इलस्ट्रेशन: योगेन्द्र आनंद / सीएसई
कृषि

13 राज्य, 13 रिपोर्टर: जानवरों से अपनी फसलें बचाने के लिए संघर्ष करते किसान, डाउन टू अर्थ की विशेष रिपोर्ट

पूरे भारत में जंगली और आवारा जानवरों के साथ टकराव बहुत तेजी से बढ़ रहा है। इस वजह से परेशान होकर किसान अब खेती छोड़ रहे हैं। संरक्षण नीतियों को अब सिर्फ जानवरों की सुरक्षा के दायरे से आगे बढ़ाना होगा, ताकि इंसानों और जानवरों के बीच एक व्यावहारिक सह-अस्तित्व को फिर से बहाल किया जा सके

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मध्य प्रदेश के वन विभाग ने पिछले साल नवंबर में पूरे प्रदेश के संरक्षित क्षेत्रों में 900 से अधिक काले हिरण और नीलगाय भेजे। यह कदम भारत में वन्यजीव स्थानांतरण के अब तक के सबसे बड़े प्रयासों के तहत उठाए गए थे। इसके लिए विशेष उपकरणों से लैस एक हेलीकॉप्टर एक महीने से अधिक समय तक शाजापुर जिले के गांवों के ऊपर कम ऊंचाई पर उड़ता रहा। इस हेलीकॉप्टर की मदद से जानवरों को घेरकर अस्थायी बाड़ों में लाया गया, जिसके बाद उन्हें रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व, नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य, गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य और कूनो नेशनल पार्क भेजा गया। यह पूरा अभियान लंबे समय से चली आ रही एक समस्या को दूर करने के लिए चलाया गया था। डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर बीरेंद्र कुमार पटेल बताते हैं कि शाजापुर के किसान एक साल से अधिक समय से इन उत्पाती वन्यजीवों के कारण फसलों के भारी नुकसान की शिकायत कर रहे थे। उनका अनुमान है कि इस क्षेत्र में लगभग 15,000 एंटीलोप घूम रहे थे। इनमें से ज्यादातर ऐसे राजस्व क्षेत्र में सक्रिय थे, जहां जंगल का दायरा बेहद कम है।

डाउन टू अर्थ ने एक महीने बाद जब इन गांवों का दौरा किया तो पाया कि यह राहत बहुत कम समय के लिए ही मिली थी। किसानों का कहना है कि सिर्फ काले हिरण और नीलगाय ही खेत खराब नहीं करते। इनके अलावा भी कई तरह के जानवर हैं जो लगातार खेतों पर धावा बोलते हैं। यह सिलसिला अक्सर चौबीसों घंटे चलता रहता है। शाजापुर की कालापीपल तहसील के अरनिया कलां गांव के किसान सुरेश परमार कहते हैं, “हमारी फसलों को मोर, हिरण, मकाक बंदर और जंगली सुअरों के साथ ही आवारा मवेशी भी बार-बार बर्बाद करते हैं।” सीहोर तहसील के पीलिया गांव के राकेश परमार 12 हेक्टेयर भूमि पर खेती करते हैं। उनका कहना है कि जानवर हर मौसम में कभी भी खेतों में घुस आते हैं। वे चना, आलू, मूंगफली, मक्का, मसूर, सोयाबीन, बाजरा और यहां तक कि गेहूं जैसी फसलों को भी नष्ट कर देते हैं। इसी गांव के अवध परमार का कहना है कि फसलों को 40 प्रतिशत या उससे अधिक का नुकसान हो जाता है। यह नुकसान इस बात पर निर्भर करता है कि फसल किस चरण में है और किस जानवर ने उस पर हमला किया है। परमार बताते हैं, “जंगली सूअर शाम के समय आते हैं। वे मिट्टी खोदकर पूरी फसल नष्ट कर देते हैं। वे भले ही आलू न खाएं, लेकिन पूरे खेत में उन्हें उखाड़कर फेंक देते हैं।” हिरण, नीलगाय और अन्य खुरदार जानवर बड़े-बड़े झुंडों में आते हैं। वह कहते हैं, “आप खुद सोचिए, जब 50 से 100 जानवर फसलों को रौंदते हैं, तो महज आधे घंटे में 4 हेक्टेयर खेत पूरी तरह सपाट हो जाता है।”

इस संघर्ष की गंभीरता को समझने के लिए डाउन टू अर्थ ने एक दर्जन राज्यों का दौरा किया। लेकिन हर जगह फसलों की बर्बादी, छिनती आजीविका और बढ़ते कर्ज की एक जैसी ही कहानी सामने आई। कई जगहों पर किसान खेती ही छोड़ रहे हैं।

मध्य प्रदेश के सूखाग्रस्त बुंदेलखंड इलाके में किसानों के बीच भारी निराशा है। छतरपुर जिले के पठा गांव के रहने वाले चंदन सिंह राजपूत ने कसम खाई है कि अगर वे इस सीजन में अपनी फसल नहीं बचा पाए तो खेती छोड़ देंगे। इसके बाद वह मजदूरी की तलाश में दिल्ली चले जाएंगे। राजपूत ने पास के एक गांव में 20 बीघा जमीन लीज पर ली है। यह करीब तीन हेक्टेयर से थोड़ी ज्यादा जमीन है। इसके लिए वह हर साल 85,000 रुपए किराया देते हैं। फसल को बचाने के लिए वह खेत में ही एक अस्थायी झोपड़ी बनाकर रहते हैं। वे दिन-रात फसल की रखवाली करते हैं। पिछली रात आए जानवरों के खुरों के ताजा निशान और लीद दिखाते हुए वह कहते हैं, “एक छोटी सी चूक का मतलब है पूरी बर्बादी।” पिछले खरीफ सीजन में उन्होंने पूरे 20 बीघा में तिल बोया था। लेकिन उन्हें बमुश्किल 400 किलो ही उपज मिल सकी। इसके बाद रबी के सीजन में मटर की पैदावार भी सिर्फ 1,000 से 1,200 किलो ही हुई। उनका अनुमान है कि अगर जानवरों ने नुकसान न पहुंचाया होता तो पैदावार पांच गुना ज्यादा होती। इस नुकसान से उन्हें 1.5 लाख रुपए की चपत लगी। इसमें मटर की खेती पर खर्च हुए 55,000 रुपए भी शामिल हैं। इसके बाद साल 2025 में भारी बारिश ने उनकी तिल की फसल को बर्बाद कर दिया। वह कहते हैं, “शहर में दिहाड़ी मजदूरी करके कम से कम मैं रात में चैन से सो तो सकूंगा।”

