर्षा आधारित, कम उपजाऊ और कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों तक सीमित होकर रह गया है।

पिछले एक दशक से सरकार द्वारा चलाए जा रहे दलहन आत्मनिर्भरता मिशन की सफलता में दलहन फसलों की समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद का अभाव तथा शुल्क-मुक्त दोषपूर्ण आयात नीति प्रमुख बाधाएं बनी हुई हैं।

वर्ष 2024-25 में भारत ने 67 लाख टन से अधिक दालों का आयात किया, जिनमें लगभग 30 लाख टन पीली मटर शामिल थी। पीली मटर पर आयात शुल्क न होने के कारण आयातित मटर की कीमत भारतीय खुले बाजार में लगभग 3,500 रुपए प्रति क्विंटल रही, जो घरेलू दलहन उत्पादों के 7,000 से 8,600 रुपए प्रति क्विंटल के एमएसपी से आधे से भी कम है।

नतीजतन, सस्ते आयात के कारण किसानों को अपने दलहन उत्पाद समर्थन मूल्य से लगभग एक-तिहाई कम कीमत पर बेचने पड़े। इसके दुष्प्रभाव से महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के किसानों के लिए घरेलू दालें प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रही हैं। परिणामस्वरूप उनके लिए दलहन उत्पादन लाभकारी नहीं रह गया और किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

उच्च खाद्य मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के बहाने दिसंबर 2023 में पीली मटर पर 50 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी को “अस्थायी रूप से” समाप्त कर दिया गया था। किसानों द्वारा बार-बार की गई अपील के बावजूद सरकार ने शुल्क-मुक्त दलहन आयात को वर्षों तक भारी मात्रा में जारी रखा, जिससे बिचौलियों को अनुचित लाभ मिलता रहा।

यहां तक कि कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी), नीति आयोग और सर्वोच्च न्यायालय जैसी संस्थाओं ने भी किसानों की सुरक्षा के लिए बिना रोक-टोक आयात पर नियंत्रण लगाने की सलाह दी थी। फिर भी केंद्र सरकार ने इन चेतावनियों की अनदेखी करते हुए पीली मटर पर कस्टम ड्यूटी की छूट जारी रखी।

ये सस्ते दलहन आयात मुख्यतः कनाडा, रूस और अमेरिका जैसे देशों से पूर्व में लागू शुल्क-मुक्त नीति के कारण संभव हुए। बाद में 1 नवंबर 2025 से इन पर पुनः 30 प्रतिशत शुल्क लागू किया गया।

कुल मिलाकर, दालों के आयात पर 30 प्रतिशत शुल्क भारत के घरेलू किसानों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम है। इससे कमजोर मंडी कीमतों को स्थिर करने और आयात पर निर्भरता को कम करने में मदद मिलती है। यह नीति निर्माताओं को आपूर्ति और मुद्रास्फीति प्रबंधन पर अधिक नियंत्रण देती है, साथ ही स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहित करती है।

अब दलहन आयात में तेज गिरावट यह संकेत देती है कि भारत कृषि हितों की रक्षा के लिए शुल्क नीति का प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकता है, बशर्ते केंद्र सरकार दलहन आत्मनिर्भरता मिशन को सफल बनाने के लिए समर्थन मूल्य पर दलहन फसलों की खरीद सुनिश्चित करे और शुल्क-मुक्त आयात-निर्यात पर प्रभावी नियंत्रण लागू करे।

लेखक भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक हैं