22 अक्टूबर 2025 यानी दिवाली के अगले दिन 55 साल के श्रीचंद केवट खेत में गए तो उनके पैरों तले से जमीन सरक गई। पिछले तीन-चार साल से वह बीहड़ की जिस 6-7 बीघा (3-3.5 एकड़) जमीन को समतल कर खेती योग्य बना रहे थे, उसकी पूरी मिट्टी बारिश में बह गई थी। इस साल मॉनसून और उसके बाद हुई भारी बारिश से खेत में मिट्टी के कटाव से बड़े-बड़े गढ्ढे बन गए थे। बीहड़ को समतल बनाने में उनके 15 लाख रुपए खर्च हो गए थे।
श्रीचंद ने वर्षों की जमा पूंजी और उधार के पैसे यह सोचकर निवेश कर दिए थे कि उनके पांच बेटे इस खेती से गुजर-बसर कर लेंगे। खेत को तहस-नहस और लाखों के नुकसान को देखकर श्रीचंद को गहरा सदमा लगा और वह खेत में ही बेसुध हो गए। श्रीचंद के परिवार वालों ने बताया कि सदमे से उनकी मौके पर ही मौत हो गई थी। श्रीचंद की मौत संकेत देती है कि बीहड़ का समतलीकरण किस हद तक नुकसानदेह है।
श्रीचंद मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के सबलगढ़ तहसील में आने वाले राहू का गांव के रेमजी का पुरा मजरा में रहते थे। इस मजरे में करीब 400 परिवार रहते हैं और 10-20 परिवारों को छोड़कर लगभग सभी परिवार चंबल नदी से सटे बीहड़ की जमीन पर खेती कर रहे हैं। श्रीचंद की तरह ही लोगों ने भारी निवेश कर बीहड़ को खेतों में तब्दील किया है। यहां रहने वाले रामदास केवट ने डाउन टू अर्थ को बीहड़ के समतलीकरण के पैमाने की जानकारी देते हुए बताया कि गांव में 70 प्रतिशत से अधिक बीहड़ खेत में तब्दील हो चुके हैं। उनके अनुसार, कुछ किसानों को बीहड़ के पट्टे मिले हुए हैं लेकिन अधिकांश मामलों में ऐसा नहीं है।
चंबल नदी किनारे बसा मुरैना का भानपुर भी ऐसा ही एक गांव है। यहां रहने वाले किसान सियाराम मीणा के अनुसार, 100 परिवारों वाले उनके गांव में सभी छोटे किसान हैं। उनके पास महज 2 से 5 बीघा (1-2.5 एकड़) तक खेत हैं। वह मानते हैं कि गांव के किसान बीहड़ों की जमीन जोत रहे हैं। इसे वह किसानों की मजबूरी बताते हुए कहते हैं कि परिवारों का विस्तार होने से खेती की कम जमीन और रोजगार का कोई साधन न होने के कारण किसानों को बीहड़ की जमीन जोतनी पड़ रही है।
भानपुर गांव के नजदीक ही राजघाट स्थित चंबल सफारी में 32 साल से बोटमैन के रूप में काम कर रहे भगवान सिंह सोलंकी ने बीहड़ों की प्रकृति को बदलते हुए नजदीक से देखा है। वह मानते हैं कि राजघाट में ही चंबल नदी के किनारे करीब 10 किलोमीटर तक के बीहड़ समतल हो चुके हैं और यह हर साल बढ़ रहा है। राजघाट के नजदीक बसे मसूदपुर गांव में रहने वाले भूरा सिंह गुर्जर कहते हैं कि 15 साल पहले तक चंबल नदी से पांच किलोमीटर दूर खेत थे। अब नदी के किनारे तक खेती होने लगी है। उनका कहना है कि लोग देखा-देखी बीहड़ की जमीन पर अतिक्रमण करते जा रहे हैं।