छतरपुर के ही एक दूसरे गांव परई के रहने वाले बाबूलाल पाल एक बड़ी बात बताते हैं। उनका कहना है कि पिछले साल वहां के एक-चौथाई (25 प्रतिशत) किसानों ने फसल की कटाई ही नहीं की। खेतों में इतनी कम फसल बची थी कि उन्होंने कटाई करना जरूरी ही नहीं समझा। अब हालत यह है कि बहुत कम लोग जमीन लीज पर लेने या बटाई पर खेती करने को तैयार हैं। यहां गांव से पलायन बहुत तेजी से बढ़ा है। लगभग 80 प्रतिशत परिवारों में से कम से कम एक सदस्य बाहर जा चुका है। इस वजह से घरों में सिर्फ बुजुर्ग ही पीछे बचे हैं। पाल के 80 साल के पिता भवानीदीन आज भी खेतों की रखवाली करते हैं। अपनी फसलों को बचाने के लिए यह परिवार पिछले पांच सालों से खेत में ही एक अस्थायी झोपड़ी बनाकर रह रहा है।

फसलों में बदलाव

नुकसान कम करने की कोशिश में कुछ जगहों पर किसान फसलों का पैटर्न बदल रहे हैं। लेकिन इसमें उन्हें बहुत कम सफलता मिल रही है। पाल बताते हैं कि उनके गांव परई में कभी अरहर और ज्वार जैसी नकदी फसलें उगाई जाती थीं। ये फसलें सूखा झेल सकती थीं और प्रमुख फसलें थीं। लेकिन अब ज्यादातर किसानों ने इन्हें उगाना बिल्कुल बंद कर दिया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये फसलें जंगली सूअर और नीलगाय को बहुत ज्यादा आकर्षित करती हैं।

मध्य प्रदेश के छतरपुर के झिन्ना गांव के किसान खेतों में दिनरात रुक कर फसलों को बचाने का प्रयास करते हैं

बिहार के गोपालगंज जिले में शाहपुर पंचायत के रहने वाले अब्दुल मन्नान बताते हैं कि पिछले पांच से सात सालों में वहां के किसानों ने मुनाफा देने वाली फसलों से तौबा कर ली है। उन्होंने मक्का, दाल, अरहर, शकरकंद और सब्जियों को उगाना पूरी तरह बंद कर दिया है। अब किसान इनकी जगह गेहूं और धान की खेती करने लगे हैं। नीलगाय और जंगली सूअर आमतौर पर इन फसलों से दूर रहते हैं। लेकिन गेहूं और धान जैसी मुख्य फसलों से इतनी कमाई नहीं हो पाती कि घर का सालभर का खर्च चल सके। कमाई घटने के कारण बहुत से लोग इस नुकसान की भरपाई के लिए कर्ज लेने को मजबूर हैं। इसकी वजह से पूरे इलाके में कर्ज का जाल लगातार गहराता जा रहा है।

ओडिशा के तटीय जिले गंजाम में रंगईलुंडा के किसानों ने अब पारंपरिक धान की खेती छोड़ दी है। वे इसकी जगह केवड़ा (स्क्रू पाइन) उगाने लगे हैं। यह कांटेदार और ताड़ जैसा दिखने वाला एक पौधा है। इसके फूलों का इस्तेमाल आयुर्वेद और तरह-तरह के पकवानों के लिए एसेंशियल ऑयल बनाने में होता है। खेती में आया यह बदलाव बाजार के मुनाफे की वजह से नहीं, बल्कि अपना अस्तित्व बचाने की मजबूरी में हुआ है। दंकलपाडू गांव के किसान सुधाकर रेड्डी कहते हैं, “जंगली सूअर सालों से हमारी फसलों को बर्बाद कर रहे हैं। कई बार तो हमारी खेती की लागत तक नहीं निकल पाती।” सामाजिक कार्यकर्ता एन डंबरू रेड्डी बताते हैं कि हताशा में आकर पिछले साल के अंत और इस साल की शुरुआत में कई गांवों के किसानों ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने मिलकर सामूहिक रूप से “क्रॉप हॉलिडे” यानी फसल बंदी का ऐलान कर दिया और खेत खाली छोड़ दिया।

