मोहम्मद जब्बार 2022 से परेशान हैं। पारंपरिक रूप से केसर की खेती करने वाले मोहम्मद जब्बार को अपना यह पेशा छोड़कर अपेक्षाकृत कम फायदेमंद सेब की खेती की ओर मजबूरी में रुख करना पड़ा है। इस बदलाव ने उनकी आमदनी पर बेहद बुरा असर डाला है। अपने एक एकड़ खेत में केसर की खेती करने पर उन्हें 3-4 लाख रुपए की आमदनी होती थी जो अब घटकर 1.10 लाख से 1.20 लाख रुपए के बीच सिमट गई है। दूसरे शब्दों में कहें तो अब उनकी कमाई आधी भी नहीं रह गई है।
जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले की पांपोर तहसील में स्थित मोहम्मद जब्बार का गांव पातालबाग पारंपरिक रूप से केसर की खेती के लिए मशहूर रहा है। पुलवामा जिला जम्मू-कश्मीर में केसर उत्पादन का केंद्र है और इसमें पांपोर की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। यही वजह है कि पांपोर को केसर नगरी के नाम से भी जाना जाता है। केसर पुलवामा के “एक जिला एक उत्पाद” (ओडीओपी) में भी शामिल है और इसे अपनी स्थानीयता और खूबियों के कारण जीआई (भौगोलिक संकेतक) टैग भी प्राप्त है।
केसर एक बारहमासी पौधा है जो अपनी खुशबू और स्वाद के लिए मशहूर है। केसर को आमतौर पर लाल सोना कहा जाता है और इसका इस्तेमाल फूड प्रोसेसिंग, दवाइयों, कॉस्मेटिक्स, परफ्यूम और कपड़ों की रंगाई जैसे उद्योगों में किया जाता है। औषधीय गुणों के अलावा, केसर पारंपरिक रूप से मशहूर कश्मीरी खान-पान से जुड़ा रहा है और कश्मीर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करता है।
केसर दुनिया के सबसे महंगे मसालों में शामिल है। एक किलो केसर का बाजार भाव करीब 3.5 लाख रुपए है। पांपोर के किसानों के अनुसार, एक एकड़ के खेत में करीब 2.5 किलो की सीमित उत्पादकता है। लेकिन महंगे बाजार मूल्य के कारण यह पांपोर के किसानों की जीवनरेखा है।
जर्नल ऑफ फार्माेकोग्नोजी एंड फाइटोकेमिस्ट्री में 2018 में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर में 3,785 हेक्टेयर केसर का कुल रकबा है जिसमें 3,200 हेक्टेयर यानी करीब 85 प्रतिशत पुलवामा जिले में है। इस जिले में करीब 9,000 किसान इसकी खेती से जुड़े हैं।
पातालबाग के शत प्रतिशत किसान 2022 से पहले तक केसर की खेती से जुड़े थे। लेकिन 2022 के बाद करीब 20 प्रतिशत किसान सेब, आलूबुखारा जैसी फसलों की ओर मुड़ गए हैं। गांव के किसान इस तब्दीली के लिए बार-बार साल 2022 का जिक्र करते हैं, क्योंकि यही वह साल है जब उनके खेतों बीच लैंडफिल बनी और उनके बुरे दिन शुरू हुए। लैंडफिल से आसपास के केसर के खेत पूरी तरह तबाह हो गए हैं। लैंडफिल बनने के बाद यहां अचानक चूहों की भरमार हो गई है जो केसर के खेतों में जगह-जगह बिल बनाकर उसे तबाह कर रहे हैं।
मोहम्मद जब्बार के खेत भी 2022 में चूहों की वजह से खराब हुए तो उन्होंने केसर की खेती छोड़ दी। करीब दो साल तक उनके खेत खाली पड़े रहे। 2023 में उन्होंने अपने खेत में सेब की खेती शुरू की ताकि परिवार का पालन पोषण हो सके।
मोहम्मद जब्बार का खेत लैंडफिल से करीब 200 मीटर की दूरी पर है। अब उनके सेब के खेतों में भी चूहे पहुंचने लगे हैं। चूहों के अलावा बड़ी संख्या में लैंडफिल पर मंडरा रही चीलें भी सेब के खेतों को नुकसान पहुंचाने लगी हैं। चीलों द्वारा नुकसान पहुंचाए गए सेबों की फसल दिखाते हुए वह बताते हैं कि अब दिनरात खेतों पर रुककर उसकी रखवाली करनी पड़ती है।
लैंडफिल से आने वाली दुर्गंध से परेशानी का सबब बनी हुई है। कुछ दिन पहले उनके बेटे को बदबू से संक्रमण हुआ जो अब तक बीमार है। उनका बेटा सेब की रखवाली कर रही था। मोहम्मद जब्बार ने अपने खेतों में रस्सी बांधकर उनके पॉलीथीन बांध रखी हैं। इसे हिलाकर वह चीलों को भगाते हैं। इसके अलावा एक बाल्टी को ठंडे से पीटकर भी वह चीलों का भगाने का प्रयास करते हैं।