चंबल के बीहड़ों पर तीन दशक से अधिक समय से शोध कर रहीं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ रीजनल डेवलपमेंट के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेस में प्रोफेसर पद्मिनी पाणी डाउन टू अर्थ से इसके जोखिमों की ओर इशारा करते हुए कहती हैं कि बीहड़ों में खेती अल्पावधि में आजीविका और भूमि-उपयोग के कुछ लाभ दे सकती है, लेकिन केवल खेती का क्षेत्र बढ़ाने के उद्देश्य से बगैर पारिस्थितिक सुरक्षा के ऐसा करना जोखिमभरा और प्रायः अस्थिर साबित होता है (देखें, जोखिमभरा है बीहड़ों का समतलीकरण,)।
इंडियन जर्नल ऑफ सॉयल कंजरवेशन में 2021 में प्रकाशित डीसी मीणा, एके परंडियाल, दिलीप कुमार और प्रदीप डोगरा के अध्ययन के अनुसार, देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में से लगभग 120.72 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र विभिन्न प्रकार के भूमि क्षरण से प्रभावित है। भूमि क्षरण के विभिन्न रूपों में बीहड़ जल द्वारा स्थलाकृति के विकृत होने का सबसे गंभीर उदाहरण है। भारत की लगभग सभी प्रमुख नदी प्रणालियों के किनारे बीहड़ और गली पाई जाती हैं, परंतु इनका सबसे अधिक प्रसार राजस्थान (1,884.92 वर्ग किमी), उत्तर प्रदेश (1,502.06 वर्ग किमी) और मध्य प्रदेश (1,481.11 वर्ग किमी) में है।
पद्मिनी पाणी अपनी किताब “लैंड डिग्रेडेशन एंड सोशियो इकॉनोमिक डेवलपमेंट: ए फील्ड बेस्ड पर्सपैक्टिव” में लिखती हैं कि भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 0.32 प्रतिशत हिस्सा गली और बीहड़ से प्रभावित है। उनके अनुसार, 1943 में राष्ट्रीय योजना समिति ने अनुमान लगाया था कि संयुक्त भारत के लगभग 3.8 प्रतिशत भू-भाग पर गंभीर रूप से गली कटाव का प्रभाव था और संयुक्त प्रांतों के लगभग 8 प्रतिशत क्षेत्र (लगभग 20 लाख हेक्टेयर) में बीहड़ हैं, जहां वनस्पति आच्छादन बिल्कुल नहीं था। स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय कृषि आयोग ने पाया था कि लगभग 3.67 मिलियन हेक्टेयर भूमि बीहड़ से प्रभावित थी।
लगभग 960 किलोमीटर लंबी और यमुना नदी की सबसे बड़ी सहायक चंबल नदी मध्य भारत के उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान से होकर गुजरती है। महाभारत में चंबल नदी का उल्लेख “चर्मण्वती” नाम से मिलता है। इसके तट पर बलि दिए गए पशुओं की खाल सुखाने का जिक्र है। मान्यता है कि इन्हीं पशुओं के रक्त से नदी का उत्पत्ति हुई। कुछ दशक पहले चंबल नदी और उससे जुड़े बीहड़ कुख्यात डकैतों के शरणगाह थे।
1972 में भारत सरकार ने देश में बीहड़ अपरदन की गंभीरता के आधार पर पांच प्रमुख बीहड़ अपरदन क्षेत्र की पहचान की थी। इनमें अत्यंत गंभीर बीहड़ अपरदन क्षेत्र के रूप में यमुना–चंबल बीहड़ क्षेत्र को चिन्हित किया गया था जिसकी लगभग 5,000 वर्ग किलोमीटर भूमि बीहड़ (गहरी कटाव भूमि) से प्रभावित थी।
पाणी द्वारा किए गए रिमोट सेंसिंग डेटा विश्लेषण के अनुसार, 1974 में मुरैना में बीहड़ प्रभावित कुल क्षेत्रफल 1,082.71 वर्ग किलोमीटर था, जो वर्ष 2014 में घटकर 415.98 वर्ग किलोमीटर रह गया (देखें, सिमटते बीहड़)। मौजूदा समय में इसके और कम होने का अनुमान है क्योंकि इसका बड़ा हिस्सा समतलीकरण की भेंट चढ़ चुका है, साथ ही सोलर पावर प्रोजेक्ट और उद्योगों को दिया गया है। अध्ययन के अनुसार, बीहड़ क्षेत्रफल में उल्लेखनीय कमी मुख्य रूप से बड़े पैमाने पर की जा रही भूमि समतलीकरण प्रक्रिया का नतीजा है। समतलीकरण मृदा अपरदन की प्रक्रिया तेज करती है। समतल की गई भूमि का उपयोग अधिकांश मामलों में कृषि कार्यों के लिए किया जाता है।