पहाड़ी राज्यों में यह समस्या बेहद गंभीर है। यहां के किसान पहले से ही कई तरह की बड़ी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। उन्हें अत्यधिक बारिश, बढ़ते तापमान और भूस्खलन का सामना करना पड़ रहा है। इसके साथ ही कृषि योग्य भूमि लगातार सिकुड़ती जा रही है और युवा भी तेजी से पलायन कर रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश में बागवानी राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह राज्य की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में लगभग 20 प्रतिशत का योगदान देती है। लेकिन अब यहां तोते एक नई और अप्रत्याशित मुसीबत बनकर उभरे हैं। शिमला जिले के थियोग में सेब की खेती करने वाले रोहित शर्मा का कहना है कि जैसे ही सेब का आकार एक टेनिस बॉल जितना होता है, तोते उन पर हमला करना शुरू कर देते हैं। वह कहते हैं, “हमें फसल की कटाई से पहले करीब छह हफ्तों तक लगातार बागों की रखवाली करनी पड़ती है। अकेले तोते ही कुल फसल का 5 से 7 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद कर देते हैं।” ये पक्षी सुबह-सुबह और ढलती शाम के समय सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं। इस वजह से बाग मालिकों को लगभग चौबीसों घंटे पहरा देने के लिए अलग से मजदूर लगाने पड़ते हैं। इससे खेती की लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। इसी वजह से किसान अब ऐसी फसलों की तरफ बढ़ रहे हैं जो थोड़ी सुरक्षित हों। वे अब हल्दी, अरबी, भिंडी और अदरक उगाने लगे हैं। हालांकि, इन बदलावों से भी उन्हें केवल आंशिक राहत ही मिली है। मंडी जिले के एक किसान अजय ठाकुर बताते हैं कि पिछले दो दशकों में यह संकट बहुत तेजी से बढ़ा है। वह कहते हैं, “बंदरों और जंगली सूअरों की वजह से होने वाली बर्बादी इतनी बड़ी है कि जमीन को खाली छोड़ देना ही ज्यादा ठीक लगता है। उसमें जोखिम कम है।”

साल 2025 में पुणे के गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स एंड इकोनॉमिक्स के शोधकर्ताओं ने एक बड़ा सर्वे किया है। यह भारत में वन्यजीवों के कारण खेती को होने वाले आर्थिक नुकसान का अंदाजा लगाने के लिए इतने बड़े पैमाने पर किया गया यह पहला सर्वेक्षण था। इसके लिए शोधकर्ताओं ने महाराष्ट्र के 1,200 से अधिक किसानों से बात की। इस अध्ययन में उन्होंने मकाक बंदर, काले हिरण, जंगली सूअर, हाथी और तोतों (पैराकीट्स) द्वारा पहुंचाए गए नुकसान को दर्ज किया। उनकी रिपोर्ट “ह्यूमन-वाइल्डलाइफ कॉन्फ्लिक्ट्स: एन एस्टिमेशन ऑफ नेट एग्रीकल्चरल लॉसेस इन महाराष्ट्र” के मुताबिक, राज्य में हर साल खेती को 10,000 से 40,000 करोड़ रुपए का नुकसान होता है। हालांकि, इस रिपोर्ट के लेखकों का मानना है कि वास्तविक नुकसान इन आंकड़ों से कहीं ज्यादा है। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि जानवरों के हमलों के कारण 62 प्रतिशत किसानों ने अपनी खेती का दायरा छोटा कर लिया है। वहीं, 54 प्रतिशत किसान ज्यादा मुनाफा देने वाली कोई न कोई बड़ी फसल उगाना पूरी तरह छोड़ चुके हैं। किसानों के लिए बेमौसम बारिश और फसलों की कम कीमतें तो बड़ी मुसीबतें हैं ही, लेकिन वे वन्यजीवों से होने वाले नुकसान को अपनी सबसे गंभीर समस्या मानते हैं। इनमें से एक-तिहाई किसानों का कहना है कि उनकी आमदनी घटने की मुख्य वजह यही है।

उत्तराखंड ग्रामीण विकास एवं पलायन निवारण आयोग के एक सर्वे में भी यही वजह सामने आई है। इस सर्वे के अनुसार, वन्यजीवों से होने वाला नुकसान उन सबसे मुख्य वजहों में से एक है जिसके कारण किसान खेती छोड़ रहे हैं। आयोग ने अप्रैल 2026 में जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि जंगली जानवरों की वजह से होने वाला नुकसान कृषि को भारी चोट पहुंचा रहा है। यही नुकसान लोगों को अपना घर-बार छोड़कर पलायन करने के लिए मजबूर कर रहा है। आयोग ने अपनी 2018 की अंतरिम रिपोर्ट के आंकड़ों का हवाला दिया है। इसके मुताबिक, पूरे राज्य में पलायन की पांचवीं सबसे बड़ी वजह वन्यजीवों से होने वाला नुकसान ही है। पलायन के कुल मामलों में से 5.61 प्रतिशत मामले इसी वजह से जुड़े हैं। पहाड़ी जिलों में इस संकट का बेहद गंभीर असर देखा गया है। वन्यजीवों के नुकसान के कारण सबसे ज्यादा पलायन अल्मोड़ा जिले में दर्ज किया गया, जो 10.99 प्रतिशत था। इसके बाद चंपावत में 6.65 प्रतिशत, नैनीताल में 6.38 प्रतिशत और पौड़ी गढ़वाल में 6.27 प्रतिशत पलायन दर्ज किया गया।

पिछले साल अक्टूबर में कर्नाटक के सरगुर तालुक के बडागलापुरा गांव में माधव गौड़ा पर एक बाघ ने तब हमला किया जब वह बांदीपुर टाइगर रिजर्व से सटे जंगल वाले इलाके में अपने खेत में काम कर रहे थे। इस हमले में उनकी आंखें चली गईं

जानलेवा होता टकराव

जिन जिलों में वन्यजीवों की तादाद बहुत ज्यादा है, वहां यह समस्या और गंभीर है। खासकर जंगलों के किनारे बसे इलाकों में जंगली जानवरों के साथ टकराव लगातार बढ़ रहा है। इस वजह से अब किसान अपने खेतों में जाने से भी कतरा रहे हैं।

