पानी से भरा हुआ खेत, फोटो : वीकीमीडिया कॉमन्स 
कृषि

यूरोप के कृषि क्षेत्र को मौसमी आपदा से हर साल औसतन 28.3 अरब यूरो का नुकसान, बीमा से बाहर है 70 फीसदी क्षति : रिपोर्ट

यूरोप में जलवायु से जुड़ी कृषि क्षतियों का केवल 20 फीसदी से 30 फीसदी हिस्सा ही बीमा के दायरे में आता है

Vivek Mishra

खेती-किसानी पर जलवायु परिवर्तन का असर अब सीधा और काफी गंभीर होता जा रहा है और इसने किसानों को इस संकट से जूझने के लिए उन्हें अकेला छोड़ दिया है। सिर्फ विकासशील देश ही बीमा संकट से नहीं जूझ रहे बल्कि विकसित देशों का हाल भी बुरा है। यूरोप में सालाना सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि जैसी मौसमी आपदाओं के कारण फसल और मवेशी दोनों का बड़ा नुकसान होता है। विंडबना यह है कि करीब 70 फीसदी नुकसान के लिए किसान पूरी तरह अकेले पड़ जाते हैं यानी उनके पास न तो बीमा होता है और न ही कोई मुआवजा।

यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक (ईआईबी) और यूरोपीय आयोग की एक संयुक्त रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि यदि खेती को जलवायु जोखिमों से बचाना है, तो बीमा कवरेज को और मजबूत बनाना होगा।

रिपोर्ट के मुताबिक यूरोप के कृषि क्षेत्र को हर साल औसतन 28.3 अरब यूरो यानी करीब 2.55 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है, जो यूरोप के कुल कृषि और पशुपालन उत्पादन का लगभग 6 फीसदी है। इस रिपोर्ट के अनुसार अगर तत्काल उपाय नहीं किए गए तो 2050 तक यह नुकसान 42 फीसदी से बढ़कर 66 फीसदी तक पहुंच सकता है। यानी हर दशक में यह खतरा और गहराता जाएगा

रिपोर्ट में कहा गया है कि इतनी बड़ी क्षति के बावजूद यूरोप में जलवायु से जुड़ी कृषि क्षतियों का केवल 20 फीसदी से 30 फीसदी हिस्सा ही बीमा के दायरे में आता है। यानी 70 फीसदी नुकसान बीमित नहीं है।

ईआईबी की उपाध्यक्ष जेलसोमीना विग्लिओत्ती ने प्रेस में जारी अपने बयान में कहा, “जलवायु से जुड़े जोखिमों की वजह से खाद्य उत्पादन में भारी अनिश्चितता पैदा हो रही है। ऐसे में बीमा और जोखिम को कम करने वाली योजनाएं बेहद जरूरी हो गई हैं ताकि किसान निवेश कर सकें और टिकाऊ खेती को अपनाएं

रिपोर्ट के अनुसार, यूरोपीय संघ को कैटास्ट्रोफ बॉन्ड्स, सरकारी-निजी बीमा साझेदारी, और तेजी से राहत फंड जारी करने वाली व्यवस्थाएं विकसित करनी चाहिए, ताकि आपदा के समय त्वरित सहायता मिल सके।

इसके अलावा, सिर्फ बीमा पर निर्भर रहने के बजाय पूरे कृषि क्षेत्र को जलवायु के अनुरूप ढलने के उपाय भी करने होंगे। मसलन, सूखा-प्रतिरोधी फसलें, स्मार्ट सिंचाई और बेहतर फसल विविधता जैसे उपाय अपनाने होंगे।

क्रेडिट और निवेश का खतरा बढ़ा

यूरोपीय कृषि आयुक्त क्रिस्टोफ हेन्सन ने भी चिंता जताई है कि जलवायु जोखिमों के चलते बैंक भी खेती में निवेश करने से पीछे हट सकते हैं। “अगर नुकसान का बड़ा हिस्सा बीमा में नहीं है, तो बैंक कर्ज देने से हिचक सकते हैं। इसलिए मैं सभी सदस्य देशों से अपील करता हूं कि वे अपनी कॉमन एग्रीकल्चरल पॉलिसी (सीएपी) रणनीतिक योजनाओं में नए वित्तीय उपाय जोड़ें ताकि जलवायु जोखिम को पहले ही काबू किया जा सके।”

यह अध्ययन 27 यूरोपीय देशों के कृषि बीमा तंत्र की पहली विस्तृत समीक्षा है। इसे ईआईबी एडवाइजरी ने एफआई-कम्पॉस प्लेटफॉर्म के तहत तैयार किया है, जिसमें बीमा क्षेत्र की वैश्विक कंपनी हाउडन का सहयोग भी शामिल है।

इस रिपोर्ट के जारी होने के साथ ही ब्रसेल्स में 'कृषि क्षेत्र में बीमा और वित्तीय पहुंच' पर एक विशेष सम्मेलन भी आयोजित किया गया।

इस सम्मेलन में अब तक ईआईबी ने यूरोपीय कृषि क्षेत्र को तीन तरह से समर्थन दिया है। कृषि कारोबारों को सीधे ऋण और गारंटी, सिंचाई और सड़क जैसे ग्रामीण बुनियादी ढांचे को वित्तपोषण, कैसे सीएपी अनुदानों का इस्तेमाल करके अन्य स्रोतों से निवेश आकर्षित किया जाए, इस पर तकनीकी सलाह।

रिपोर्ट का स्पष्ट संदेश है कि केवल बीमा ही पर्याप्त नहीं है। भविष्य में जलवायु बदलाव के अनिश्चित प्रभावों से निपटने के लिए खेती को जलवायु अनुकूल बनाना होगा। इसके लिए यूरोप को नीतिगत, वित्तीय और तकनीकी, तीनों मोर्चों पर तैयार रहना होगा।