पाणी ने फील्ड विजिट के दौरान पाया कि कई स्थानों पर नई बीहड संरचनाए विकसित हो रही हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि अध्ययन क्षेत्र में बीहड़ निर्माण की प्रक्रिया अब भी सक्रिय है। यह जियोमॉर्फिक प्रक्रिया धीमी और क्रमिक होती है, लेकिन मानवजनित गतिविधियां प्राकृतिक जियोमॉर्फिक प्रक्रियाओं को तेजी से परिवर्तित या दबाने में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाती हैं।
बीहड़ को समतल करने वाले किसान इस तथ्य से परिचित हैं कि बीहड़ को समतल कर बने ज्यादातर खेत मिट्टी के कटाव से बुरी तरह प्रभावित हैं। इन खेतों की उत्पादकता कम है। उनका कहना है कि एक बीघा जमीन को समतल करने में कम से कम 50 हजार रुपए का खर्च आता है। बीहड़ अधिक ऊंचे होने पर यह खर्च एक लाख रुपए तक पहुंच जाता है। मुरैना से सटे राजस्थान के करौली जिले के बरड़ मल्लाहपुरा गांव के किसान नारायण केवट स्वीकार करते हैं कि बीहड़ से तैयार खेत मुख्यत: ढलानदार होते हैं, जिसकी मिट्टी बरसात के पानी में बह जाती है। ऐसी जमीन की उपज सामान्य कृषि भूमि के मुकाबले काफी कम होती है। वह सरसों के उदाहरण से समझाते हैं कि बीहड़ की ढलान वाली जमीन से एक बीघा (0.5 एकड़) में करीब दो क्विंटल सरसों की उपज होती है जबकि सामान्य कृषि भूमि करीब 10 क्विंटल उपज देती है। नारायण केवट के पास करीब 5 बीघा (2.5 एकड़) जमीन है जिसमें से दो बीघा (1 एकड़) उन्होंने 5 साल पहले बीहड़ से बनाई थी।
मुरैना के डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (डीएफओ) सुजीत जे पाटिल डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि बीहड़ का समतलीकरण अवैध है। वह मानते हैं कि चंबल अभयारण्य के अधिसूचित न होने से भूमि के अधिकार सैटल न हो पाने के कारण भी ऐसा हो रहा है। पाटिल के अनुसार, चंबल अभयारण्य की सीमा नदी से एक किलोमीटर तक है। समतलीकरण वन भूमि के बजाय मुख्यत: राजस्व भूमि पर हो रहा है और इसे रोकने के लिए राजस्व भूमि को वन भूमि में लाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि डाउन टू अर्थ ने उनके दावे से उलट कई गांवों में ऐसी जमीन पर भी खेती देखी जो नदी से सटी है और चंबल अभयारण्य का हिस्सा है।
करौली का बरड़ मल्लाहपुरा और बरड़ पांचोली ऐसे ही गांव हैं। बरड़ पांचोली के किशोर मीणा समतलीकरण का गणित समझाते हुए कहते हैं कि गांव में एक बीघा खेत 14-15 लाख रुपए का है, जबकि बीहड़ में खेत तैयार करने में 50 हजार से एक लाख रुपए का खर्च आता है। इस कारण भी बीहड़ों की जमीन पर खेती का चलन जोर पकड़ रहा है। उनका कहना है कि यह समतल जमीन 5-10 वर्ष बाद वसीयत में चढ़ जाती है। गांव में करीब 10 लोगों की वसीयत में ऐसी जमीन चढ़ चुकी है। हालांकि उनका यह भी कहना है कि ऐसी जमीनों की उत्पादकता ज्यादा नहीं होती लेकिन आजीविका और अस्मिता से जुड़े होने के कारण किसान ज्यादा से ज्यादा खेत बनाना चाहते हैं।