कर्नाटक के सरगुर तालुक में एक गांव है बडगलापुरा। यहां रहने वाले माधव गौड़ा पिछले साल अक्टूबर में अपने खेत पर काम कर रहे थे। वह पिछले कई दशकों से वहां इसी तरह काम करते आ रहे थे। उनका यह खेत बांदीपुर टाइगर रिजर्व की सीमा से लगे जंगली इलाके के पास है। गांव के लोगों के मुताबिक, अचानक एक बाघ ने उनके चेहरे पर झपट्टा मार दिया। उनकी चीख सुनकर जब तक पड़ोसी वहां पहुंचे, तब तक बाघ ने उनका चेहरा बुरी तरह नोच डाला था। उनकी दोनों आंखें इस कदर खराब हो चुकी थीं कि उन्हें ठीक करना अब मुमकिन नहीं था। उनकी पत्नी इंद्राणी कहती हैं, “हमने कभी नहीं सोचा था कि अपनी ही जमीन पर जाने की वजह से उनकी आंखें चली जाएंगी। अब घर में कमाई का कोई जरिया नहीं बचा है। मैं उन्हें एक घंटे के लिए भी अकेला नहीं छोड़ सकती।” उनके बच्चे अभी छोटे हैं। अब वे ही हाथ पकड़कर अपने पिता को रास्ता दिखाते हैं। राज्य सरकार ने माधव गौड़ा की इस चोट को स्थायी विकलांगता (परमानेंट डिसेबिलिटी) माना है। सरकार ने उनके लिए मुआवजे का ऐलान किया है और जीवनभर मेडिकल सपोर्ट का वादा किया है। इस घटना के अगले दो हफ्तों के भीतर सरगुर इलाके में बाघ के हमलों से दो और लोगों की मौत हो गई। अब इस पूरे क्षेत्र के किसान सुबह-सुबह जल्दी खेतों में काम पर जाने से बच रहे हैं। वहीं, बच्चों ने भी अब अकेले पैदल स्कूल जाना बंद कर दिया है।

वन विभाग के रिकॉर्ड दिखाते हैं कि साल 2024-25 में पूरे राज्य में वन्यजीवों के साथ टकराव की 35,500 से ज्यादा घटनाएं हुईं। इनमें से करीब 22,000 मामले हाथियों से जुड़े थे। इस टकराव का भौगोलिक दायरा काफी बड़ा है। यह नीलगिरी बायोस्फीयर के असर वाले जिलों मैसूरु और चामराजनगर तक फैला हुआ है। इसके साथ ही बांदीपुर-नागरहोल-बीआरटी (बिलीगिरी रंगास्वामी टेम्पल टाइगर रिजर्व) कॉरिडोर भी इससे प्रभावित है। चिक्कमगलुरु और कोडागु के कॉफी और सुपारी उत्पादक क्षेत्र, कुद्रेमुख-शृंगेरी का इलाका और हासन, रामनगर व तुमकुरु के हिस्से भी इसकी चपेट में हैं।

महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित जुन्नर गन्ने की पैदावार के लिए जाना जाता है। यहां के किसानों ने तेंदुओं के जानलेवा हमलों से बचने का एक तरीका ढूंढ निकाला है। यहां के साप्ताहिक बाजारों में जगह-जगह लोहे के नुकीले कांटों वाले पट्टे बिकते दिखाई देते हैं। ये पट्टे गांव के कुत्तों को तेंदुओं के हमलों से बचाने के लिए बनाए गए हैं। लेकिन अब एक नई और हैरान करने वाली बात सामने आई है। कुछ किसान अब खुद भी इन पट्टों को अपनी गर्दन पर पहनने लगे हैं। इसकी शुरुआत सबसे पहले जुन्नर वन विभाग ने की। इस इलाके में तेंदुओं के हमले अचानक बहुत बढ़ गए थे। अक्टूबर 2024 में वन विभाग ने प्लास्टिक के हल्के और नुकीले कांटों वाले नेक गार्ड बांटने शुरू किए। वन अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने हमलों के तरीके को देखकर यह डिजाइन तैयार किया था। तेंदुए ज्यादातर मामलों में शिकार को गर्दन से ही दबोचते हैं। इन पट्टों के कांटों की लंबाई इस तरह रखी गई थी कि वे तेंदुए के दांतों के वार से ज्यादा गहरे हों। साथ ही इन्हें इतना हल्का बनाया गया कि किसान खेतों में काम करते समय इन्हें आसानी से पहन सकें। तब से लेकर अब तक ऐसे 3,000 से ज्यादा नेक गार्ड बांटे जा चुके हैं। पिंपरखेड़ गांव के एक निवासी कहते हैं कि अपनी जान की सुरक्षा के लिए वन विभाग दिए गए द्वारा प्लास्टिक से बने नेग गार्ड पर कौन भरोसा करेगा? यही वजह है कि कई लोगों ने इसकी जगह कुत्तों को पहनाए जाने वाले लोहे के भारी पट्टों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।

स्थानीय लोगों का मानना है कि जुन्नर-नारायणगांव इलाके के तेंदुओं ने कभी जंगल देखा ही नहीं है। ये तेंदुए गन्ने के घने खेतों के बीच ही पले-बढ़े हैं। वे इंसानों के बिल्कुल करीब रहते हैं और जिंदा रहने के लिए गांव के कुत्तों, बकरियों और मुर्गियों का शिकार करते हैं। पिछले पांच सालों में इंसानों पर तेंदुओं के हमले बहुत तेजी से बढ़े हैं। साल 2021-22 में इस इलाके में ऐसा केवल एक हमला हुआ था। लेकिन साल 2024-25 में यह संख्या बढ़कर 9 हो गई। ये हमले अपने दायरे और समय, दोनों ही मामलों में बहुत हैरान करने वाले हैं। पिछले 25 सालों में इस पूरे इलाके में तेंदुओं के कुल 768 हमले दर्ज किए जा चुके हैं। इनमें से कई हमले दिन के उजाले में भी हुए हैं। कुछ महीने पहले ही ओटुर के पास एक तेंदुए ने एक मोटरसाइकिल सवार को बाइक से नीचे गिरा दिया था। सहायक वन संरक्षक स्मिता राजहंस बताती हैं, “दिन के समय एक के बाद एक ऐसे हमले होना असामान्य है। तेंदुए आमतौर पर रात के समय ही बाहर निकलते हैं।” स्थानीय लोगों का कहना है कि तेंदुओं को लेकर पुरानी धारणाएं अब टूट चुकी हैं। पहले माना जाता था कि तेंदुए इंसानों से बचते हैं और सिर्फ छोटे जानवरों को निशाना बनाते हैं, लेकिन अब ऐसा बिल्कुल नहीं है। इसी साल मार्च में जुन्नर वन विभाग ने एक बड़ा कदम उठाया। उन्होंने 20 तेंदुओं को यहां से हटाकर गुजरात के जामनगर जिले में भेज दिया है। इन तेंदुओं को वहां के ग्रीन्स जूलॉजिकल रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर में शिफ्ट किया गया है, जिसे आमतौर पर वंतारा के नाम से जाना जाता है।

