पलायन की तैयारी: हमीरपुर जिले के राठ कस्बे में प्राइवेट बस का इंतजार करते मजदूर। फोटो: अमन गुप्ता 
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आर्थिक सर्वेक्षण 2025-2026 : शहर अब ग्रामीण पलायन का बोझ नहीं उठा सकते, देश की दो तिहाई आबादी अब भी गांवों में  

ग्रामीण अर्थव्यवस्था पुनर्जीवन के जरिए पलायन की समस्या का निदान ढूंढ रही सरकार

Vivek Mishra

देश की दो तिहाई आबादी अब भी गांवों में गुजर-बसर करती है लेकिन शहरों की तरफ आजीविका और बेहतर जीवन जैसे विविध कारणों से पलायन की बाट जोह रहे ग्रामीणों के लिए अब शहर में पलायन का रास्ता संकरा हो गया है। यह बात आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कही गई है। इतना ही नहीं, सरकार का मानना है कि गांवों से खासतौर से युवाओं का शहर की तरफ पलायन बुजुर्गों को अकेला छोड़ रहा है। इस पलायन को रोकने के लिए  ग्रामीण अर्थव्यवस्था को फिर से जिंदा करना होगा।  

इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक, "शहरी भारत और शहरों के आसपास के क्षेत्र (पेरी-अर्बन इलाके) बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, सेवाएं, मनोरंजन और बेहतर जीवन की धारणा की तलाश में आने वाले प्रवासियों को आकर्षित करते हैं। साथ ही शहर में रहना सफलता का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, शहर अपनी क्षमता की सीमा तक पहुंचते दिख रहे हैं और लगातार पलायन टिकाऊ नहीं है, जबकि लगभग 65 प्रतिशत आबादी अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। इस ग्रामीण-शहरी बदलाव के दुष्प्रभाव भी हैं। जब युवा काम की तलाश में शहरों की ओर जाते हैं तो बुजुर्गों को मिलने वाला सहारा कम हो जाता है, जिससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।" 

मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टिस) के चांसलर प्रोफेसर धीरेंद्र पाल सिंह ने  कहा "ग्रामीण पलायन के कारण शहरों पर दबाव है यह बात सही है, लेकिन ग्रामीण पलायन को रोक पाना असंभव सा है। गांवों में  बुनियादी संरचनाओं का घोर अभाव है, इतनी जल्दी उस खाई को भरना मुश्किल है। इसके अलावा, गांवों में मौजूद आजीविका के साधन, खासतौर से खेती-किसानी अब मृतप्राय है। इसके जरिए आजीविका चलाना भी मुश्किल है। शहर और गांव के आयस्तर भी बिल्कुल अलग हैं। शहरों में बेहतर आय की आस होती है, जो गांव में मिलना मुश्किल है। इसलिए शहरों में गांवों से होने वाला पलायन नहीं रुकेगा। "  


वहीं, आर्थिक सर्वेक्षण में  ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए  समावेशी ग्रामीण विकास की बात की गई है और संकटग्रस्त शहरी पलायन को संबोधित करने के लिए  स्थानीय संस्थाओं को मजबूत करने, शिक्षा और स्वास्थ्य तक पहुंच सुधारने, उद्यमिता और नवाचार को बढ़ावा देने, साझा संसाधनों को संरक्षित करने और सांस्कृतिक ज्ञान और समुदाय के गौरव को सुदृढ़ करने की बात कही गई है।  वहीं, सरकार ने गरीबी को कम करने के लिए दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) जैसी योजनाओं पर भरोसा जाताया है। इसके तहत दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना (डीडीयू-जीकेवाई)  जो कि एक कौशल विकास और प्लेसमेंट पहल है। यह  एक राज्य-निर्मित योजना है, जिसे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप  मोड में लागू किया जा रहा है और यह मांग-आधारित लक्ष्य अनुमोदन प्रक्रिया पर आधारित है। यह कार्यक्रम अन्य कौशल प्रशिक्षण योजनाओं से अलग है क्योंकि यह आर्थिक रूप से कमजोर ग्रामीण युवाओं पर केंद्रित है और स्थायी रोजगार सुनिश्चित करने के लिए पोस्ट-प्लेसमेंट ट्रैकिंग, कर्मचारियों की बने रहने की दर और करियर प्रगति पर विशेष जोर देता है।