किसानों को एक डर यह भी है कि कहीं उनकी गाढ़ी कमाई से समतल की गई जमीन हाथ से चली न जाए, इसलिए वे एक साथ बीहड़ों पर निवेश नहीं करते और उनके पास इतनी पूंजी भी नहीं होती। इस काम में वे “वेट एंड वॉच” की रणनीति अपनाते हैं। भानपुर गांव के किसान गब्बर सिंह के अनुसार, बीहड़ की बेकार जमीन किसानों के काम आ रही है, इसलिए सरकार को इसकी रजिस्ट्री करनी चाहिए।
पाणी ने 2018 में जर्नल ऑफ एशियन एंड अफ्रीकन स्टडीज में प्रकाशित अपने अध्ययन “रिवाइन इरोजन एंड लाइलीहुड इन सेमी एरिड इंडिया: इंप्लीकेशंस फॉर सोशल इकोनॉमिक डेवलपमेंट” में बीहड़ों को उनकी प्रकृति और तीव्रता के आधार पर तीन व्यापक वर्गों- अत्यधिक डिग्रेडेड बीहड़, मध्यम डिग्रेडेड बीहड़ और समतल किए गए या समाप्त बीहड़ में बांटा है। यह वर्गीकरण बीहड़ बनने की तीव्रता, आकृति, आकार और कृषि प्रथाओं के आधार पर किया गया है। पाणी के अध्ययन के अनुसार, तीन प्रकार की बीहड़ प्रभावित भूमि देखी गई हैं। पहली गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्र (डीप रिवाइन) जिसकी गहराई 30 मीटर से अधिक, आधार चौड़ाई लगभग 2–3 मीटर होती है और ढाल बहुत तीव्र होती है। इनकी आकृति सामान्यतः वी-आकार की होती है। दूसरी, मध्यम रूप से प्रभावित क्षेत्र (मीडियम रिवाइन) जिसकी गहराई 5 से 30 मीटर तक होती है, आधार चौड़ाई लगभग 20 मीटर और ढाल मध्यम से हल्की होती है। इनकी आकृति प्रायः यू-आकार की होती है। तीसरे कम प्रभावित या समाप्त बीहड़ हैं जो समतल कर दिए गए हैं। कभी-कभी इनकी स्थलाकृति लहरदार दिखाई देती है।
अध्यययन के अनुसार, यह भी देखा गया कि अनुपजाऊ भूमि में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ, लेकिन बीहड़ क्षेत्र 21.72 प्रतिशत से घटकर केवल 8.35 प्रतिशत रह गया है। पुनः प्राप्त यानी समतल बीहड़ भूमि के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि ऐसी भूमि का प्रतिशत तेजी से बढ़ा है। ये भूमि मुख्यतः वे बीहड़ क्षेत्र हैं जिन्हें स्थानीय किसानों द्वारा समतल किया गया है। हालांकि यह पाया गया कि इन पुनः प्राप्त समतल भूमि पर कृषि गतिविधियां टिकाऊ नहीं हैं और फसल उत्पादन इतना पर्याप्त नहीं होता कि किसान लंबे समय तक इस भूमि को बनाए रख सकें। ऐसी सभी समतल भूमि के लिए निरंतर निगरानी और संरक्षण आवश्यक है। लेकिन स्थानीय किसान इस भूमि का दीर्घकालिक संरक्षण वहन करने में सक्षम नहीं हैं। इसलिए, इन समतल भूमि की ऊपरी मृदा की हानि इस क्षेत्र में भूमि क्षरण की एक अवश्यंभावी प्रक्रिया बन गई है।
जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस में अक्टूबर 2022 को प्रकाशित अध्ययन “यूजिंग गूगल अर्थ इंजन एंड जीआईएस फॉर बेसिन स्केल सॉयल इरोजन रिस्क असेसमेंट: ए केस स्टडी ऑफ चंबल रिवर बेसिन, सेंट्रल इंडिया” में शोधकर्ता रोहित कुमार, बेनिधर देशमुख और अमित कुमार ने चंबल नदी बेसिन (सीएचबी) में जल के कारण होने वाले मृदा अपरदन (मृदा हानि) का आकलन किया है। यह आकलन गूगल अर्थ इंजन और भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हुए रिवाइज यूनिवर्सल सॉयल लॉस इक्वेशन (आरयूएसएलई) के माध्यम से किया गया है।