जानवरों का बदलता व्यवहार

डाउन टू अर्थ ने इस बारे में कई पर्यावरणविदों और शोधकर्ताओं से बात की। उन्होंने इन बढ़ते हमलों के कई कारण बताए हैं। इन कारणों में पर्यावरण में बदलाव, पर्यटन और जानवरों के रहने की जगह का कम होना शामिल है। साथ ही, जलवायु परिवर्तन और खुद जानवरों के बदलते व्यवहार को भी इसकी बड़ी वजह माना जा रहा है।

केरल के पर्यावरण कार्यकर्ता और वायनाड प्रकृति संरक्षण समिति के अध्यक्ष एन बादुशा कहते हैं कि संरक्षित जंगलों के अंदर जानवरों के लिए चारे और पानी की भारी कमी हो गई है। वह बताते हैं, “घास के मैदान अब गायब हो चुके हैं। पानी के स्रोत भी सूख गए हैं। सेना स्पेक्टेबिलिस और लैंटाना जैसी बाहरी नुकसानदेह झाड़ियों ने वहां के स्थानीय पेड़-पौधों को पूरी तरह दबा दिया है। हाथी अपनी मर्जी से इंसानों से टकराव के लिए जंगल से बाहर नहीं आते। वे बाहर इसलिए आते हैं क्योंकि अब जंगलों में उनका पेट नहीं भर पाता।” दूसरी तरफ, पर्यटन ने भी जंगलों पर एक अलग तरह का दबाव बढ़ा दिया है। इसे पर्यावरण के अनुकूल बताकर बढ़ावा दिया जाता है, लेकिन इसने कई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। अब जंगलों में नाइट सफारी होने लगी है। वहां चारों तरफ तेज रोशनी वाले रिसॉर्ट बन गए हैं। जानवरों के आने-जाने के रास्तों से लगातार गाड़ियां गुजरती हैं। इसके अलावा वहां फेंका जाने वाला खाने-पीने का कचरा भी जानवरों को अपनी तरफ खींचता है। ये सभी चीजें मिलकर वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार को बुरी तरह बिगाड़ रही हैं।

महाराष्ट्र के पुणे जिले के जुन्नर तालुका में किसान गन्ने की कटाई के मौसम में तेंदुए के हमलों से बचने के लिए धातु के नुकीले कांटों वाले कॉलर पहनते हैं

राजस्थान और बुंदेलखंड के इलाकों में आवारा मवेशी लगातार खेतों में घुसकर फसल बर्बाद कर रहे हैं। यहां के किसान इसके लिए प्रशासन की लापरवाही को तो कोसते ही हैं, साथ ही सरकारी नीतियों को भी जिम्मेदार मानते हैं। दरअसल, राजस्थान गोवंश पशु अधिनियम को साल 2018 में संशोधित किया गया था। इस नए नियम ने मवेशियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने और उनकी बिक्री पर बहुत कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। इस कानून के दायरे में सांड, बैल और बछड़े आते हैं, जबकि भैंसों को इससे बाहर रखा गया है। अब हालत यह है कि मवेशी ले जा रही गाड़ियों को केवल शक के आधार पर भी जब्त किया जा सकता है और उनके ड्राइवरों को गिरफ्तार किया जा सकता है। किसानों का कहना है कि करीब दस साल पहले तक वे पशु मेलों में दूसरे राज्यों के खरीदारों को अपने मवेशी बेच दिया करते थे। इससे उन्हें कुछ कमाई भी हो जाती थी और मवेशियों की संख्या भी काबू में रहती थी। लेकिन अब वे सारे रास्ते बंद हो चुके हैं। ऐसे में जो पशु दूध नहीं देते या किसी काम के नहीं रह जाते, उन्हें खुला छोड़ देना ही किसानों के लिए सबसे आसान रास्ता बन गया है।

बुंदेलखंड एक सूखाग्रस्त इलाका है। यहां मवेशियों को खुला छोड़ने की पुरानी परंपरा है। स्थानीय भाषा में इसे अन्ना प्रथा कहा जाता है। इसकी शुरुआत चारे की लगातार होने वाली कमी की वजह से हुई थी। उत्तर प्रदेश में बांदा के प्रगतिशील किसान और आवर्तनशील खेती करने वाले प्रेम सिंह कहते हैं कि अन्ना प्रथा एक समय में पशु प्रबंधन का नायाब तरीका थी। लेकिन जमीन के इस्तेमाल में आए बदलावों ने इस स्थिति को बिगाड़ दिया है। उनका कहना है कि 1960 के दशक में 25-30 प्रतिशत चारागाह जमीनों को वेस्टलैंड घोषित कर पट्टे पर दे दिया गया। इससे हर गांव में पशु चराई के लिए इस्तेमाल होने वाली सार्वजनिक जमीनें खत्म हो गईं। वहीं दूसरी तरफ लोग पशुओं को छुट्टा छोड़ते रहे और इन जानवरों ने खेती को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया। भूमि सुधारों के नाम पर सार्वजनिक जमीन का निजीकरण एक अदूरदर्शिता पूर्ण नीति थी जिससे पशु प्रबंधन का नायाब तरीका समस्या बनकर सामने आ गई। खेतों में पशुओं का उपयोग बंद होने और 2017 में बूचड़खाने बंद होने से पशु बाजार बंद हो गए और निराश्रित पशुओं की संख्या बेहताशा बढ़ गई।