पातालबाग के निवासी राहिल रसीद कहते हैं कि डंपिंग साइट से करीब 300 मीटर के दायरे में आने वाले खेतों में अब केसर की खेती संभव नहीं है। गांव के करीब 800 परिवारों की आजीविका लैंडफिल से प्रभावित हो रही है। लैंडफिल के आसपास पातालबाग के अलावा चंदाहरा, सोंबुरा और कैंडीजाल गांव के लगभग 300 एकड़ खेत प्रभावित हुए हैं। वह बताते हैं कि करीब आठ एकड़ में फैली यह लैंडफिल खाईनुमा भूमि पर है और राष्ट्रीय राजमार्ग से कुछ कदमों की दूरी पर है।
राहिल के अनुसार, 2022 ये यहां लगातार कूड़ा डाला जा रहा है। रोज करीब 50 मिनी ट्रक कूड़ा पांपोर नगर से आ रहा है। ग्रामीणों ने इस मामले में कई बार प्रदर्शन किए, तहसीलदार और स्थानीय विधायक से मुलाकात की। राहिल के अनुसार, सभी ने हर बार लैंडफिल के अन्य विकल्प तलाशने का आश्वासन दिया लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ।
राहिल कहते हैं कि केसर के अधिकतर खेत ढलानदार होते हैं। ऊंचाई पर होने के कारण ऐसे ज्यादातर खेतों में दूसरी फसल संभव नहीं है। कुछ निचले खेतों में जहां पानी की सुविधा है, केवल वही वैकल्पिक फसल लगा सकते हैं।
गांव के एक अन्य किसान मोहम्मद मकबूल ने डाउन टू अर्थ को बताया कि लैंडफिल के नजदीक उनका 2 कैनाल (0.25 एकड़) खेत पूरी तरह खराब हो चुका है। यह खेत डेढ़ साल से पूरी तरह खाली पड़ा है। उनका एक एकड़ का अन्य लैंडफिल से करीब 500 मीटर दूर है। इसमें वह केसर की खेती कर रहे हैं लेकिन अब वहां भी चूहे पहुंचने लगे हैं। वह बताते हैं कि केसर के बीज में चीनी की मात्रा रहती है। इसी को खाने के लिए चूहे दूर तक पहुंच जाते हैं।
जम्मू-कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण कमिटी में क्षेत्रीय निदेशक सफीर हुसैन शाह से जब डाउन टू अर्थ ने इस मसले पर बात की तो उनका कहना था, “यह लैंडफिल अवैध है। हम इसकी जांच कर रहे हैं और पर्यावरण क्षतिपूर्ति की कार्रवाई कर रहे हैं।”
जम्मू-कश्मीर सूचना का अधिकार आंदोलन एवं क्लाइमेट एक्शन ग्रुप के संस्थापक राजा मुजफ्फर भट ने डाउन टू अर्थ को बताया कि वह इस मुद्दे को लेकर जल्द राष्ट्रीय हरित अभिकरण (एनजीटी) का रुख करने वाले हैं। हाल ही में ऐसा ही एक मामला वह एनजीटी में ले गए थे जिसमें अवंतीपोरा म्यूनिसिपल कमिटी पर 33.24 लाख रुपए की पर्यावरण क्षतिपूर्ति का आदेश हुआ है। वह बताते हैं कि पांपोर का मामला उससे भी गंभीर है क्योंकि यहां केसर के खेतों के बीचोंबीच कूड़ा डाला जा रहा है। रोजाना यहां दर्जनों ट्रक कूड़ा लेकर आ रहे हैं। इससे क्षेत्र में कुत्तों की संख्या बहुत बढ़ गई है। ये कुत्ते स्थानीय लोगों और मवेशियों पर हमले कर रहे हैं।
राजा मुजफ्फर भट का कहना है कि लैंडफिल से रिसने वाला लीचेट पर्यावरण पर बहुत बुरा असर डालेगा और जल, मिट्टी में प्रदूषण के साथ ही स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचाएगा। उनका यह भी कहना है कि इस मामले में जुर्माना लगना चाहिए और स्थानीय लोगों को वितरित किया जाना चाहिए क्योंकि उन्हें ही सबसे अधिक नुकसान पहुंच रहा है। जम्मू-कश्मीर अर्बन लोकल बॉडी के निदेशक फैयाज अहमद बांडे से जब डाउन टू अर्थ ने इस मामले में बात की उन्होंने केवल इतना ही कहा कि वह हाल ही में इस पद पर आए हैं और केसर के खेतों के बीच कचरा डंप करने की जानकारी उन्हें नहीं है। वह इस बारे में पता करेंगे। इस संबंध में पांपोर म्युनिसिपल कमिटी के कार्यकारी अधिकारी मोहम्मद इस्माइल मीर का कहना है, “सरकार ने ही कूड़ा डालने के लिए जमीन आवंटित की है। यह सरकारी जमीन है। अब वहां मशीन लग रही हैं। इससे यहां पड़े कचरे का जल्द वैज्ञानिक तरीके से निपटान हो सकेगा।”