अध्ययन के अनुसार, चंबल नदी बेसिन में खुले वन और कृषि भूमि क्षेत्रों में औसत मृदा ह्रास क्रमशः 0.122 और 0.178 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष पाया गया है। यह कम दर इस बात का संकेत देती है कि वनस्पति आवरण मृदा अपरदन को रोकने में प्रभावी भूमिका निभाता है। खुले वन में वनस्पति घनत्व अपेक्षाकृत अधिक होता है, जिससे वर्षा की बूंदों का भूमि सतह से प्रत्यक्ष संपर्क कम होता है। इससे मृदा अपरदन भी कम होता है।
अध्ययन के अनुसार, कुछ कृषि भूमि क्षेत्र गहरी नालियों (गली क्षेत्रों) से प्राप्त की गई भूमि हैं। प्राकृतिक वनस्पति की तुलना में इन क्षेत्रों में वर्षा की बूंदों और भूमि सतह के बीच प्रत्यक्ष संपर्क अधिक होता है, जिसके परिणामस्वरूप अपेक्षाकृत अधिक मृदा ह्रास होता है। बीहड़ों में यह सबसे अधिक है। अध्ययन के अनुसार, गली-बीहड़, बंजर भूमि और रेतीले क्षेत्र में क्रमशः 13.44, 5.92 और 4.88 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष की औसत मृदा ह्रास है। अध्ययन में कोटा, मुरैना, धौलपुर, भिंड और इटावा जैसे जिले मृदा ह्रास के प्रति अधिक संवेदनशील पाए गए हैं और ये क्षेत्र “गंभीर” से “अत्यंत गंभीर” मृदा ह्रास श्रेणियों में आते हैं।
बीहड़ों को भले ही वेस्टलैंड की श्रेणी में डाला गया है लेकिन यहां की पारिस्थितिकी पौधों और पशुओं की अत्यधिक विविधता के लिए जानी जाती है। इनमें अकशेरुकी जीव जैसे विभिन्न प्रकार के वाटर स्केटर और डाइविंग बीटल, कछुओं की सात प्रजातियां तथा मछलियों की अनेक प्रजातियां शामिल हैं। यह नदी सबसे अधिक घड़ियाल और मगर के लिए अनुकूल है क्योंकि इसके साफ पानी को ये पसंद करते हैं। दुनिया की कुछ सबसे लुप्तप्राय प्रजातियां जैसे गंगा डॉल्फिन, स्मूद-कोटेड ऊदबिलाव और इंडियन स्किमर भी यहां पाई जाती हैं।
इक्वेटिक कंजरवेशन जर्नल में 2011 में प्रकाशित सुयश कटडरे, अर्जुन श्रीवत्स, अपूर्वा जोशी, प्रतीश पांखे, रुचिक पांडे और धर्मेंद्र खंडाल के संयुक्त अध्ययन “घड़ियाल (गेविएलिस गेंटेटिकस) पॉपुलेशंस एंड ह्यूमन इन्फ्लुएंसेस ऑन हैबिटेट्स ऑन द रिवर चंबल इंडिया” के अनुसार, नदी के दोनों किनारों पर फैले बीहड़ मॉनसूनी बाढ़ के पानी को ऊंचे इलाकों में बसे गांवों से दूर मोड़ने में मदद करते हैं।
इस प्रकार ये बीहड़ न केवल ग्रामीणों के लिए लाभदायक हैं बल्कि वन्यजीवों के लिए भी विविध आवास प्रदान करते हैं। अध्ययन के अनुसार, इन बीहड़ों में कैनिड प्रजातियों की विविधता पाई जाती है, जिनमें भारतीय भेड़िया, सियार, भारतीय लोमड़ी, रेगिस्तानी लोमड़ी और धारीदार लकड़बग्घा शामिल है। इसके अलावा भालू भी इस विविध पारिस्थितिक तंत्र में पाया जाता है।