बांदा के अलोना गांव में रहने वाले और पास के ही सांडी गांव में अपने खेतों की रखवाली कर रहे शिवकुमार का अनुमान है कि अगर सभी आवारा मवेशियों को गोशालाओं में भेज दिया जाए तो फसलों का नुकसान 50 प्रतिशत तक कम हो सकता है। लेकिन वे आगे यह भी बताते हैं कि इन गोशालाओं का प्रबंधन बहुत खराब है और इनका रखरखाव ठीक से नहीं किया जाता है।

आवारा मवेशियों से फसलों को बचाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने लगभग हर गांव में गोशालाएं बनाई हैं। सरकार इनके रखरखाव के लिए हर महीने 1,500 रुपए प्रति पशु देती है। वर्तमान में इसके लिए 1,200 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया गया है। लेकिन किसानों का कहना है कि यह पूरी व्यवस्था लापरवाही और कथित तौर पर भ्रष्टाचार की शिकार है। महोबा जिले के एक ग्राम पंचायत अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर डाउन टू अर्थ को बताया कि कुछ गोशालाओं में चारे की इतनी भारी कमी है कि मवेशियों को रात के समय खुला छोड़ दिया जाता है ताकि वे पास के खेतों में जाकर चर सकें।

ओडिशा के गंजाम जिले में निराशा इतनी ज्यादा है कि किसानों ने पिछले साल के अंत और इस साल की शुरुआत में मिलकर 'क्रॉप हॉलिडे' (खेती न करने) का फैसला किया

इस समस्या के पीछे जलवायु परिवर्तन भी एक बड़ी वजह बन रहा है। जर्नल ऑफ थ्रेटेंड टैक्सा में किए गए आंकड़ों के विश्लेषण के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में साल 2023 से 2025 के बीच एशियाई काले भालुओं के हमलों में 67 लोगों की मौत हुई और 940 लोग घायल हुए। विश्लेषकों का मानना है कि सर्दियों के दौरान बढ़ते तापमान के कारण भालुओं का शीतनिद्रा चक्र टूट रहा है। आमतौर पर एशियाई काले भालू नवंबर में शीतनिद्रा में चले जाते हैं, उस समय तापमान तेजी से गिरता है, बर्फबारी बढ़ जाती है और जंगलों में रोजहिप के बीजों जैसे भोजन की भारी कमी हो जाती है। इसके बाद वे सामान्य तौर पर वसंत के मौसम में ही बाहर निकलते हैं। लेकिन श्रीनगर के एक वन्यजीव संरक्षणवादी काशिफ भट ने डाउन टू अर्थ को बताया कि पिछली सर्दियों में पाया गया कि कुछ भालुओं ने शीतनिद्रा में जाना पूरी तरह से छोड़ दिया है। वहीं, अन्य भालुओं की शीतनिद्रा की अवधि छह महीने से घटकर सिर्फ दो या तीन महीने ही रह गई है। भट ने दिसंबर के महीने में भी दाचीगाम नेशनल पार्क के अंदर भालुओं की सक्रियता के संकेत दर्ज किए, जिनमें उनकी लीद, पैरों के निशान और भालुओं का दिखना शामिल था। उनका कहना है कि भोजन की तलाश में ये भालू अब कड़कड़ाती ठंड के बीच भी निचले इलाकों में बनी इंसानी बस्तियों की तरफ तेजी से रुख कर रहे हैं।

मानव-वन्यजीव संघर्ष विशेषज्ञ और स्वतंत्र शोधकर्ता मिलिंद वाटवे का कहना है कि संरक्षण से जुड़ी बहसों में अक्सर बढ़ते टकराव की वजह प्राकृतिक आवासों के विनाश, उनके विखंडन, और वन क्षेत्रों में इंसानी घुसपैठ को माना जाता है। ये मुद्दे निश्चित रूप से बेहद गंभीर हैं और इन पर तुरंत कदम उठाए जाने की जरूरत है। इसके बावजूद ये आज सामने आ रहे टकराव के पैटर्न को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं करते। कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां जानवरों के प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित किया गया, उन्हें फिर से बहाल किया गया या उनका दायरा बढ़ाया गया, लेकिन वहां भी टकराव कम होने की बजाय और ज्यादा बढ़ गया है। वाटवे कहते हैं कि अगर प्राकृतिक आवासों का नुकसान ही इसकी एकमात्र मुख्य वजह होता तो जानवरों की आबादी में लगातार गिरावट आनी चाहिए थी, न कि इंसानों के साथ उनका यह निरंतर संघर्ष जारी रहता।

वाटवे इसकी बजाय इंसानों के प्रति जानवरों के मन से खत्म होते डर की तरफ इशारा करते हैं। ऐतिहासिक रूप से यह डर वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 से पहले उन पर रहने वाले शिकार के दबाव के कारण बना हुआ था। वह कहते हैं कि इंसानों से स्वाभाविक रूप से दूरी बनाकर रखना काफी हद तक एक सीखा हुआ व्यवहार है, जो शिकार के डर से पैदा हुआ था। जैसे-जैसे जानवर अपना यह डर खो रहे हैं, वे तेजी से इंसानी आबादी वाले इलाकों की तरफ रुख करने लगे हैं। उनका यह भी मानना है कि डर की इसी कमी से यह समझा जा सकता है कि आखिर क्यों अब ढोल-नगाड़े, पटाखे और शोर मचाकर जानवरों को डराने वाले पारंपरिक तरीके लगातार बेअसर होते जा रहे हैं।