इसके अलावा सर्वेक्षण में ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (आरएसईटीआई) कार्यक्रम के तहत देश के प्रत्येक जिले में समर्पित कौशल बुनियादी ढांचा तैयार करने की बात की है, ताकि विशेष रूप से गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) और  अंत्योदय योजना से जुड़े परिवारों के ग्रामीण युवाओं का कौशल विकास किया जा सके और उन्हें उद्यमिता विकास की दिशा में तैयार किया जा सके। 

सरकार के मुताबिक, वर्तमान में, 33 राज्यों/संघ शासित प्रदेशों के 616 जिलों में 629 आरएसईटीआईएस  संचालित हैं, जिनका समर्थन 25 वित्तीय संस्थान करते हैं और यह एक पैन-इंडिया नेटवर्क बनाते हैं जो कौशल विकास और आजीविका संवर्धन केंद्रों के माध्यम से चलाया जा रहा है। 

प्रोफेसर सिंह बताते हैं कि भले ही सरकारें गांवों में कौशल विकास की बात करें लेकिन सच्चाई यह है कि ज्यादातर कौशल केंद्र शहरों में ही स्थित हैं। पलायन के प्रमुख वजह जैसे एजुकेशन, हॉस्पिटल  सभी शहरों में ही मौजूद हैं। 

बीपीएल परिवारों का नाम, लेकिन बिना गिनती कैसे होगा कल्याण

गौर करने लायक है कि सरकार ने आर्थिक सर्वेक्षण में बीपीएल परिवारों का नाम लिया है, जबकि बीपीएल यानी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वालों की दशकों से  न तो कोई गिनती है और न ही कोई सर्वे।  गरीबी रेखा और गरीबी अनुपात का अनुमान लगाने के लिए राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) ने 2009-10 और फिर 2011-12 में गरीबी का सर्वे (एनएसएसओ 68वां राउंड) किया था। ऐसे सर्वेक्षण सामान्यतः पांच वर्ष पर किए जाते हैं। इस सर्वेक्षण के संक्षिप्त परिणाम 20 जून 2013 को जारी किए गए थे।

एनएससओ ने 1.2 लाख परिवारों के खर्च को सारणीबद्ध किया था। चूंकि इन परिवारों में विभिन्न संख्या में सदस्य होते हैं, इसलिए तुलना के उद्देश्य से एनएसएसओ प्रत्येक परिवार के खर्च को सदस्य संख्या से विभाजित करता है, ताकि प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग खर्च (एमपीसीई) का निर्धारण किया जा सके। इसे मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग खर्च (एमपीसीई) कहा जाता है। 2011-12 में तेंदुलकर पद्धति के अनुसार यह सर्वे किया गया।

इस सर्वे के मुताबिक राष्ट्रीय गरीबी रेखा प्रति व्यक्ति प्रति माह 816 रुपए और शहरी क्षेत्रों में 1,000 रुपए प्रति व्यक्ति प्रति माह अनुमानित की गई। वहीं, इस आधार पर अगर एक परिवार में पांच लोग हैं, तो ग्रामीण क्षेत्रों में उस परिवार के लिए गरीबी रेखा 4,080 रुपए प्रति माह और शहरी क्षेत्रों में 5,000 रुपए प्रति माह तय की गई। इस सर्वे में बताया गया कि करीब 27 करोड़ लोग देश में गरीबी रेखा से नीचे हैं। इनमें 21.67 करोड़ (लगभग) ग्रामीण और 5.31 करोड़ लगभग शहरों में मौजूद हैं।

यह आंकड़ा दशकों पुराना है और नया कोई सरकारी आंकड़ा मौजूद नहीं है।

ताजा आर्थिक सर्वेक्षण में ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने और स्वयं सहायता समूहों को मजबूत करने की बात कही है लेकिन शायद यह संपूर्ण रोजगार का समाधान नहीं हैं। सर्वेक्षण के ही मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार ग्रामीण पलायन का एक बड़ा कारण है, लेकिन केवल स्थानीय आजीविका के अवसर पैदा करना आत्मनिर्भर गांव बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।