देवरी घड़ियाल पालन केंद्र से सेवानिवृत्त रेंजर और घड़ियाल विशेषज्ञ आरके शर्मा कहते हैं कि चंबल का बीहड़ अपने आप में अनोखा है। ऐसा लैंडस्केप कहीं नहीं है। किसी नदी में इतने बीहड़ नहीं हैं। यहां मिट्टी में बाइंडिंग कैपिसिटी नहीं हैं, इसलिए इरोजन काफी समय से हो रहा है। उनका कहना है कि नदी की गहराई और हाई बैंक को जीव पसंद करते हैं। समतलीकरण से नदी की गहराई कम होगी और इससे जीवों पर निश्चित तौर पर असर होगा। मुरैना जिले के कुथियाना गांव के शैलू भदौरिया कहते हैं कि बीहड़ टूटने से बहुत से गांव बाढ़ के प्रति संवेदनशील हो गए हैं। गांवों में बाढ़ अब नियमित रूप से आने लगी है। खुद उनके गांव में भी आने वाले समय में बाढ़ आ सकती है क्योंकि बाढ़ के लिए दीवार का काम करने वाले बीहड़ बड़े पैमाने पर खत्म हुए हैं। उनका यह भी कहना है कि जानवरों के आवास खत्म होने ये जानवर गांव में पहुंचकर हमले कर रहे हैं। राजघाट में तैनात वन विभाग के कर्मचारियों ने बताया कि भानपुर गांव इस साल बरसात में रोड पर आ गया था कि क्योंकि वह बाढ़ के पानी से घिर गया था। वे इस बाढ़ के लिए बीहड़ के खात्मे को जिम्मेदार ठहराते हैं।
भारत की सबसे साफ नदियों में शामिल चंबल को 1978 में “मगरमच्छ परियोजना ” के तहत मगरमच्छ अभयारण्य घोषित किया गया था। इस घोषणा का उद्देश्य घड़ियाल, मगरमच्छ तथा अन्य वन्यजीवों के संरक्षण और संवर्धन के लिए पूर्ण रूप से संरक्षित आवास उपलब्ध कराना था। आरके शर्मा कहते हैं कि जब 1978 में चंबल अभयारण्य खुला था, उस समय उसका इसका क्षेत्र 3,582 वर्ग किलोमीटर था क्योंकि इसकी 5-5 किलोमीटर की सीमा था। इस पर सवाल उठने पर संशोधित नोटिफिकेशन हुआ। 1982 में सीमा एक किलाेमीटर कर दी गई। फिर सवाल उठने पर अभयारण्य की हाई बैंक सीमा कर दी गई थी।
मौजूदा समय में नदी में 2,462 घड़ियाल हैं। आंकड़ों के अनुसार, हर साल घड़ियालों की संख्या में वृद्धि हो रही है जो मुख्य रूप से मुरैना में देवरी में स्थित घड़ियाल पालन केंद्र की देन हैं। इस केंद्र में घड़ियालों को पाला जाता है और हर साल 100 घड़ियाल नदी में छोड़े जाते हैं। मुरैना के डीएफओ सुजीत जे पाटिल मानते हैं कि चंबल नदी को साफ रखने में घड़ियालों और बीहड़ों की बड़ी भूमिका है। उनका कहना है कि चंबल के पारिस्थितिकी में हो रहे बदलाव जलीय व वन्य जीवों के बहुत बड़ी चुनौती है। उनका स्पष्ट मानना है कि पारिस्थितिकी को पहुंच रहे नुकसान से चंबल की बहुत सी प्रजातियां नष्ट हो सकती हैं।
इक्वेटिक कंजरवेशन में 2011 में प्रकाशित अध्ययन 2007 में बड़े पैमाने पर घड़ियालों की मौत के बाद किया गया था। राजस्थान के पाली और खीरकन गांव के बीच 110 किलोमीटर हिस्से में नदी में घड़ियालों की आबादी जानने के लिए तीन स्थानों पर हुए सर्वेक्षण में पाया गया कि नदी किनारे कृषि घड़ियाल के लिए आवश्यक आवास के लिए एक प्रमुख खतरा है। पूरे नदी खंड के दोनों तटों पर कृषि का विस्तार पाया गया, राजस्थान तट पर तो यह सर्वेक्षित लंबाई के लगभग एक-तिहाई हिस्से में दर्ज किया गया। कृषि से जुड़ी अन्य गतिविधियां भी नदी पारिस्थितिकी तंत्र और घड़ियालों के आवास की उपयुक्तता को प्रभावित करती हैं। विशेष रूप से सिंचाई के लिए जल निकासी, मोटर चालित पंपों से उत्पन्न शोर, पंप संचालन से होने वाली लगातार मानवीय गतिविधि और डीजल के रिसाव या फैलाव से होने वाले प्रदूषण के जोखिम इन प्रभावों को और बढ़ाते हैं।