किसान भी इस बात की तस्दीक करते हैं। मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले के बिजलोन गांव के विमल परमार का कहना है कि देसी बम, घंटियों और पटाखों जैसे पारंपरिक तरीके अब जानवरों को नहीं डरा पाते। हिरणों में अब इंसानों का कोई डर नहीं रह गया है। अगर उन्हें खदेड़ भी दिया जाए, तो वे कुछ ही देर में वापस लौट आते हैं। उत्तराखंड के रामनगर इलाके के छोई गांव की 36 वर्षीय किसान सोनी देवी बिष्ट कहती हैं कि जानवर अब इंसानों की दिनचर्या को अच्छी तरह समझने लगे हैं। वह बताती हैं कि जैसे ही शाम को सूरज ढलने के समय किसान अपने खेतों से निकलते हैं, जानवर फसलों को तबाह करने पहुंच जाते हैं। उत्तराखंड ग्रामीण विकास एवं पलायन निवारण आयोग के साल 2026 के एक सर्वे में भी कुछ ऐसा ही आंकड़ा सामने आया है। इसके मुताबिक 57 प्रतिशत जंगली जानवर अब घने जंगलों के बजाय इंसानी बस्तियों के आसपास रहने लगे हैं, जिससे यह टकराव और भी गंभीर हो गया है।

साल 2025 में इकोलॉजी लेटर्स जर्नल में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसमें पिछले 30 सालों के शोध का विश्लेषण किया गया था। यह रिपोर्ट बताती है कि शिकार या जानलेवा हमलों के डर से जंगली जानवर हर वक्त बहुत ज्यादा चौकन्ने रहने लगते हैं। इस अत्यधिक सतर्कता के कारण वे खुलकर अपना भोजन या चारा नहीं ढूंढ पाते। विज्ञान में इसे भोजन और सतर्कता का संतुलन कहा जाता है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि जानवर या तो अपनी जान बचा सकता है या फिर चैन से पेट भर सकता है। इसके ठीक उलट, जहां इंसानों से जान का खतरा नहीं होता, वहां नजारा बिल्कुल अलग होता है। जैसे पर्यटन, सड़कें और बस्तियां होने से जानवरों का डर कम हो जाता है। वे बहुत ज्यादा चौकन्ने नहीं रहते। इस वजह से उनके भोजन करने के तौर-तरीकों में कोई खास रुकावट नहीं आती। रिसर्च के मुताबिक, इंसानों की इस निष्क्रिय मौजूदगी से कुछ जीवों को फायदा भी पहुंचता है। वैज्ञानिक इसे ह्यूमन-शील्ड हाइपोथिसिस यानी इंसानी ढाल का सिद्धांत कहते हैं। इसके अनुसार इंसानों की चहल-पहल से डरकर बड़े शिकारी जानवर दूर रहते हैं। इसका फायदा उठाकर छोटे या कमजोर जानवर उन इलाकों में खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। इसके साथ ही शोधकर्ता एक और अहम बात स्वीकार करते हैं। उनके मुताबिक इंसानों और जानवरों के बीच बढ़ता टकराव हमारी सफल वन्यजीव संरक्षण नीतियों का भी एक नतीजा है। इन नीतियों की वजह से ही बीते सालों में वन्यजीवों की आबादी में काफी बढ़ोतरी हुई है।

ओडिशा के कंधमाल जिले में फसलों को जंगली जानवरों से बचाने के लिए इंटीग्रेटेड ट्राइबल डेवलपमेंट एजेंसी ने सोलर ऊर्जा आधारित तारबंदी लगाई है

किसानों को हो रहे नुकसान की भरपाई के मामले में केंद्र सरकार का रुख अब तक काफी धीमा और निराशाजनक रहा है। गोखले इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में जंगली जानवरों के हमलों से प्रभावित जिन 25 प्रतिशत किसानों ने मुआवजे की गुहार लगाई थी, उनमें से केवल 1-2 प्रतिशत को ही नुकसान के मुताबिक भुगतान मिल सका। हालांकि अब केंद्र सरकार ने इस संकट की गंभीरता और इसकी प्रकृति को स्वीकार किया है। साल 2026 के खरीफ सीजन से जंगली जानवरों के कारण होने वाले फसलों के नुकसान को भी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के दायरे में शामिल कर लिया गया है। इस नई व्यवस्था के तहत किसानों को नुकसान की सूचना देने के लिए 72 घंटे का समय दिया जाता है। इसके बाद मुआवजा जारी करने से पहले ड्रोन तकनीक के जरिए नुकसान का सत्यापन किया जाएगा। खास बात यह है कि यह राहत राशि राज्य सरकारों द्वारा दिए जाने वाले मुआवजे के अलग और अतिरिक्त होगी।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय समय-समय पर राज्यों को जंगलों से बाहर के तय इलाकों में कुछ खास प्रजातियों को वर्मीन यानी नुकसानदेह या हिंसक जीव घोषित करने की इजाजत देता रहा है। ऐसा होने पर वन्यजीव कानूनों का उल्लंघन किए बिना एक साल तक उनकी आबादी को नियंत्रित करने के लिए उन्हें मारने की अनुमति मिल जाती है। इस नीति के तहत साल 2015 में बिहार को नीलगाय और जंगली सूअरों को मारने की मंजूरी दी गई थी। इसके बाद साल 2016 में उत्तराखंड में जंगली सूअरों, हिमाचल प्रदेश में रीसस बंदरों (मकाक), गुजरात में नीलगाय और महाराष्ट्र में जंगली सूअरों के लिए भी केंद्र ने ऐसी ही अनुमति दी थी।