अध्ययन में नदी तटों पर कृषि विस्तार के लिए खेत बनाने की दृष्टि से बीहड़ों को समतल करने की प्रक्रिया तेजी से बढ़ती पाई गई। सर्वेक्षण क्षेत्र का 18 प्रतिशत भाग बीहड़ों से ढका हुआ था और इनमें से 22 प्रतिशत बीहड़ आंशिक या पूर्ण रूप से कृषि प्रयोजनों के लिए समतल कर दिए गए। अध्ययन के अनुसार, बाढ़ के दौरान पानी का स्तर 10–15 मीटर तक बढ़ सकता है और कभी-कभी दोनों तटों से 500 मीटर तक फैल जाता है। बीहड़ इन बाढ़ के पानी को रोकने के लिए प्राकृतिक अवरोध के रूप में कार्य करते हैं। वे नदी के जलीय जीवों को बाढ़ के पानी के साथ दूर अंदर तक बह जाने से भी रोकते हैं। बीहड़ों की अनुपस्थिति में ये जानवर मुलायम चिकनी मिट्टी में फंस सकते हैं और नदी में वापस नहीं लौट पाते। अध्ययन में पाया गया कि बीहड़ों का समतलीकरण न केवल नदी की भौगोलिक आकृति को बदल देता है, बल्कि बाघ जैसी प्रमुख प्रजातियों के आवास को भी और अधिक खंडित कर देता है।
अध्ययन के अनुसार, अत्यधिक उर्वरकों का उपयोग भी समस्या उत्पन्न कर सकता है। भारत के इस भाग में यूरिया सबसे अधिक प्रयुक्त उर्वरक है। यह धीरे-धीरे नदी में रिसकर लंबे समय में नदी पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव डाल सकता है। नदी में यूरिया के कारण यूट्रोफिकेशन होता है, जिससे तैरते पौधों की अत्यधिक वृद्धि होती है, जो नदी के प्रवाह की गति और ऑक्सीजन की मात्रा को प्रभावित कर सकते हैं। रेतीले तटों का विनाश भी नदी किनारे कृषि के बढ़ने का एक प्रत्यक्ष और गंभीर परिणाम है। अधिक कृषि भूमि की आवश्यकता के चलते अब गांववासी नदी तटों से आगे बढ़कर नदी के बीच में बने रेतीले टापुओं का भी खेती के लिए उपयोग करने लगे हैं। रेतीले तट घड़ियाल की पारिस्थितिकी में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये उनके धूप सेंकने और अंडे देने के स्थान होते हैं। 2009 में ये रेतीले तट कुल सर्वेक्षित क्षेत्र का 32.3 प्रतिशत भाग घेरते थे। इनमें से लगभग 10 प्रतिशत तट कृषि भूमि में परिवर्तित हो चुके थे।
देहरादून स्थित वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) द्वारा 2022 में प्रकाशित रिपोर्ट “चंबल रिवर इकॉलोजिकल स्टेटस एंड ट्रेंड्स” में भी पाया गया है कि नदी किनारे कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों से होने वाले जल प्रदूषण का खतरा घड़ियालों के आवास के नष्ट होने, गुणवत्ता घटने और प्रदूषण बढ़ने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सबमर्सिबल पंपों के बढ़ते उपयोग से बिजली के तारों से करंट लगने और खतरनाक उपकरणों का जोखिम भी बढ़ गया है। रिपोर्ट के अनुसार, अभयारण्य की सीमा के भीतर आने वाले गांवों के अधिकारों का निस्तारण और चंबल अभयारण्य की अंतिम अधिसूचना अब तक नहीं की गई है। यह स्थिति नदी तट के किनारे कृषि के फैलाव को रोकने में बड़ी बाधा साबित हुई है।