हालांकि केरल में यह मुद्दा राज्य और केंद्र सरकार के बीच बड़े टकराव की वजह बन गया है। फसलों के भारी नुकसान से परेशान होकर केरल सरकार ने साल 2025 में केंद्र से जंगली सूअरों को वर्मीन घोषित करने की गुहार लगाई थी। जब केंद्र ने इससे इनकार कर दिया, तो केरल ने खुद का वन्यजीव कानून पेश कर दिया। इस नए कानून के तहत जंगली सूअरों के हमलों को राज्यव्यापी आपदा घोषित किया गया और उन्हें वर्मीन की श्रेणी में रख दिया गया। फरवरी 2026 में वहां के राज्यपाल ने इस बिल को अंतिम मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा है, जिस पर अभी मुहर लगना बाकी है। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस प्रस्तावित कानून में किसानों को खुद जानवरों को मारने का अधिकार नहीं है। इसकी बजाय पंचायतें जरूरत पड़ने पर लाइसेंसधारी शूटरों को बुलाकर उनका शिकार करा सकेंगी। इसी बीच, साल 2025 के आखिर में नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्डलाइफ ने रीसस बंदरों को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-II के तहत दोबारा संरक्षित जीव का दर्जा देने की सिफारिश की है। इस कदम के बाद अब उन्हें मारना बेहद मुश्किल हो जाएगा।

देसी बम, घंटियों और पटाखों जैसे पारंपरिक तरीकों से अब जानवरों को नहीं डराया जा सकता। खासकर हिरणों को अब इंसानों से डर नहीं लगता

शोधकर्ताओं का तर्क है कि किसानों और वन्यजीवों के बीच का यह टकराव पूरी तरह से स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है और यह आपस में जुड़े कई कारकों से तय होता है। इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज के साल 2025 के एक अध्ययन में कहा गया है कि किसी एक खास इलाके में एक ही समय पर कई कारण एक साथ मिलकर असर डाल सकते हैं। इसलिए इस टकराव को कम करने के उपाय ढूंढने के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि किस कारण की भूमिका कितनी बड़ी है। इसके लेखक इस बात पर जोर देते हैं कि वन्यजीवों से जुड़े रिसर्च को अब केवल सुरक्षित जंगलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इंसानी आबादी वाले इलाकों में रह रहे जानवरों पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए। स्वतंत्र शोधकर्ता सोनल प्रभुलकर कहती हैं कि हमारा संरक्षण विज्ञान आज भी मुख्य रूप से रिजर्व के अंदर वन्यजीवों को सुरक्षित रखने पर ही टिका हुआ है। इससे वहां जानवरों की आबादी तो बढ़ रही है, लेकिन उनके खेतों की तरफ बढ़ने पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है। वह कहती हैं कि आज असली चुनौती सुरक्षित क्षेत्रों से बाहर रहने वाले जानवरों की निगरानी करने की है, ताकि उनकी प्रजाति के अस्तित्व को बनाए रखते हुए इस टकराव को संभाला जा सके। इसके लिए वन्यजीव अनुसंधान के क्षेत्र में बुनियादी बदलाव और वैज्ञानिक सोच में परिवर्तन लाने की जरूरत है।

देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व वैज्ञानिक और संरक्षणवादी कमर कुरैशी का कहना है कि सह-अस्तित्व एक ऐसा लक्ष्य हो सकता है, जिसे पाना शायद मुमकिन न हो। उनका मानना है कि हमें इंसानों और जानवरों के आपस में मिलकर रहने की बजाय एक ही इलाके में दोनों की मौजूदगी यानी सह-उपस्थिति के नजरिए से सोचने की जरूरत है। वह इस टकराव को कम करने के लिए इम्यूनोकंट्रासेप्शन (प्रतिक्षमता-गर्भनिरोधक) के जरिए जानवरों की प्रजनन क्षमता को नियंत्रित करने को एक संभावित उपाय मानते हैं। इसके उदाहरण के रूप में वह कर्नाटक के कुछ हिस्सों में हाथियों पर किए जाने वाले प्रस्तावित परीक्षणों का जिक्र करते हैं। हालांकि, वह आगाह भी करते हैं कि इस तरह के उपायों के लिए बेहद सटीक योजना और इसे बार-बार दोहराने की जरूरत होगी। इसके साथ ही बड़े पैमाने पर लागू करने के लिहाज से यह तरीका आर्थिक रूप से बहुत महंगा और व्यावहारिक नहीं भी हो सकता है।

वाटवे इस मामले में और भी ज्यादा अपरंपरागत और कड़ा नजरिया रखते हैं। उनका सुझाव है कि कुछ खास हालात में जानवरों का सोच-समझकर शिकार करने की रणनीति (स्ट्रैटेजिक कलिंग) अपनाई जा सकती है, ताकि उनके मन में इंसानों का डर दोबारा पैदा किया जा सके और इंसानों से दूरी बनाए रखने के उनके स्वाभाविक व्यवहार को भी बहाल किया जा सके। उनका तर्क है कि अगर बहुत सोच-समझकर और चुनिंदा तरीके से कुछ जानवरों को हटाया जाए तो इसका असर सिर्फ उन मरे हुए जानवरों तक नहीं रहेगा। इससे पूरी प्रजाति का व्यवहार बदल जाएगा और इसके बड़े नतीजे देखने को मिल सकते हैं। हमारे कानून में इस तरह के सीमित हस्तक्षेप के लिए पहले से ही कुछ कानूनी प्रावधान मौजूद भी हैं। लेकिन वाटवे चेतावनी देते हैं कि ऐसा कोई भी कदम उठाने से पहले जानवरों की आबादी का सटीक वैज्ञानिक डेटा होना बहुत जरूरी है। अगर बिना पूरी तैयारी और सही पहचान के ऐसा किया गया तो जानवरों का व्यवहार बदलने की यह कोशिश पूरी तरह फेल हो सकती है या फिर इसके बिल्कुल उल्टे और नुकसानदेह नतीजे भी मिल सकते हैं।