डब्ल्यूआईआई के सर्वेक्षण के दौरान पाया गया कि नदी तटों पर व्यापक स्तर पर कृषि कार्य किए जा रहे हैं और अधिकांश स्थानों पर यह पूरे रेत के टीलों तक व नदी के किनारे तक फैली हुई थी। इस प्रकार की कृषि से जलीय सरीसृपों के धूप सेंकने और घोंसले बनाने के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण स्थल नष्ट हो रहे हैं।
रिपोर्ट में चंबल नदी में रेत के अवैध उत्खनन को भी जलीय जीवों के लिए यह कहते हुए नुकसानदेह बताया गया है, “रेत खनन घड़ियालों और अन्य प्रजातियों के धूप सेंकने (बास्किंग) तथा अंडे देने (नेस्टिंग) के स्थलों के लिए एक गंभीर खतरा उत्पन्न करता है।” वन विभाग के कर्मचारी ने डाउन टू अर्थ को बताया कि तिगरी रिठौरा में अवैध खनन से घड़ियालों की नेस्टिंग साइट नष्ट हो चुकी है। डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट के अनुसार, खनन स्थलों पर लगातार मानव गतिविधियों के कारण ये जानवर अपने प्राकृतिक उपयोग के स्थलों का उपयोग नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप, उन्हें धूप सेंकने और अंडे देने के आवश्यक आवासों (हैबिटेट) तक पहुंच से वंचित होना पड़ता है।
रेत खनन की गतिविधियां विशेष रूप से चंबल नदी तंत्र के निचले हिस्से में अधिक पाई गईं, खासकर राजघाट के लगभग 20 किलोमीटर ऊपरी और निचले प्रवाह के क्षेत्रों में यह समस्या अधिक गंभीर रूप में देखी गई। डाउन टू अर्थ ने अपनी यात्रा के दौरान कुछ स्थानों पर नदी से रेत भरकर लाते ट्रैक्टर ट्रॉलियां देखीं। वन विभाग से जुड़े एक कर्मचारी ने बताया कि अवैध खनन करने वालों पर कार्रवाई करना मौत को दावत देने जैसा है। वे बहुत संभलकर खनन की ट्रैक्टर ट्रॉलियों को पकड़ते हैं क्योंकि वे हमलावर हो जाते हैं। कई बार उनके वाहन को घेरकर पत्थरबाजी की गई है और कर्मचारियों को चोटें आई हैं। वह बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में कार्रवाई के बहुत खतरे हैं क्योंकि अवैध खनन में शामिल लोगों से निपटना कुछ कर्मचारियों के लिए संभव नहीं होता।
चंबल अभयारण्य में वनपाल के पद पर तैनात और वर्षों से घड़ियालों के संरक्षण जुड़े ज्योति प्रसाद डंडोतिया अवैध खनन के साथ ही बीहड़ों के समतलीकरण से चंबल नदी के पारिस्थितिकी में आए रहे बदलावों को नदी, जलीय और वन्य जीवों के लिए काल मान रहे हैं। उनका यहां तक कहना है कि अगर ये गतिविधियां इसी तरह जारी रहीं तो आने वाले 10 वर्षों में बीहड़ों का नामोनिशान मिट जाएगा और चंबल नदी भी अन्य नदियों की तरह प्रदूषण की भेंट चढ़ जाएगी। इसका सबसे बुरा प्रभाव यह होगा कि पांच दशक से अधिक समय से जारी घड़ियालों को बचाने के लिए प्रयास निरर्थक साबित होंगे। उनका यह भी कहना है कि बीहड़ों में पाया जाने वाला ऊदबिलाव चंबल में इंसानी दखल के कारण विलुप्त हो गया है। आने वाले समय विलुप्ति का यह संकट अन्य कई प्रजातियों पर भी मंडराएगा।